लॉकडाउन के बीच में क्यों जारी होती है गाइडलाइन, ढ़ील का बड़ा राज

KKN न्यूज ब्यूरो। कोरोनाकाल में लॉकडाउन, गाइडलाइन और ढ़ील जैसे शब्दो से अब कोई अनजान नहीं है। दरअसल ये वो शब्द है, जिसकी वजह से कई लोग गुमराह हो रहें हैं या ठीक से इसको समझ नहीं पा रहें हैं। लोगो को ठीक से यह नहीं मालुम है कि क्या करना चाहिए और क्यों करना चाहिए? आलम ये है कि अब हमे कोरोना के साथ जीना भी है और इससे बचना भी है। यह तभी संम्भव होगा, जब हम इसको ठीक से समझ पायेंगे। इससे भी बड़ी बात ये है कि सरकार की ओर आशा भरी नजरो से देखते रहने से बेहतर होगा कि हम अपने लिए खुद ही बेहतर बिकल्प तय करें। सरकार के लिए इंसान का जीवन बहुत मायने रखता है और सरकारे इस दिशा में काम भी कर रही है। पर, यह भी एक सच है कि सरकार के लिए देश का इकोनॉमी बचाना भी उतना ही जरुरी होता है। सरकार अब इस दिशा में भी काम करने लगी है। विरोधाभाष देखिए। इकोनॉमी को बचाना है तो जीवन से खेलना होगा और जीवन की रक्षा हेतु लॉकडाउन जारी रखने का मतलब होगा आर्थिक तंगी का सामना। यहां एक बात और है और वह ये कि सरकार भी दोहरी दबाव में है। लॉकडाउन बहाल रखने के लिए अन्तराष्ट्रीय दबाव है और खोलने के लिए घरेलू दबाव। लोगो को छूट देने का मतलब होगा कारोना के संक्रमण को फैलने का मौका देना।

बेरोजगारी बढ़ने का खतरा

अब जरा राजनीति का तकाजा देखिए। सरकार लॉकडाउन के बीच में गाइडलान जारी करके इकोनॉमी को भी बचाना चाहती है। ताकि, दोनो काम एक साथ हो सके। अब दोनो एक साथ कैसे होगा? क्योंकि, लॉकडाउन का मतलब होता है सभी कुछ बंद। चाहे वह सरकारी उपक्रम हो या गैर सरकारी उपक्रम। सभी कुछ बंद। कल कारखाना बंद, ट्रांसपोर्ट सिस्टम बंद, रेल और हवाई सेवा बंद। यानी सभी कुछ बंद। अब इसका मतलब समझिए। दरअसल, लॉकडाउन की अवधि में सिर्फ आम लोगो का, किसानो का या कारोबारियों का नुकसान होगा, ऐसी बात नहीं है। बल्कि, सच तो ये है कि लॉकडाउन से सर्वाधिक नुकसान सरकार को उठनी पड़ती है। अब इसकी एक बानगी देखिए। आपको जान कर हैरानी होगी कि यात्रा प्रतिबंधों की वजह से वैश्विक व्यापार को अब तक 2600 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। यह फाइनल आंकड़ा नहीं है। बल्कि, एक अनुमान है और वह भी मोटे तौर पर। फाइनल आंकड़ा आने में अभी समय लेगेगा। अनुमान यह भी है कि नुकसान का फाइनल ग्राफ इससे कई गुणा अधिक हो सकता है। कोराना वायरस की वजह से दुनिया की करीब 24 करोड़ या इससे भी अधिक लोगो की नौकरी खतरे में पड़ गई है। यानी 24 करोड़ लोग एक साथ बेरोजगार हो जायेंगे। यह आंकड़ा भी बड़ा हो सकता है। पिछले दशक में वित्तीय संकट के दौरान लोगो को अपनी नौकरी गवांनी पड़ी थीं। पर, मौजूदा हालात इससे सात गुणा अधिक भयावह है। जानकार मानते है कि अगस्त महीने तक हालात काबू में नहीं आया तो भारत सहित पूरी दुनिया, एक गहरे वित्तीय संकट की दलदल में फंस सकता है।

 

