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भरत तिवारी एनकाउंटर: कानून का सवाल, जाति की बहस और सच की तलाश

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KKN ब्यूरो। भोजपुर के बिलौटी गांव का एक युवक…। फेसबुक लाइव…। पुलिस पर पिस्टल तानने का आरोप…। गोलीबारी…। अस्पताल…। मौत… और फिर सड़क पर उमड़ा जनाक्रोश…। भरत भूषण तिवारी का मामला अब केवल एक एनकाउंटर का मामला नहीं रह गया है। यह कानून, पुलिस की जवाबदेही, मानवाधिकार और सोशल मीडिया की राजनीति का विषय बन गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भरत तिवारी का एनकाउंटर नियम के अनुरूप हुआ था? अगर उसने हथियार डाल दिया था तो गोली क्यों चली?

क्या हुआ था?

भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के रहने वाले भरत भूषण तिवारी पर आरोप है कि उसने फेसबुक लाइव के दौरान पुलिस पर हथियार ताना और फायरिंग की। पुलिस का दावा है कि उसने आत्मसमर्पण नहीं किया और पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। इसी कार्रवाई में वह घायल हुआ और बाद में पीएमसीएच पटना में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। लेकिन परिवार और गांव वालों का दावा बिल्कुल अलग है। उनका आरोप है कि भरत ने हथियार छोड़ दिया था और आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बावजूद उसे गोली मारी गई। सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो और स्थानीय लोगों के दावों ने पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या भरत तिवारी अपराधी था?

यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप होना और अदालत द्वारा अपराधी घोषित किया जाना दो अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भरत तिवारी पर पुलिस को धमकाने और हथियार लहराने की बात कही जा रही है। लेकिन अभी तक ऐसी कोई सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है कि वह पहले से अपराधी था या किसी अदालत ने उसे किसी अपराध में दोषी ठहराया हो। इसलिए उसे “अपराधी” या “निर्दोष” घोषित करना अदालत और जांच एजेंसियों का विषय है…, मीडिया का नहीं।

एनकाउंटर का कानून क्या कहता है?

भारत में “एनकाउंटर” कोई अलग कानूनी प्रक्रिया नहीं है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशानिर्देश स्पष्ट हैं। पुलिस केवल आत्मरक्षा में घातक बल का प्रयोग कर सकती है। यदि आरोपी आत्मसमर्पण कर दे तो उसे गिरफ्तार करना होगा, सजा देने का काम अदालत का है। यदि पुलिस एनकाउंटर करती है तो हर एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच जरूरी है। एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए और पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक जांच अनिवार्य है। क्योंकि, कानून का मूल सिद्धांत है- “सरेंडर कर चुके व्यक्ति को दंड देने का अधिकार पुलिस को नहीं, अदालत को है।” यही कारण है कि यदि यह साबित होता है कि भरत तिवारी ने वास्तव में हथियार डाल दिया था, तो पुलिस कार्रवाई पर गंभीर कानूनी सवाल खड़े होंगे।

हथियार डालने के बाद गोली क्यों?

यही वह प्रश्न है जिसने पूरे बिहार को दो हिस्सों में बांट दिया है। पुलिस का पक्ष- पुलिस का कहना है कि उसने पहले फायरिंग की और पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाब दिया।  परिवार का पक्ष- परिवार और स्थानीय लोगों का आरोप है कि भरत ने हथियार फेंक दिया था और उसके बाद उसे गोली मारी गई। दोनों दावे एक साथ सही नहीं हो सकते। यही कारण है कि मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। मामला इतना गंभीर हो गया कि बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की और कहा कि पूरी घटना की सच्चाई सामने आनी चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया गया है और जांच शुरू की गई है।

जनाक्रोश इतना बड़ा क्यों?

