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20 साल से कम उम्र में हार्ट अटैक के बढ़ते मामले

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KKN गुरुग्राम डेस्क | हाल के वर्षों में 20 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में हार्ट अटैक के बढ़ते मामले ने सभी को चौंका दिया है। जो बीमारी पहले सिर्फ बुजुर्गों से जोड़ी जाती थी, अब वह किशोरों और बच्चों को भी अपना शिकार बना रही है।

एक के बाद एक ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहाँ स्कूल और कॉलेज के छात्र अचानक दिल का दौरा पड़ने से अपनी जान गंवा रहे हैं। यह गंभीर स्थिति यह सवाल उठाती है — क्या अब हार्ट अटैक से कोई भी उम्र सुरक्षित नहीं रह गई है?

हालिया घटनाएं: जब दिल ने दगा दे दिया

इंदौर में एक 18 वर्षीय छात्र, जो आईआईटी की तैयारी कर रहा था, रात में पढ़ाई के दौरान अचानक बेहोश हो गया। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई। प्रारंभिक रिपोर्ट में हार्ट अटैक को मौत का कारण बताया गया।

कुछ दिन पहले, इसी शहर में एक और 18 साल के युवक को रात में सीने में तेज़ दर्द हुआ और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि दिल की बीमारियाँ अब सिर्फ उम्रदराज़ लोगों की नहीं रहीं।

 बच्चों को भी नहीं बख्श रहा दिल का दौरा

2023 में गुजरात में एक 12 साल के बच्चे की अचानक हार्ट अटैक से मौत हो गई। वह छठी कक्षा में पढ़ता था और पहले से कोई दिल की बीमारी नहीं थी।

ऐसे कई उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि बचपन में दिल की बीमारी अब सामान्य हो गई है और यह कोई अपवाद नहीं रह गया है।

 विशेषज्ञों की चेतावनी: ये सिर्फ भारत की नहीं, वैश्विक समस्या

नेशनल सेंटर फॉर हेल्थ स्टैटिस्टिक्स (NCHS) के अनुसार, 2019 में अमेरिका में 18-40 आयु वर्ग के केवल 0.3% लोगों को दिल का दौरा पड़ा था। लेकिन पिछले 4-5 वर्षों में इस संख्या में तेज़ वृद्धि देखी गई है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. एंड्रयू मोरन के अनुसार, मोटापा इस बढ़ते खतरे का मुख्य कारण हो सकता है। उनका मानना है कि वजन को नियंत्रित कर दिल की बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

 मोटापा: एक छुपा हुआ खतरा

बचपन का मोटापा, दिल की बीमारियों के लिए सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। गलत खानपान, जंक फूड, बैठकर रहने की आदत और मोबाइल-टीवी की लत बच्चों के हृदय स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है।

मोटापे से जुड़ी बीमारियाँ:

  • हाई ब्लड प्रेशर

  • हाई कोलेस्ट्रॉल

  • टाइप 2 डायबिटीज़

  • डायस्टोलिक डिसफंक्शन (जिससे हार्ट फेलियर का खतरा बढ़ता है)

मोटे बच्चों में हार्ट अटैक का खतरा कई गुना अधिक हो जाता है।

बिना लक्षण के हार्ट अटैक: साइलेंट किलर

विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार हार्ट अटैक के लक्षण स्पष्ट नहीं होते। इसे “साइलेंट हार्ट अटैक” कहा जाता है।

ऐसे संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें:

  • बिना वजह थकान

  • सांस लेने में तकलीफ

  • अत्यधिक पसीना (विशेषकर बिना मेहनत के)

  • चक्कर आना या उल्टी जैसा महसूस होना

  • बेचैनी या घबराहट

अगर आपके बच्चे या किशोर को यह लक्षण अक्सर होते हैं, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

 मानसिक तनाव भी है जिम्मेदार

आज की युवा पीढ़ी पढ़ाई, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया, नींद की कमी और मानसिक तनाव का सामना कर रही है। इससे शरीर में कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ता है जो दिल की सेहत को नुकसान पहुंचाता है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य अब एक बड़ा जोखिम बन चुका है 15 से 25 वर्ष के युवाओं में हार्ट डिजीज के लिए।

 खराब जीवनशैली: जंक फूड + स्क्रीन टाइम = खतरा

आज के बच्चे बाहर खेलने की बजाय मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, और उनके खानपान में शामिल है:

  • बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़

  • कोल्ड ड्रिंक्स और एनर्जी ड्रिंक्स

  • चीनी से भरपूर स्नैक्स

यह सब मिलकर शरीर में कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को बढ़ाते हैं, जो सीधे दिल की धमनियों को नुकसान पहुंचाते हैं।

बचाव कैसे करें? कुछ जरूरी उपाय

1. नियमित हेल्थ चेकअप:

  • ECG, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की जांच

  • परिवार में अगर दिल की बीमारी का इतिहास है, तो और सतर्कता ज़रूरी है

2. संतुलित आहार:

  • हरी सब्ज़ियाँ, फल, साबुत अनाज, दालें और मेवे

  • तले-भुने और प्रोसेस्ड फूड से दूरी

3. नियमित व्यायाम:

  • रोज़ाना कम से कम 1 घंटे का शारीरिक अभ्यास

  • स्कूल और कॉलेज में खेल-कूद को बढ़ावा देना

4. मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल:

  • योग, मेडिटेशन, काउंसलिंग

  • सोशल मीडिया का सीमित उपयोग

 विशेषज्ञ की राय

डॉ. रमेश शाह, बाल हृदय रोग विशेषज्ञ कहते हैं:
“अधिकतर माता-पिता को लगता है कि दिल की बीमारी बच्चों में नहीं होती, लेकिन यह एक खतरनाक भ्रम है।”

वे सलाह देते हैं कि स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा, सही खानपान और तनाव प्रबंधन को शामिल किया जाए।

आज की तारीख में 20 साल से कम उम्र में हार्ट अटैक के मामले हमें चेतावनी दे रहे हैं कि अब अनदेखी की कोई गुंजाइश नहीं बची है। यह समय है जब समाज को मिलकर कदम उठाना होगा — बच्चों की शारीरिक, मानसिक और दिल की सेहत के लिए।

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