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आधुनिक शिक्षा प्रणाली और दम तोड़ती मानवीय चेतना

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जयनारायण प्रसाद
मानव शुरु से ही चिन्तनशील प्राणी रहा है।  ये चिंतन ही दर्शन का मूल है।  कोई भी चिन्तन कितना ही प्राचीन क्यों न हो उसकी उपादेयता कभी समाप्त नहीं होती।  शिक्षा और दार्शनिक चिंतन में अविछिक संबंध है। दर्शन हमारे जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करता है।  शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। अब सवाल यह उठता है कि शिक्षा क्यों जरूरी है? क्या सिर्फ अर्थ अर्जन के लिए शिक्षा आवश्यक है? अगर नही तो आज की शिक्षा प्रणाली मानवीयता से दूर बाजारू क्यों है? आज के परिदृश्य में शिक्षा किसी समाज में एक निश्चित समय तथा निश्चित स्थानों (विद्यालय, महाविद्यालय) में औपचारिक ढंग से चलने वाली एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा छात्र शिक्षकों के माध्यम से निश्चित पाठ्यक्रम को पढ़कर सिर्फ परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना सीखाता है। ताकि, वह अच्छा पैसा कमा सके।
जबकि शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्त्व को विकसित करने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए । जो उसे समाज में एक वयस्क की भूमिका निभाने के लिए समाजीकृत करे तथा समाज के सदस्य एवं एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराए।
आज व्यवहारिकता से कोशों दूर शिक्षा को स्कूली  बंधनो में जकड़ कर उसकी गुणवत्ता और ध्येय को बदला जा चुका है। विद्यार्थी अब स्कूलीया होकर रह गए। और गुरु जी अब शिक्षक हो कर जो अमूल्य ज्ञान का मूल्य तय कर गुरु की परिभाषा बदल बैठे। शिक्षक का दर्जा समाज में बड़ा ही सम्माननीय तथा उच्च माना गया है। वह नैतिकता व आदर्शों का प्रेरणास्रोत तथा जीवन-मूल्यों के सतत नियामक रूप में भी जाना गया है। शिक्षक के रूप में एक विनयशील, अनुशासनबद्ध और आदर्श जीवन पर चलने वाले व्यक्ति को मान्य किया गया है तथा माना गया है कि उस पर समाज, राष्ट्र तथा मानव जीवन की सभी नैतिक जिम्मेदारियां हैं। समय के साथ ‘गुरु’ के आदर्श रूप की व्यवस्था मिटने लगी है तथा जीवन के दूसरे क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की तरह ही शिक्षक भी बनता चला गया। गिरते जीवन-मूल्यों की इस आंधी ने शिक्षक के आदर्श स्वरूप को झिंझोड़ कर रख दिया और आज तो हालत यह है कि शिक्षक जगत में भी भ्रष्टता ने अपना घर बना लिया है।
हाल के दशकों में जहाँ एक ओर शिक्षक की लगातार गिरती सामाजिक हैसियत, उसकी तैयारी व उसके साथ हो रहे प्रशासनिक व्यवहार पर चिन्ता जाहिर की जा रही है, उस पर और ध्यान देने व इस दिशा में यथोचित खर्च करने की बात हो रही है। वहीं, दूसरी ओर शिक्षक समुदाय के प्रति गहरा रोष व आक्रोश बढ़ता जा रहा है। जगह-जगह उन पर नकेल कसने और ज्यादा निगरानी से आगे जाकर शिक्षक की काबलियत से निरपेक्ष (टीचर प्रूफ) शैक्षिक व अन्‍य सामग्री विकसित करने की बात हो रही है। शिक्षक के प्रति जो रुख है वह उन्हें नकारा मानने और कर्णधार के रूप में उनके आलंकारिक गुणगान के बीच झूलता रहता है।
यह बात बार-बार कही जाती है कि भारत में शिक्षक की योग्यता और कार्य कुशलता आवश्यकता के अनुरूप नहीं हैं। नियुक्ति-प्रक्रिया के संदर्भ में भी यह कहा जाता है कि हमें योग्य शिक्षकों को ही चुनना चाहिए। इसी सन्दर्भ में यह सवाल उठता है कि योग्य शिक्षक से हमारा तात्पर्य क्या है? शिक्षक की योग्यता को देखने का हमारा मापदंड क्या होना चाहिए? एक योग्य और सक्षम शिक्षक बनने की प्रक्रिया क्या होगी?  क्या स्कूल स्तर पर पढ़ाने के लिए उस स्तर पर पढ़ाए जाने वाले विषय को ठीक से जान लेना ही काफी है? इसके पहले कि इस सवाल को उठाने का कोई साहस करे फौरन यह मुद्दा उठ जाता है कि क्या आज बहुत सारे शिक्षकों को प्राथमिक स्तर की विषय-वस्तु की भी पर्याप्त समझ है?
