KKN ब्यूरो। क्या दुनिया एक बार फिर उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ी है, जहां से वैश्विक संघर्ष की शुरुआत होती है? क्या मिडिल ईस्ट की जलती हुई सरजमीं पर जो आग दिखाई दे रही है, उसके पीछे सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति नहीं बल्कि महाशक्तियों का खेल छिपा है? अगर ऐसा है तो सबसे बड़ा सवाल भारत के सामने खड़ा है— क्या अमेरिका दुनिया का “वैश्विक चौकीदार” बनकर अपनी ताकत का इस्तेमाल कर रहा है, या यह सिर्फ अपने हितों की रक्षा का खेल है? मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट—चाहे वह इजरायल-ईरान तनाव हो, तेल की राजनीति हो या सामरिक ठिकानों की जंग—दरअसल कई दशकों से चल रही अमेरिकी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जाता है। लेकिन इस कहानी को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। क्योंकि इतिहास गवाही देता है—जहां-जहां अमेरिका ने “हस्तक्षेप” किया, वहां अक्सर स्थिरता की जगह अस्थिरता ने जन्म लिया।
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अमेरिका का वैश्विक हस्तक्षेप मॉडल: लोकतंत्र या रणनीति
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। इसके बाद उसने कई जगहों पर “लोकतंत्र की रक्षा” के नाम पर हस्तक्षेप किया। लेकिन कई मामलों में यह हस्तक्षेप भू-राजनीतिक हितों से प्रेरित माना गया।
ईरान 1953 – CIA का तख्तापलट
मिडिल ईस्ट की राजनीति में अमेरिकी हस्तक्षेप का सबसे चर्चित उदाहरण 1953 का ईरान है। ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग ने ब्रिटिश कंपनियों के नियंत्रण वाले तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस फैसले ने पश्चिमी शक्तियों को नाराज़ कर दिया। इसके बाद अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA और ब्रिटेन की MI6 ने एक गुप्त अभियान चलाया।
ऑपरेशन Ajax।
इस ऑपरेशन के तहत मोसद्देग की सरकार गिरा दी गई। शाह मोहम्मद रेजा पहलवी को सत्ता में मजबूत किया गया। लेकिन यही हस्तक्षेप बाद में अमेरिका के लिए भारी पड़ा। 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई और ईरान अमेरिका का कट्टर विरोधी बन गया।
वियतनाम युद्ध – अमेरिका की सबसे बड़ी हार
1955 से 1975 तक चला वियतनाम युद्ध आधुनिक इतिहास का सबसे लंबा और विवादित युद्ध था। अमेरिका ने साम्यवाद को रोकने के नाम पर वियतनाम में सैन्य हस्तक्षेप किया। लेकिन परिणाम बेहद भयावह रहे। लगभग 30 लाख लोगों की मौत हो गई। अमेरिका के हजारों सैनिक मारे गए और अंत में अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध ने अमेरिकी विदेश नीति पर दुनिया भर में सवाल खड़े कर दिए।
इराक युद्ध – एक झूठ जिसने दुनिया बदल दी
2003 में अमेरिका ने दावा किया कि सद्दाम हुसैन के पास “Weapons of Mass Destruction” हैं। इसी आधार पर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इराक पर हमला किया। लेकिन बाद में जांच में पता चला कि ऐसे हथियार मौजूद ही नहीं थे। लेकिन इस युद्ध का परिणाम बहुत खतरनाक हुआ। सद्दाम हुसैन की सत्ता खत्म हो गई। इराक में लंबे समय तक गृहयुद्ध चला और ISIS जैसे आतंकवादी संगठन का उभार हो गया। कई विशेषज्ञ इसे 21वीं सदी की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती मानते हैं।
लीबिया – एक और अस्थिर राष्ट्र
2011 में नाटो और अमेरिका ने लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप किया। लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी मारे गए। लेकिन उसके बाद देश कई हिस्सों में बंट गया। गृहयुद्ध शुरू हो गया और आतंकवादी समूह सक्रिय हो गए। यानी एक तानाशाह की समाप्ति के बाद भी देश स्थिर नहीं हो पाया।
मिडिल ईस्ट में अमेरिका की रणनीति क्या है
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार अमेरिकी नीति के पीछे तीन प्रमुख उद्देश्य रहे हैं।
- तेल और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला क्षेत्र है। इस क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखना अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
- इजरायल की सुरक्षा
अमेरिका लंबे समय से इजरायल का प्रमुख सहयोगी रहा है। इस कारण मिडिल ईस्ट की कई नीतियां इजरायल की सुरक्षा से भी जुड़ी होती हैं।
