आठ साल पुराने चर्चित हत्याकांड में अदालत का फैसला
KKN ब्यूरो। बिहार के मुजफ्फरपुर शहर के बहुचर्चित पूर्व मेयर समीर कुमार और उनके चालक रोहित कुमार की हत्या के मामले में गुरुवार को मुजफ्फरपुर की अदालत ने बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में मामले के सभी छह आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। फैसले के दौरान अदालत ने पुलिस जांच और अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। इस निर्णय के साथ करीब आठ वर्षों से चल रहे इस चर्चित मुकदमे के पहले सेशन ट्रायल का पटाक्षेप हो गया। हालांकि, मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं की प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
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अदालत ने कहा- आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ऐसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में सफल नहीं रहा, जिनके आधार पर दोष सिद्ध किया जा सके। कोर्ट ने माना कि संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है और इस मामले में वह आवश्यक कानूनी मानकों को पूरा नहीं कर सका। इसी आधार पर अदालत ने सभी छह आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
किन आरोपियों को मिली राहत
अदालत ने जिन छह आरोपियों को बरी किया, उनमें— श्याम नंदन मिश्रा, सुशील कुमार छापड़िया, मृत्युंजय कुमार उर्फ पिंटू सिंह, नवीन कुमार, सुजीत कुमार और कुमार रंजय ओंकार शामिल हैं।
जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर कोर्ट की टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए अदालत ने पुलिस जांच और अभियोजन पक्ष की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि मामले में उपलब्ध कराए गए साक्ष्य आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। हालांकि अदालत की यह टिप्पणी मुकदमे के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया के मूल्यांकन तक सीमित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि घटना नहीं हुई, बल्कि यह कि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों का दोष कानूनी रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका।
2018 में हुई थी दोहरी हत्या
गौरतलब है कि 23 सितंबर 2018 की शाम चंदवारा नवाब रोड के समीप अपराधियों ने पूर्व मेयर समीर कुमार और उनके चालक रोहित कुमार पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी थीं। इस हमले में दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी। इस दोहरे हत्याकांड ने पूरे मुजफ्फरपुर को झकझोर दिया था और राज्यभर में इसकी चर्चा हुई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विशेष जांच शुरू की थी और बाद में कई लोगों को आरोपी बनाया गया।
मुकदमे के दौरान बदलते रहे हालात
इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में कुल 12 लोगों को आरोपी बनाया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुछ आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि छह आरोपियों के विरुद्ध चल रहे सेशन ट्रायल पर अब अदालत ने फैसला सुना दिया है।
कानूनी रूप से क्या मायने रखता है यह फैसला?
किसी आपराधिक मुकदमे में आरोपियों के बरी होने का अर्थ यह नहीं होता कि घटना नहीं हुई। इसका अर्थ केवल इतना होता है कि अदालत के समक्ष उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों के आधार पर आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं किए जा सके। भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक आरोपी निर्दोष माना जाता है और अभियोजन पक्ष पर ही आरोप साबित करने की जिम्मेदारी होती है।
अब आगे क्या?
अदालत के फैसले के बाद यदि अभियोजन पक्ष को लगता है कि निर्णय के विरुद्ध पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं, तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। फिलहाल, इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया संबंधित पक्षों के निर्णय पर निर्भर करेगी।
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