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ईरान के सामने अमेरिका कितना सफल रहा?

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क्या दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति सीमित हो चुकी है?

KKN ब्यूरो। जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की, तब पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञों का एक वर्ग भारत के नुकसान, लागत और जोखिमों का हिसाब लगाने में जुट गया। लेकिन सवाल यह है कि जब अमेरिका स्वयं ईरान से टकराया, तब उसका प्रदर्शन कैसा रहा? क्या अमेरिका ने निर्णायक जीत हासिल की? क्या ईरान अमेरिकी शक्ति के सामने टिक नहीं पाया या फिर दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां “सुपर पावर” की परिभाषा बदल रही है?

ऑपरेशन मिडनाइट हैमर: अमेरिका का सबसे बड़ा दांव

जून 2025 में अमेरिका ने “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के तहत ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों—फोर्डो, नतांज और इस्फहान—पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इस ऑपरेशन में B-2 स्टेल्थ बॉम्बर, 125 से अधिक विमान, टॉमहॉक मिसाइलें और 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बम शामिल थे।  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को “पूरी तरह तबाह” कर दिया गया है। लेकिन बाद की खुफिया और स्वतंत्र आकलन रिपोर्टों ने इस दावे पर सवाल खड़े किए।

क्या अमेरिका अपने घोषित लक्ष्य हासिल कर पाया?

यही वह बिंदु है जहां कहानी दिलचस्प हो जाती है। अमेरिकी और स्वतंत्र आकलनों में भारी अंतर दिखाई दिया। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम लगभग 2 वर्ष पीछे चला गया। लेकिन बाद में सामने आए अमेरिकी आकलनों में कहा गया कि तीन में से केवल एक परमाणु केंद्र को गंभीर रूप से नष्ट किया जा सका, जबकि बाकी दो केंद्र अपेक्षा से कम प्रभावित हुए। विशेषज्ञों का निष्कर्ष था कि कार्यक्रम समाप्त नहीं हुआ बल्कि केवल विलंबित हुआ। अर्थात अमेरिका ने सैन्य क्षमता का प्रदर्शन तो किया, लेकिन अपने राजनीतिक लक्ष्य—ईरान की परमाणु क्षमता को स्थायी रूप से खत्म करना—साबित नहीं कर पाया।

ईरान का पलटवार: क्या अमेरिका को नुकसान हुआ?

ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर स्थित अल-उदीद एयरबेस पर मिसाइल हमले किए। यह मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा माना जाता है। आधिकारिक आंकड़े क्या कहते हैं? अमेरिका और कतर दोनों ने कहा कि कोई अमेरिकी सैनिक नहीं मारा गया। अधिकांश मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने का दावा किया गया। सैटेलाइट तस्वीरों में एयरबेस के रडार डोम को नुकसान दिखाई दिया। इराक स्थित कुछ रडार और सैन्य प्रणालियों को भी नुकसान पहुंचने की रिपोर्टें सामने आईं।

वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना?

यहां समस्या यह है कि पेंटागन ने आज तक कोई अंतिम सार्वजनिक नुकसान रिपोर्ट जारी नहीं की है। इसलिए किसी निश्चित डॉलर आंकड़े का दावा करना प्रमाणिक नहीं होगा। हालांकि कुछ मीडिया और विश्लेषणों में अरबों डॉलर के सैन्य उपकरणों को जोखिम और क्षति की बात कही गई, लेकिन इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रमाणिक निष्कर्ष यह है कि अमेरिकी प्रतिष्ठानों को सीमित भौतिक नुकसान हुआ, लेकिन भारी मानव हानि का कोई विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

सबसे बड़ा नुकसान: प्रतिष्ठा का?

कई रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संघर्ष में अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक थी। कारण: 1. ईरान झुका नहीं और इतने बड़े हमले के बाद भी ईरान की सत्ता संरचना नहीं टूटी। 2. परमाणु कार्यक्रम खत्म नहीं हुआ। अमेरिका के अपने आकलनों में मतभेद दिखे। 3. अमेरिकी ठिकाने सुरक्षित नहीं दिखे अल-उदीद जैसे हाई-सिक्योरिटी बेस तक मिसाइलें पहुंचना ही एक संदेश था कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति अजेय नहीं है।

क्या सुपर पावर अमेरिका ईरान के सामने टिक नहीं पाया?

इस सवाल का उत्तर “हाँ” या “नहीं” में नहीं है। सैन्य स्तर पर अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना रखता है। सबसे बड़ा रक्षा बजट, वैश्विक सैन्य अड्डों का नेटवर्क, स्टेल्थ बॉम्बर क्षमता, परमाणु त्रयी और अत्याधुनिक नौसेना इन क्षेत्रों में ईरान अमेरिका की बराबरी नहीं करता। लेकिन राजनीतिक स्तर पर अफगानिस्तान, यूक्रेन, मध्य पूर्व और ईरान ने यह दिखाया है कि केवल सैन्य ताकत से राजनीतिक परिणाम सुनिश्चित नहीं किए जा सकते। यही अमेरिका की वर्तमान चुनौती है।

दुनिया में आज अमेरिका कहां खड़ा है?

2026 की दुनिया 1991 की दुनिया नहीं है। अब अमेरिका के सामने: चीन एक आर्थिक और तकनीकी प्रतिद्वंद्वी है। रूस सैन्य चुनौती बना हुआ है। ईरान जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी सीधे चुनौती देने लगे हैं। BRICS का विस्तार हो रहा है। डॉलर वर्चस्व पर भी बहस शुरू हो चुकी है। इसके बावजूद अमेरिका अभी भी: विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। डॉलर वैश्विक रिजर्व मुद्रा बना हुआ है। NATO और इंडो-पैसिफिक गठबंधनों का केंद्र है। अर्थात अमेरिका कमजोर नहीं हुआ है, लेकिन उसका एकध्रुवीय प्रभुत्व पहले जैसा नहीं रहा।

अमेरिका पर कोई क्यों भरोसा करे?

यह सवाल केवल भारत नहीं, यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया के कई देशों में पूछा जा रहा है। इतिहास में: वियतनाम, अफगानिस्तान, कुर्द सहयोगी, पाकिस्तान और यूक्रेन को लेकर बदलती नीतियां इन सभी उदाहरणों ने यह धारणा बनाई कि अमेरिका की विदेश नीति मित्रता से अधिक अपने हितों पर आधारित होती है। लेकिन यही बात लगभग हर बड़ी शक्ति पर लागू होती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भरोसा भावनाओं पर नहीं, हितों पर टिका होता है।

अमेरिका हारा नहीं, लेकिन अजेय भी नहीं

ईरान युद्ध का सबसे बड़ा सबक यह है कि अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है, लेकिन वह अब ऐसी शक्ति नहीं रह गई है जिसकी इच्छा मात्र से राजनीतिक परिणाम तय हो जाएं। ऑपरेशन मिडनाइट हैमर ने अमेरिकी ताकत दिखाई, लेकिन ईरान की प्रतिरोध क्षमता भी उजागर कर दी। शायद यही 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक सच्चाई है— अब युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। अब युद्ध धैर्य, अर्थव्यवस्था, तकनीक, सूचना और राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होते हैं। यही कारण है कि आज दुनिया अमेरिका से डरती जरूर है, लेकिन पहले जैसी निर्विवाद अमेरिकी सर्वशक्तिमानता पर विश्वास नहीं करती।

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