यदि पुलिस का पक्ष पूरी तरह सही होता तो शायद इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर नहीं उतरते। आरा और भोजपुर में हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। सड़क जाम हुई। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। लोगों ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। यह जनाक्रोश बताता है कि स्थानीय स्तर पर पुलिस की कहानी पर भरोसा करने वाले लोगों की संख्या सीमित है। यहां समझने वाली बात ये है कि भरत तिबारी समाज के कमजोर वर्गो के हक की लड़ाई को लेकर पिछले लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे।

बात सोशल मीडिया की

भरत तिवारी की मौत के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा दिखाई दिया। पहला वर्ग- कुछ लोगों का कहना है कि यदि उसने हथियार डाल दिया था तो गोली नहीं चलनी चाहिए थी। कानून सबके लिए समान होना चाहिए। फर्जी एनकाउंटर लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। दूसरा वर्ग- यह वर्ग लिख रहा है कि “अपराधी की जाति नहीं देखनी चाहिए।” सोशल मीडिया पर ऐसे कई लोग है, जो इस एनकाउंटर को जायज और जरूरी बता रहें हैं।

सवाल तो उठेगा

मान लेतें हैं- भरत तिबारी अपराधी था। लेकिन जब उसने फेसबुक लाइव के दौरान ही हथियार डाल दिया। इसके बाद एनकाउंटर…। सवाल तो उठेगा। सवाल ये नहीं है कि किस जाति का एनकाउंटर हुआ है? सवाल ये क्या यह एनकाउंटर नियम सम्मत था? वह मानसिक तौर पर बिक्षिप्त था… या नहीं… ? इसको लेकर अलग-अलग दाबे है। यहां समझने वाली बात ये है कि भरत तिबारी दलित और पिछड़े समाज के हक की लड़ाई लड़ाई लड़ते हुए प्रशासन के निशाने पर था। असल मुद्दा यह है कि क्या आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्ति पर गोली चलाई गई? यदि जवाब “हाँ” है तो यह कानून का गंभीर उल्लंघन हो सकता है। यदि जवाब “नहीं” है और पुलिस पर पहले गोली चली थी तो पुलिस की कार्रवाई कानून के दायरे में आ सकती है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

जाति कहां से आ गई?

भरत का उपनाम “तिवारी” है। भारत की सामाजिक संरचना में उपनाम अक्सर जातीय पहचान से जोड़कर देखे जाते हैं। सोशल मीडिया के कुछ वर्गों ने यह तर्क देना शुरू किया कि भरत के समर्थन में इसलिए आवाज उठ रही है क्योंकि वह एक विशेष जाति से आता था। दूसरी ओर कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि उसे उसी जातीय पहचान के कारण निशाना बनाया गया। लेकिन अभी तक उपलब्ध तथ्यों में ऐसा कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि कार्रवाई का कारण उसकी जाति थी।

घृणा का स्तर कितना बढ़ गया है?

यह घटना एक और चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाती है। आज सोशल मीडिया पर किसी मौत, किसी दुर्घटना या किसी पुलिस कार्रवाई पर संवेदना व्यक्त करने से पहले लोग पीड़ित की जाति, धर्म और राजनीतिक पहचान खोजने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे इंसान की जान की कीमत उसकी पहचान से तय होने लगी हो। भरत तिवारी के मामले में भी यही हुआ। कुछ लोग न्याय की मांग कर रहे हैं। कुछ लोग पुलिस का समर्थन कर रहे हैं। जबकि लोकतंत्र का मूल प्रश्न केवल एक होना चाहिए कि क्या कानून का पालन हुआ या नहीं? भरत तिवारी की मौत अब केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं रही। यह बिहार पुलिस की जवाबदेही, न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा बन गई है। आज सबसे जरूरी है कि इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच हो, वायरल वीडियो की फॉरेंसिक जांच किया जाये, पुलिस और परिवार दोनों के दावों की सत्यता की जांच हो और राजनीतिक और जातीय शोर से ऊपर उठकर तथ्य आधारित निष्कर्ष निकाले जाये। क्योंकि यदि कोई दोषी है तो उसे सजा मिलनी चाहिए। लेकिन, यदि वह निर्दोष साबित हुआ तो…?

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