होमAgricultureबिहार के किसान और बेरोजगार: आखिर क्या है असली समाधान?

बिहार के किसान और बेरोजगार: आखिर क्या है असली समाधान?

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बिहार की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी नहीं, आय की कमी है

KKN ब्यूरो। बिहार की चर्चा होते ही दो शब्द सबसे अधिक सुनाई देते हैं—किसान और बेरोजगार। लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि बिहार की सबसे बड़ी समस्या केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि कम आय वाली अर्थव्यवस्था है। लाखों लोग काम तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी आमदनी इतनी कम है कि जीवन स्तर में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ पा रहा। यही कारण है कि बिहार से हर साल बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की ओर पलायन करते हैं। बिहार की सामाजिक संरचना, कृषि व्यवस्था और श्रम बाजार का अध्ययन बताता है कि यदि सरकार कुछ बुनियादी सुधार करे तो किसानों और बेरोजगार युवाओं की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव संभव है।

बिहार की सामाजिक संरचना क्यों बनती है आर्थिक विकास में बाधा?

बिहार का समाज गांव आधारित है। यहां आज भी बड़ी आबादी कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी आधार है। समस्या यह है कि कृषि भूमि लगातार छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई। राज्य में लगभग 83 प्रतिशत से अधिक जोतें एक हेक्टेयर से कम की हैं और कृषि रोडमैप के अनुसार 90 प्रतिशत से अधिक किसान सीमांत श्रेणी में आते हैं। ऐसे किसान आधुनिक खेती में निवेश नहीं कर पाते। भूमि का यह विखंडन उत्पादन बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा है।

बेरोजगारी का आंकड़ा कम, लेकिन समस्या बड़ी

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बिहार में बेरोजगारी दर बहुत अधिक नहीं दिखती। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वास्तविक समस्या “अंडर-एम्प्लॉयमेंट” यानी कम आय वाला रोजगार है। बहुत से लोग खेती, दिहाड़ी या पारिवारिक कार्यों में लगे हैं। तकनीकी रूप से वे बेरोजगार नहीं हैं, लेकिन उनकी आय इतनी कम है कि वे गरीबी से बाहर नहीं निकल पाते। यही वजह है कि कम बेरोजगारी दर के बावजूद बिहार से पलायन जारी है।

किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार क्या करे?

  1. खेती को उद्योग से जोड़ना होगा- बिहार देश में लीची, मखाना, मक्का, सब्जी और कई बागवानी उत्पादों का बड़ा उत्पादक है। लेकिन किसानों को मूल्य संवर्धन (Value Addition) का लाभ नहीं मिलता। यदि हर जिले में फूड प्रोसेसिंग पार्क स्थापित हों, तो किसान केवल कच्चा माल बेचने के बजाय प्रसंस्कृत उत्पाद बेच सकेंगे। उदाहरण के लिए— लीची से जूस, मक्का से स्टार्च, मखाना से पैकेज्ड स्नैक और सब्जियों का प्रोसेसिंग उद्योग इससे गांवों में रोजगार भी पैदा होगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी।
  2. किसान उत्पादक संगठन (FPO) को मजबूत करना- विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में छोटे किसानों की सबसे बड़ी समस्या बाजार तक पहुंच है। किसान अकेले बाजार में कमजोर पड़ जाता है। यदि सरकार पंचायत स्तर पर मजबूत FPO बनाए तो किसान सामूहिक खरीद और सामूहिक बिक्री कर सकेंगे। इससे लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा।
  3. मशीन बैंक और कस्टम हायरिंग सेंटर- छोटे किसान ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और आधुनिक उपकरण नहीं खरीद सकते। राज्य सरकार द्वारा पंचायत स्तर पर कस्टम हायरिंग सेंटर और फार्म मशीनरी बैंक की पहल की गई है। यदि इसका विस्तार किया जाए तो खेती की लागत कम होगी और उत्पादकता बढ़ेगी।
  1. फसल विविधीकरण- बिहार में आज भी बड़ी आबादी धान और गेहूं पर निर्भर है। विशेषज्ञों के अनुसार सब्जी, फल, मछली पालन, डेयरी और मधुमक्खी पालन जैसे क्षेत्रों में विस्तार से किसानों की आय कई गुना बढ़ सकती है।

बेरोजगार युवाओं के लिए सरकार क्या करे?

  1. जिला आधारित रोजगार मॉडल- हर जिले की अलग पहचान है। मुजफ्फरपुर – लीची, दरभंगा – मखाना, पूर्णिया – मक्का, भागलपुर – रेशम और गया – पर्यटन सरकार यदि जिला आधारित उद्योग नीति बनाए तो स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा हो सकता है।
  2. स्किल यूनिवर्सिटी और रोजगार गारंटी- बिहार में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। सरकार को उद्योगों की जरूरत के अनुसार कौशल प्रशिक्षण देना होगा। आईटी, ड्रोन तकनीक, कृषि तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।
  3. ग्रामीण BPO और डिजिटल रोजगार- कोविड के बाद वर्क फ्रॉम होम का मॉडल सफल साबित हुआ है। यदि ब्लॉक स्तर पर इंटरनेट और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाए तो हजारों युवाओं को गांव में रहकर रोजगार मिल सकता है।
  4. स्टार्टअप फंड और आसान ऋण- बिहार का युवा नौकरी मांगने वाला नहीं, अवसर मिलने पर नौकरी देने वाला भी बन सकता है। छोटे उद्यमों के लिए बिना जमानत ऋण, स्टार्टअप फंड और बाजार सहायता उपलब्ध करानी होगी।

महिलाओं को आर्थिक शक्ति बनाना होगा

बिहार में जीविका समूहों ने सामाजिक बदलाव का उदाहरण प्रस्तुत किया है। यदि महिलाओं को कृषि प्रसंस्करण, डेयरी, डिजिटल सेवाओं और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिल सकती है। देशभर के आंकड़े बताते हैं कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

सबसे बड़ा समाधान: गांव में गैर-कृषि रोजगार

किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था में केवल खेती से समृद्धि नहीं आती। बिहार में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता है। इसलिए गांवों में छोटे उद्योग, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन, प्रोसेसिंग यूनिट, वेयरहाउस और सेवा क्षेत्र विकसित करना होगा। ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार ही पलायन को रोक सकता है और स्थायी आय पैदा कर सकता है।

बिहार को “रोजगार राज्य” नहीं, “आय राज्य” बनना होगा

बिहार की समस्या का समाधान केवल सरकारी नौकरी नहीं है। न ही केवल कृषि सब्सिडी से बदलाव आएगा। जरूरत है कि सरकार कृषि + उद्योग + कौशल + उद्यमिता को एक साथ जोड़ने वाली नीति बनाए। जब किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा, गांव में उद्योग लगेंगे, युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा और महिलाओं को आर्थिक अवसर मिलेंगे, तब बिहार की अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत होगी। बिहार को अब बेरोजगारी के आंकड़ों से आगे बढ़कर आय बढ़ाने की राजनीति करनी होगी। यही किसानों और युवाओं दोनों के लिए स्थायी समाधान है।

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