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छिछालेदर की राजनीति के रहते भारत कैसे बने सुपर पावर

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भारत सुपर पावर बन सकता है या नहीं? आज यह एक बड़ा सवाल बन चुका है। पूरी दुनिया की इस पर नजर है। भारत में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया आरंभ होने के बाद से ही लगातार इस पर बहस का दौर भी जारी है।

महाशक्ति बनने के लिए केवल आर्थिक सुधार ही ज़रूरी नहीं है। सभी सफल देशों के इतिहास में दो ऐसी बातें थीं जो बिनी किसी अपवाद के वहां जन मानस ने स्वीकार किया। पहली ये कि सरकार किसी भी तरह की हिंसा पर नियंत्रण रख पाने में सक्षम हो और दूसरी ये कि वहां की जनता बिना किसी दबाव के खुद टैक्स भरने को तैयार रहे। न्याय और अन्य सेवाएं सुचारू रूप से काम करती हो। फिर, चाहे वह देश पूंजीवादी हो या समाजवादी। वहां के शासक तानाशाह हो या लोकतांत्रिक। दुर्भाग्य से भारत की सरकारें इस मामले में अब तक असफल रही हैं।
धर्मिक उन्माद से उठना होगा
समाज में मज़बूती और गतिशीलता का होना, महाशक्ति बनने की दूसरी बड़ी शर्त है। एक प्रगतिशील समाज अपनी नई सोच और परोपकार करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। भारत का समाज कभी धर्म पर लड़ता नज़र आता है तो कभी जातिय उन्माद भड़क जाता है। दुनिया की अन्य देशो में यदि सड़क पर कचरा पड़ा हो तो वहां के नागरिक उसे चुपचाप उठा कर फेक देता है। वहीं भारत में लोग इस पर बहस करने लगतें हैं। सरकार को कटघरे में खड़ा करके आंदोलन शुरू कर देते है। लेख लिखे जाने लगते है। वोट की खातिर धरना और प्रदर्शन शुरू हो जाता है। किंतु, कचरा को कोई नहीं हटाता और वह वहीं पड़ा रह जाता है।
राजनीति की खींचतान
भारतीय राजनीति की आपसी खींच-तान भारत को महाशक्ति बनने की राह में सबसे बड़ा बाधक बन चुका है। भारत में विकासवाद या राष्ट्रवाद को उन्माद की चासनी में रख कर वोटबैंक की आइने में देखने की हमारी प्रवृति महाशक्ति बनने की राह में बाधक बन चुकी है। राजनीतिक कारणो से हमारे संसद का बहुमूल्य समय हंगामे की भेंट चढ़ कर रह जाता है और आज हम निर्णय लेने की हालात में नहीं पहुंच सके है। ऐसे में महाशक्ति बनने का सपना पूरा होता हुआ प्रतीत नहीं लग रहा है।
अन्तर्राष्ट्रीय संबंध
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बड़ी शक्ति या सुपर-पावर उस संप्रभु देश को कहते हैं जिसमें वैश्विक रूप से अपना प्रभाव डालने की क्षमता होती है। इस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों अमरीका, चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन को महाशक्ति माना जा सकता है। ये ऐसे देश हैं जो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर सुरक्षा परिषद में वीटो पावर होने के साथ-साथ अपने धन और सैन्य शक्ति की वजह से प्रभाव डाल सकते हैं। इन पांच देशों के बाद गिना जाए तो जर्मनी और जापान दो ऐसे देश हैं जो वैश्विक स्तर पर आर्थिक रूप से तो प्रभावकारी हैं लेकिन उनकी छवि सैन्य शक्ति वाली नहीं है। इसके अलावा सऊदी अरब, सिंगापुर, ताईवान, ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ छोटे देश हैं, लेकिन उतने प्रभावशाली नहीं हैं। बात भारत की करें तो बिड़बना यहां भी दिखेगा। हमने खुद से ही अपने प्रधानमंत्री के विदेश दौरे को राजनीतिक कारणो से विवादित बना कर आखिरकार अपने ही पैरो पर कुल्हाड़ी मारने का काम शुरू कर दिया है।
कहां खड़ा है भारत
यदि बात भारत की करें तो आज हमारा भारत बड़ी आबादी वाले उन देशों की क़तार में शामिल है, जो अमीर नहीं हैं और संसाधनों के अभाव की वजह से सैन्य क्षमता में ताक़तवर भी नहीं हैं। लिहाजा आज हम दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, ब्राज़ील और नाइजीरिया जैसे देशो की कतार में आकर खड़ा होकर चुकें हैं। सवाल खड़ा होता है कि एक सुपरपावर देश बनने के लिए भारत के रहनुमा गंभीर क्यों नहीं है। जवाब फिर उसी राजनीति में है, जिसको हमने उन्मादी और वोटबैंक की शक्ल में ढ़ाला हुआ है और फिलहाल तो इससे बाहर निकलना मुश्किल ही प्रतीत होता है।

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