- चीन और रूस को रोकना
मिडिल ईस्ट में चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी भी अमेरिका के लिए चुनौती मानी जाती है। इसलिए अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और कूटनीतिक उपस्थिति बनाए रखना चाहता है।
भारत-ईरान संबंध: दोस्ती, रणनीति या मजबूरी
भारत और ईरान के संबंध हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्तों से जुड़े हैं। लेकिन आधुनिक राजनीति में यह संबंध रणनीतिक संतुलन का हिस्सा बन गए हैं। कुछ मौके पर ईरान भारत के साथ खड़ा दिखाई देता है। जबकि, कश्मीर जैसे अति संवेदनशील मुद्दो पर ईरान का समर्थन पाकिस्तान को मिलता रहा है।
जब ईरान भारत के साथ खड़ा हुआ
चाबहार पोर्ट – भारत का सामरिक दांव। भारत और ईरान मिलकर चाबहार पोर्ट विकसित कर रहे हैं। इसका महत्व बहुत बड़ा है। यह पोर्ट भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच प्रदान करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात— यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के प्रभाव को संतुलित करता है। अफगानिस्तान के मुद्दे पर कई बार भारत और ईरान की रणनीति समान रही है। दोनों देशों ने शुरुआती दौर में तालिबान का विरोध किया था।
जब ईरान पाकिस्तान के करीब दिखा
ईरान हमेशा भारत के पक्ष में खड़ा रहा हो ऐसा भी नहीं है। ईरान और पाकिस्तान के बीच गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट कई वर्षों से चर्चा में है। अगर यह पूरी तरह सक्रिय हो जाए तो पाकिस्तान को बड़ा ऊर्जा स्रोत मिल सकता है। कुछ मौकों पर ईरान और पाकिस्तान ने सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की बात की है। हालांकि दोनों देशों के बीच भी कई बार तनाव रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि कश्मीर के मुद्दे पर अक्सर ईरान का समर्थन पाकिस्तान को मिलता रहा है।
भारत के लिए मौजूदा संकट क्यों खतरनाक है
मिडिल ईस्ट में युद्ध की स्थिति भारत के लिए कई चुनौतियां पैदा कर सकती है। सबसे अहम तो इससे तेल की कीमतों में उछाल आयेगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। अगर युद्ध बढ़ता है तो तेल कीमतें बढ़ सकती हैं। भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा भी जुड़ा है। मिडिल ईस्ट में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं। किसी बड़े युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। समुद्री व्यापार मार्ग पर संकट आयेगा। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है। अगर यह मार्ग प्रभावित होता है तो वैश्विक व्यापार भी प्रभावित होगा।
भारत को क्या करना चाहिए
- रणनीतिक संतुलन बनाए रखना: भारत को अमेरिका, ईरान और इजरायल—तीनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।
- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: भारत को रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ाना चाहिए।
- चाबहार पोर्ट को प्राथमिकता: यह प्रोजेक्ट भारत के लिए भू-रणनीतिक गेम चेंजर साबित हो सकता है।
- रक्षा कूटनीति मजबूत करना: भारत को मिडिल ईस्ट के कई देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना होगा।
- समुद्री सुरक्षा बढ़ाना: हिंद महासागर और अरब सागर में भारत की नौसेना की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा योजना: सरकार को युद्ध की स्थिति में निकासी योजना तैयार रखनी चाहिए।
- स्वतंत्र विदेश नीति: भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। इसी नीति को आगे भी जारी रखना होगा।
क्या दुनिया तीसरे बड़े संघर्ष की ओर बढ़ रही है
इतिहास एक अजीब पैटर्न दिखाता है। जब-जब महाशक्तियां संसाधनों और प्रभाव के लिए भिड़ती हैं, दुनिया के कई हिस्से युद्ध की आग में झुलस जाते हैं। आज मिडिल ईस्ट फिर उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। अगर यह संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक होगा। और भारत जैसे देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी— कि कैसे इस भू-राजनीतिक खेल में संतुलन बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जाए।
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