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प्रयागराज में डॉक्टर की लापरवाही से महिला के पेट में छूट गया कॉटन स्पंज

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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां एसआरएन अस्पताल की एक महिला चिकित्सक ने ऑपरेशन के बाद एक महिला के पेट में कॉटन स्पंज छोड़ दिया। डॉक्टर की कथित लापरवाही के कारण महिला के गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई। इसके बाद महिला को एक निजी अस्पताल में दोबारा ऑपरेशन कराना पड़ा, जहां से कॉटन स्पंज को बाहर निकाला गया। महिला की जान बचाई जा सकी। इस घटना के डेढ़ साल बाद, 10 नवंबर 2025 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश पर कोतवाली थाना पुलिस ने महिला चिकित्सक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

घटना का विवरण और अस्पताल में इलाज

यह घटना मार्च 2024 की है, जब रन्नो प्रजापति, जो कि प्रतापगढ़ जिले के जमेठी कुंडा की निवासी हैं, एसआरएन अस्पताल में प्रसव पीड़ा के चलते भर्ती हुईं। उन्हें ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ी, लेकिन ऑपरेशन के दौरान उनके गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई। रन्नो को ऑपरेशन के बाद एसआरएन अस्पताल में ही रखा गया और 15 मार्च तक महिला चिकित्सक की देखरेख में इलाज जारी रहा। ऑपरेशन के बाद भी रन्नो पेट में लगातार दर्द की शिकायत करती रहीं, लेकिन चिकित्सक ने इसे गैस का असर बता कर टाल दिया।

शिकायत और डॉक्टर की लापरवाही

जब रन्नो ने डॉक्टर से दर्द की शिकायत की, तो चिकित्सक ने इसे गैस की वजह से होने वाला दर्द बताकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। इसके बाद, रन्नो को 15 मार्च को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। हालांकि, उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ और दर्द लगातार बढ़ता गया। परिजनों ने रन्नो को एक निजी अस्पताल में दिखाया, जहां अल्ट्रासाउंड से पता चला कि उनके पेट में ऑपरेशन के दौरान कॉटन स्पंज छोड़ दिया गया था।

निजी अस्पताल में दूसरा ऑपरेशन

रन्नो के पेट में छूटे हुए कॉटन स्पंज को हटाने के लिए 27 जुलाई 2024 को निजी अस्पताल में फिर से ऑपरेशन किया गया। इस ऑपरेशन के बाद उनकी हालत में सुधार आया और उनकी जान बचाई जा सकी। इस घटना ने रन्नो और उनके परिवार को शारीरिक और मानसिक रूप से गहरा आघात पहुँचाया।

पुलिस में शिकायत और कार्रवाई में देरी

रन्नो ने इस घटना के बारे में कई बार पुलिस को शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। रन्नो ने कोतवाली थाना से लेकर पुलिस आयुक्त तक शिकायत पत्र दिए, लेकिन फिर भी पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया। आखिरकार, रन्नो ने न्यायालय की शरण ली और वहां से आदेश मिलने के बाद, 10 नवंबर 2025 को कोतवाली थाना पुलिस ने महिला चिकित्सक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

एफआईआर और जांच की प्रक्रिया

कोतवाली थाना प्रभारी संजय कुमार राय ने बताया कि न्यायालय के आदेश पर एफआईआर दर्ज कर मामले की विवेचना की जा रही है। पुलिस इस मामले में जरूरी साक्ष्य जुटा रही है और चिकित्सक के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

चिकित्सा लापरवाही के प्रभाव

यह घटना चिकित्सा लापरवाही के गंभीर मुद्दे को उजागर करती है। जब डॉक्टर मरीज की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेते और लापरवाही करते हैं, तो यह न केवल मरीज के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उनके जीवन को भी संकट में डाल देता है। रन्नो के मामले में ऑपरेशन के बाद पेट में कॉटन स्पंज छोड़ने से ना केवल उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ी, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ा। इसके अतिरिक्त, गर्भस्थ शिशु की मौत ने परिवार के लिए एक अपरिवर्तनीय नुकसान किया।

न्याय व्यवस्था और चिकित्सा पेशेवरों की जिम्मेदारी

इस घटना से यह भी साफ होता है कि चिकित्सा पेशेवरों की जिम्मेदारी और उनके खिलाफ कार्रवाई में देरी दोनों एक बड़ा मुद्दा है। रन्नो की तरह कई मरीजों को न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हालांकि, न्यायालय ने अब इस मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है, जिससे उम्मीद जताई जा सकती है कि आरोपी डॉक्टर को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

पुलिस और न्यायालय की भूमिका

इस मामले में न्यायालय और पुलिस दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। न्यायालय के आदेश पर एफआईआर दर्ज होने से यह संकेत मिलता है कि चिकित्सा लापरवाही के मामलों में न्यायालय गंभीर है और ऐसे मामलों में पुलिस को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। रन्नो की तरह यदि अन्य मरीज भी अपनी शिकायतों को सही तरीके से दर्ज करवा पाते हैं तो वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।

प्रयागराज में महिला चिकित्सक द्वारा की गई लापरवाही का मामला एक गंभीर मुद्दा है, जो न केवल मरीजों की सुरक्षा को चुनौती देता है, बल्कि चिकित्सा पेशेवरों की जिम्मेदारी भी उजागर करता है। रन्नो प्रजापति की चिकित्सा लापरवाही के कारण हुई तकलीफ और शिशु की मृत्यु ने पूरे मामले को एक गहरे और संवेदनशील मुद्दे में बदल दिया है। इसके बाद पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना और मामले की जांच शुरू करना महत्वपूर्ण कदम है। इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि न्यायालय और पुलिस दोनों के संयोजन से ही मरीजों को न्याय मिल सकता है और चिकित्सा प्रणाली में सुधार हो सकता है।

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