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Gold Price में तेज उछाल, भारत में बदल रही है सोना खरीदने की आदत

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दुनिया के सबसे बड़े सोने के बाजारों में शामिल भारत में सोने की खरीद को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। Gold Price 46 साल की सबसे बड़ी सालाना बढ़त की ओर बढ़ रही है। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की खरीदारी पर पड़ा है। लोग अब पारंपरिक गहनों की जगह छोटे gold coins और gold bars को प्राथमिकता दे रहे हैं।

लंबे समय तक भारत में सोने के गहने परंपरा, समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रहे हैं। शादी, त्योहार और पारिवारिक अवसरों पर गहनों की खरीद आम बात थी। लेकिन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची कीमतों ने अब लोगों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर कर दिया है। बढ़ती लागत के चलते लोग अब निवेश के नजरिये से सोने की खरीद कर रहे हैं।

त्योहारों की खरीद में दिख रहा है बदलाव

मुंबई की गृहिणी प्राची कदम करीब दो दशकों से हर त्योहार पर सोने के गहने खरीदती रही हैं। यह उनके लिए परंपरा और व्यक्तिगत पसंद दोनों का हिस्सा था। लेकिन इस साल बढ़ती कीमतों ने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने इस बार हार या चूड़ियों की जगह 10 ग्राम का gold coin खरीदा।

प्राची कदम का कहना है कि गहने अब भी कार्यक्रमों में पहनने के लिए उपयोगी हैं। लेकिन making charges के रूप में लगभग 15 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान करना मुश्किल हो गया है। वह भी लाखों भारतीयों की तरह त्योहारों पर सोना खरीदना शुभ मानती हैं। इसी कारण उन्होंने इस बार coin खरीदकर संतुलन बना लिया।

रिकॉर्ड कीमतों से बाजार में Structural Shift

यह बदलाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे देश में दिख रहा है। Gold Price के 46 साल के उच्चतम स्तर की ओर बढ़ने से भारतीय gold market में structural shift आ रहा है। गहनों की मांग धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। वहीं investment purpose से सोने की खरीद बढ़ रही है।

भारत में सोने का सांस्कृतिक महत्व आज भी मजबूत है। लेकिन affordability अब खरीद के तरीके तय कर रही है। छोटे coins और bars कम अतिरिक्त लागत के साथ सोने का स्वामित्व देते हैं। इससे उपभोक्ताओं को लचीलापन भी मिलता है।

Global Factors ने बढ़ाई Gold Price

वैश्विक स्तर पर कई कारणों से सोने की कीमतों में तेज उछाल आया है। Safe haven assets की मजबूत मांग ने gold price को सहारा दिया। अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से भी तेजी आई। कमजोर डॉलर ने भी कीमतों को ऊपर पहुंचाया।

इस साल अब तक वैश्विक gold price में करीब 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 26 दिसंबर को कीमतें 4,549.7 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। इसका असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ा।

रुपये की कमजोरी से घरेलू कीमतों में उछाल

डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब पांच प्रतिशत की गिरावट आई है। इस कारण भारत में घरेलू gold price और अधिक बढ़ गई। नतीजतन, इस साल भारत में सोने की कीमतों में लगभग 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

यह बढ़त शेयर बाजार से कहीं ज्यादा रही। इसी अवधि में Nifty 50 Index केवल 9.7 प्रतिशत चढ़ा। इस वजह से सोना भारतीय परिवारों के लिए सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली संपत्तियों में शामिल रहा।

कीमतों के अनुसार बदल रही है खरीदारी

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव कुल मांग में बड़ी गिरावट को रोक रहा है। यह ट्रेंड 2026 तक जारी रह सकता है। वैश्विक स्तर पर भी महंगे bullion के चलते jewellery demand कमजोर हो रही है।

अधिकतर उपभोक्ता गहने पूरी तरह छोड़ नहीं रहे हैं। वे अब हल्के डिजाइन या कम वजन के गहने चुन रहे हैं। इससे परंपरा भी बनी रहती है और बजट भी नियंत्रित रहता है।

हल्के गहनों की बढ़ती मांग

कोलकाता की निबेडिता चक्रवर्ती ने भी अपनी खरीदारी की रणनीति बदली है। बढ़ती कीमतों के साथ उनका घरेलू बजट तालमेल नहीं बिठा पा रहा था। अब वह हल्के वजन के गहने पसंद कर रही हैं।