आर्थिक नुकसान

एशियन डेवलपमेंट बैंक के द्वारा जारी आंकड़ो पर गौर करें तो कोरोना काल की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि इन दिनो व्यापार और उद्योग का दायरा तेजी से सिमटने लगा है। जाहिर है इससे बेरोजगारी बढ़ेंगी। बड़ी संख्या में लोगो के पास कोई काम नहीं होगा। अनुमान के मुताबिक कोरोना वायरस के इस महामारी के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 9.7 फीसदी का नुकसान हो सकता है। अब तक तो समझ में आ गया होगा कि दुनिया की सरकारे लॉकडाउन को हटाने के लिए क्यों बेचैन है? बात भारत की करतें हैं। भारत में शुरुआत के मात्र 21 दिनों की लॉकडाउन में अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थीं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक मात्र 21 दिनों के लॉकडाउन से भारत की अर्थव्यवस्था को सात से आठ लाख करोड़ रुपये का चपत लगने का अनुमान है। लॉकडाउन में ज्यादातर कारखाना और व्यवसाय बंद है। भारतीय रेलव हो या उड़ानें। प्रत्येक सेक्टर को झटका लगा है। इस दौरान देश की आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई। जानकारी के मुताबिक 25 मार्च से शुरुआत के 21 दिनों के लॉकडाउन में भारत की करीब 70 फीसदी आर्थिक गतिविधियां थम गई है। निवेश, निर्यात और अन्य उत्पादों की खपत में खतरनाक तरीके से गिराबट दर्ज की गई है।

परिवहन कारोबार को लगा झटका

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट यूनियन के मुताबिक सिर्फ ट्रक परिवहन व्यवसाय को शुरुआत के 15 दिन में करीब 35 हजार 200 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका था। इसी प्रकार खुदरा कारोबार को करीब 30 अरब डॉलर का भारी नुकसान होने का अनुमान है। यह कुछ मिशालें है, सरकार की पेशानी पर चिंता की लकिर बताने के लिए। दरअसल, यहीं वह कारण है, जिसके रहते सरकार लॉकडाउन के बीच में बार- बार गाइडलाइन जारी करके लोगो को ढ़ील दे रही है। ताकि, अर्थ व्यवस्था को सम्भाला जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोनाकाल के लॉकडाउन से कुल मिला कर भारत के अर्थव्यवस्था को 120 अरब डॉलर यानी करीब नौ लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। मैं फिर कहता हूं कि यह मात्र एक अनुमान है और फाइनल ग्राफ मिलना अभी बाकी है। लेकिन इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि सरकार लॉकडाउन को कम करने के लिए इतना क्यों बैचेन है? एक्यूट रेटिंग्स एंड रिसर्च लिमिटेड ने अनुमान जताया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था को शुरुआत के 21 दिनों में प्रत्येक रोज करीब 4.64 अरब डॉलर यानी 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा था। इस तरह सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को 98 अरब डॉलर यानी करीब साढ़े 7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है।

गाइडलाइन क्यों

सेंट्रम इंस्टीट्यूशनल रिसर्च ने कहा है कि यह महामारी ऐसे समय में आई है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था में साहसिक राजकोषीय और मौद्रिक उपायों के बाद पुनरुद्धार के संकेत दिखने लगे थे। इस बीच देशव्यापी लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को सात से आठ लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने की आशंका है। यह अनुमान शुरूआत के दिनो की है। मौजूद समय में नुकसान का ग्राफ चिंता पैदा करने वाली है। अब तक आपको समझ में आ गया होगा कि सरकार बार-बार गाईडलाइन क्यों जारी करती है? आपको याद ही होगा कि शुरुआत के दिनो में सिर्फ आपातकालीन सेवाओं को लॉकडाउन की दायरे से बाहर रखा गया था। बाद में हालात बदलने लगा और सरकार ढ़ील देने के लिए गाइडलाइन जारी करने लगी। इसके बाद कृषि, खनन, और आईटी सेवाएं को कुछ गाइडलाइन के साथ बहाल कर दिया गया। किंतु, इससे बात नहीं बनी और इकोनॉमी को झटका लगना बंद नहीं हुआ तो कालांतर में कई प्रकार की जन सेवाओं को काम करने की अनुमति दे गई है। उद्योग और निजी परिवहन को बहुत हद तक छूट मिल गई।

खतरा के साथ ढ़ील भी बढ़ी

याद करिए 25 मार्च को। जब भारत में लॉकडाउन हुआ था। उस वक्त भारत में कोरोना के मात्र 606 पॉजिटिव मामले थे। उस वक्त सरकार ने पूरी सख्ती से पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया और आज जब कोरोना पॉजिटिव की संख्या एक लाख को पार कर रही है, तब ढ़ील देने के नाम पर गाइडलाइन के जरिए बहुत कुछ खोल दिया गया है। यह कितना सही है और कितना गलत? मुझे नहीं पता। क्योंकि, सवाल अर्थ व्यवस्था की है। तो जाहिर है जिन्दगी को दाव पर लगाना ही होगा। यह तय हो चुका है कि कोरोनाकाल अब लम्बा खिंचने वाला है। ऐसे में अर्थ व्यवस्था को उसकी हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता है। यानी इकोनॉमी को बचाना है, तो जीवन मूल्यों के साथ एक हद तक समझौता करना होगा।

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