कई राज्यों में शिक्षक योग्यता परीक्षा के परिणाम भी चौंकाने वाले हैं। सवाल यह है कि इन सबसे निपटने के लिए क्या-क्या किया जा रहा है? इनसे निपटने के लिए आज जल्दीबाजी में जो कदम उठाए जा रहे हैं क्‍या उनसे इस स्थिति से पार पाने में मदद मिलेगी या वे इसे और जटिल बनाएँगे?  प्रशासकों और सामान्य लोगों का एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि शिक्षा के स्तर में जो गिरावट देखी जा रही है उसका ताल्लुक शिक्षक की क्षमता से ज्यादा प्रशासनिक तत्परता से है? उनकी शिकायत रहती है कि शिक्षक स्कूल से अनुपस्थित रहते हैं, देर से पहुँचते हैं और जल्दी चले जाते हैं। उनके अनुसार प्रशासनिक निगरानी का अभाव ही शिक्षा के स्तर के गिरने का कारण है। प्रशासनिक निगरानी ठीक हो जाए तो क्‍या सब कुछ पटरी पर आ जाएगा ?
इस सबके बीच शिक्षकों के भी कई सवाल हैं। वे अपने साथ हो रहे प्रशासनिक व्यवहार से तो चिंतित हैं ही, सरकारी स्कूल के शिक्षक इससे भी परेशान हैं कि उन्हें स्कूल में और स्कूल के बाहर भी शिक्षकीय काम के अलावा बहुत कुछ करना पड़ता है। उनका आकलन पढ़ाने के प्रति उनकी तत्परता व गुणवत्ता के आधार पर नहीं वरन गैर शिक्षकीय कार्य और कार्यालयी कामों में उनकी दक्षता के आधार पर होता है। हालाँकि सीखने और न सीखने का पूरा ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ा जाता है। उन्हें यह छूट नहीं होती कि वे सिखाने का कार्य गंभीरता से कर पाएँ।
कुछ शिक्षक दूसरे प्रकार के सवाल भी उठाते हैं। वे कहते हैं कि शिक्षक को न तो किसी भी तरह की  परीक्षा लेने की और न ही विद्यार्थियों के साथ किसी प्रकार की सख्ती की इजाजत है। उन्हें बहुत देर तक विद्यार्थियों को किसी वर्ग में रोकने की इजाजत भी नहीं है। ऐसी परिस्थिति में शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को कैसे सुनिश्चित करें? सरकारी स्कूलों में जिन सामाजिक समूहों के बच्चे आ रहे हैं उनमें पढ़ने-लिखने की कोई पारिवारिक परम्परा नहीं है और वे अपने बच्चों की न तो घर में मदद कर पाते हैं और न ही पढ़ने-लिखने का परिवेश ही मुहैया करवा पाते हैं। ऐसे में हम क्या करें?
कुल मिलाकर देखा जाए तो आज शिक्षा का वास्तविक रूप दम तोड़ रहा है। विज्ञानवाद का हवाला देकर आधुनिक शिक्षा प्रणाली को सरकारों द्वारा उन्नत बताया जा रहा लेकिन ये सही नहीं। आज की पूरी शिक्षण प्रणाली ही विद्यार्थी को मानवीय चेतना से दूर ले जा रही है और शिक्षक भी धनार्जन के लिए इस प्रणाली का गुलाम बनकर विलेन की तरह कार्य कर रहे हैं। शिक्षको को जब इतनी समझ है तब वे  इस प्रणाली का विरोध न कर उनकी गुलामी करना क्या दर्शाता है? क्या केवल वे पैसों के लिए शिक्षण का कार्य करते हैं? हाँ तो उनका शिक्षक होना कितना सार्थक है? जिस तरह से वे अपने वेतन-भत्ते के लिए आंदोलन कर रहें है तो क्या वैज्ञानिक समाजवाद से लैस शिक्षा के लिए आंदोलन नही कर सकते ताकि आने वाला भविष्य मानवता का प्रहरी बने? अगर नही तो वे भी ठीक उसी तरह के एक गुलाम ही हैं जो बाजारू शिक्षिय प्रणाली में पैसों के लिए कुछ भी कर दे।

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