सोने की चेन में छह या सात ग्राम की कमी से बड़ा अंतर पड़ता है। इससे एक लाख रुपये से ज्यादा की बचत हो सकती है। Middle income परिवारों में weight conscious buying तेजी से बढ़ रही है।

Design और Value पर फोकस

पी एन गाडगिल ज्वेलर्स के चेयरमैन सौरभ गाडगिल के अनुसार, उपभोक्ता अब design और value दोनों पर ध्यान दे रहे हैं। कीमतों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है। इसी कारण खरीदारी का तरीका बदला है।

कंपनी ने जून में हल्के और कम कैरेट गहनों के लिए नया sub brand लॉन्च किया। आधुनिक कारीगरी ने lightweight jewellery को आकर्षक बना दिया है। अब ये केवल entry level विकल्प नहीं रहे।

गाडगिल का कहना है कि खरीदार बिना दबाव के सोने का स्वामित्व चाहते हैं। हल्के डिजाइन अब स्टाइल और affordability दोनों का संतुलन पेश करते हैं।

Gold Demand में सालाना गिरावट

World Gold Council के आंकड़ों के अनुसार, 2025 के पहले नौ महीनों में भारत की कुल gold demand में 14 प्रतिशत की गिरावट आई। इस दौरान jewellery consumption में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

गहनों की मांग घटकर 278 metric ton रह गई। इसके उलट investment demand में 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। निवेश की मात्रा 185 metric ton तक पहुंच गई।

कुल मांग में investment की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत रही। यह दर्शाता है कि भारतीय परिवार आज भी सोने को wealth preservation के रूप में देखते हैं।

Investment की ओर झुकाव मजबूत

India Bullion and Jewellers Association के अध्यक्ष पृथ्वीराज कोठारी का मानना है कि यह ट्रेंड 2026 तक जारी रह सकता है। Gold अन्य asset class से बेहतर प्रदर्शन करता रहेगा।

उपभोक्ता coins, bars और gold ETF के रूप में सोना खरीद रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि तेजी बनी रहेगी। Investment format में liquidity और कम अतिरिक्त लागत का फायदा मिलता है।

Gold ETF में बढ़ता निवेश

World Gold Council के अनुसार, इस साल भारत में gold backed ETF में 3.3 अरब डॉलर का निवेश हुआ। यह करीब 28.7 metric ton सोने के बराबर है।

ETF holdings बढ़कर 86.2 metric ton हो गई हैं। Digital प्लेटफॉर्म के चलते paper gold की स्वीकार्यता बढ़ रही है। युवा निवेशक भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं।

Jewellery Demand में कमजोरी जारी रह सकती है

Industry consultancy Metals Focus का अनुमान है कि jewellery demand में कमजोरी 2026 तक बनी रह सकती है। पूरे साल में गहनों की खपत में नौ प्रतिशत और गिरावट आ सकती है।

महंगे सोने ने उपभोक्ताओं को कम कैरेट और हल्के डिजाइनों की ओर मोड़ा है। यह बदलाव अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक माना जा रहा है।

Low Carat Jewellery को मिल रही स्वीकार्यता

डीपी अभूषण लिमिटेड के चेयरमैन संतोष कटारिया के अनुसार, low carat jewellery की मांग बढ़ रही है। 18 carat और 14 carat विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

खासतौर पर युवा और कामकाजी पेशेवर इन्हें पसंद कर रहे हैं। इससे बजट भी संभलता है और डिजाइन से समझौता नहीं होता। रोजमर्रा के उपयोग के लिए यह बेहतर विकल्प बन रहे हैं।

बदलाव के दौर से गुजर रहा है Gold Market

भारत का gold market एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। बढ़ती कीमतें पारंपरिक खरीदारी को बदल रही हैं। Investment demand अब jewellery से आगे निकल रही है।

Coins, bars और ETF सतर्क निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। गहनों का सांस्कृतिक महत्व बना हुआ है, लेकिन वजन कम हो रहा है। आर्थिक हकीकत और बदलती सोच इस बदलाव की दिशा तय कर रही है।

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