KKN ब्यूरो। संध्याकालीन आरती के बाद दुर्गा पूजा पंडाल का माहौल भक्तिमय होने लगा था। धूप-दीप और मंत्रोच्चारण से भरे वातावरण के बीच धीरे-धीरे राजनीति की चर्चा शुरू हो गई। अहाते में लगी कुर्सियों पर पूजा समिति के सदस्य बैठ चुके हैं, और चर्चा का विषय पूजा नहीं… बल्कि, टिकट की दावेदारी पर केंद्रित होने लगी है। एक रसूखदार और बेबाक नौजवान बिना रुके लगातार बोल रहा है— “अगर इसे टिकट मिला तो हार तय है।” उनका इशारा एक खास उम्मीदवार की ओर है। उम्मीदवार जा चुके थे। हालांकि, टिकट के वो प्रवल दावेदार है और मुख्यालय से सीघे जुड़े होने का दावा भी करते हैं। वहां मौजूद उनके एक बुजुर्ग समर्थक दार्शनिक अंदाज में बोलने लगे- मुझे अब, अपने लिए कुछ नहीं चाहिए..। उनके बोलने का अंदाज ऐसा था, सुनने वाले को लगा.. कि ये जो चाहेंगे… वहीं होगा। दूसरा बोल पड़ा— उधर भी झंडा-बैनर तैयार है। बहुत देर से खामोश बैठा एक युवा फुसफुसाया- सोशल मीडिया की ओर इशारा करते हुए बोला— टिकट मिल भी जाये तो, सोशल मीडिया पर उपजे कड़वाहट का क्या होगा। जहर जो उगला जा चुका है, उसका क्या होगा। उस युवक के नुरानी चेहरे पर तैरती मंदाकिनी की मुस्कान खामोशी के क्षणों में भी… सवाल पूछ रहा था।
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मीनापुर पर टिकी है सभी की नजर
मुजफ्फरपुर जिले से सटे मीनापुर विधानसभा हॉटसीट बनने लगा है। 2025 का चुनावी मौसम धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है और एनडीए खेमे में टिकट की दावेदारी को लेकर रस्साकशी तेज हो गई है। लोगों की राय यहां एक अलग ही तस्वीर पेश करने लगी है। लोग मानते हैं कि एनडीए के दावेदार आपस में ही गुत्थमगुत्था कर रहे हैं, जबकि विपक्ष, खासकर आरजेडी, अपनी जमीनी पकड़ बनाए हुए है। यही वजह है कि यहां मुकाबला दिलचस्प तो होगा, लेकिन अंदरूनी कलह एनडीए की मुश्किल बढ़ा सकती है।
जातीय समीकरण बनेगा जीत की कुंजी
मीनापुर विधानसभा का राजनीतिक गणित हमेशा से जातीय समीकरणों पर टिका रहा है। निषाद समुदाय निर्णायक भूमिका में है। हालांकि, इसमें जन सुराज सेंधमारी करने की तैयारी कर चुकी है। यादव और मुस्लिम मतदाता आरजेडी का कोर वोट माना जाता है। हालांकि, इस वक्त मीनापुर में मुस्लिम मतदाताओं में कुछ असंतोष उभरने लगा है। कुशवाहा और सवर्ण मतदाता एनडीए के साथ रहतें हैं। लेकिन, दलित और अति पिछड़ा वर्ग क्या करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा। इन आंकड़ों से साफ है कि कोई भी उम्मीदवार बिना व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाए चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है।
सोशल मीडिया: हथियार या जहर
सोशल मीडिया का प्रभाव राजनीति को ही नहीं बल्कि, जीत और हार के समीकरण को प्रभावित करने लगा है।
- फेसबुक पर बने स्थानीय राजनीतिक ग्रुप्स में रोजाना बहस शुरू हो चुकी है।
- व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में आरोप-प्रत्यारोप के मैसेज वायरल होने लगा है।
- ट्विटर (अब X) पर समर्थक हैशटैग चलाकर एक-दूसरे की छवि खराब करने में जुट चुकें हैं।
ऐसे में युवक की बात सच प्रतीत होती है— कि सोशल मीडिया की कड़वाहट चुनाव के मैदान में नुकसान कर दे, तो आश्चर्य नहीं होगा। दरअसल, एनडीए खेमे के दावेदार एक-दूसरे पर निशाना साधने में इतने मशगूल हैं कि विपक्षी खेमे को टारगेट करना भूल गए हैं। नतीजा यह है कि आरजेडी को बिना मेहनत के ही वॉकऑवर मिलने की उम्मीद की जा रही है।
एनडीए बनाम आरजेडी: कौन किस पर भारी
एनडीए के भीतर सीट के लिए कई दावेदार हैं। समर्थको का दावा है कि उन्होंने पहले से जनसंपर्क अभियान और पोस्टर-बैनर तैयार कर लिया है। आलाकमान तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। कहा तो यह भी जा रहा है कि हरीझंडी मिल चुका है। हालांकि, यह दावा तो सभी कर रहें हैं। ऐसे में एनडीए समर्थको का दुविधा में रहना लाजमी हे। दूसरी ओूर आरजेडी अपने पारंपरिक वोट बैंक पर भरोसा करते हुए जमीनी स्तर पर लगातार सक्रिय है। यादव और मुस्लिम मतदाता पहले से ही उनके साथ माने जाते हैं। लेकिन इन दिनो मुस्लिम मतदाताओं को लेकर आरजेडी के खेमा में भी कुछ भ्रम उत्पन्न होने लगा है। इधर, एनडीए की अंदरूनी कलह से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। मतलब इस बार मीनापुर का ताज उसी के सिर पर सजेगा, जो अपने अंदरुनी कलह को समय रहतें ठीक करने में सफल हो जायेगा।
चुनावी चर्चा में नया मोड़
चुनाव करीब आते-आते दुर्गा पूजा पंडाल में हुई यह बातचीत आने वाले दिनों की राजनीति का आईना है।
- जहां एक ओर टिकट को लेकर दावेदारों की होड़ है।
- वहीं दूसरी ओर जातीय समीकरण और सोशल मीडिया की लड़ाई पूरी तस्वीर को बदलने लगी है।
अंदरूनी कलह बनाम सामाजिक समीकरण की लड़ाई
मीनापुर विधानसभा का चुनावी समीकरण साफ है। यह सीट 2025 में सिर्फ एनडीए बनाम आरजेडी की लड़ाई नहीं होकर, अंदरूनी कलह बनाम सामाजिक समीकरण की लड़ाई बन जाये तो ताज्जुब नहीं होगा। अगर एनडीए अपने गुटीय संघर्ष और सोशल मीडिया की नकारात्मक राजनीति से उबर पाया, तो वह कड़ी टक्कर देगा। लेकिन अगर यही हालात रहे, तो आरजेडी को यह चुनावी महाभोज परोसे में मिल सकता है। दूसरी ओर कमोवेश यही हालात आरजेडी की है। मुस्लिम विरोध का स्वर समय रहते थम गया तो ठीक। नहीं तो, पासा पलटते देर नहीं लगेगा।



