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नेपाल संकट: सेना की पहल, सुशीला कार्की संभालेंगी अंतरिम सत्ता

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काठमांडू दो दिनों तक हिंसक प्रदर्शनों और उग्र विरोध की आग में जलता रहा। KP Sharma Oli सरकार गिरने के बाद राजनीतिक हालात पूरी तरह अस्थिर हो गए। ऐसे में Nepal Army ने हालात को काबू करने के लिए सीधे हस्तक्षेप किया और राजधानी में नियंत्रण संभाला।

सेना का कहना है कि सबसे पहले उसका लक्ष्य कानून-व्यवस्था बहाल करना है। लूटपाट, आगज़नी और झड़पों से शहर अशांत था, जिसे काबू में लाना अब पहली प्राथमिकता है। इस बीच Army Chief जनरल अशोक राज सिग्देल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को Interim Government का नेतृत्व करने के लिए तैयार कर लिया है।

आज आर्मी हेडक्वार्टर में इस प्रस्ताव पर बड़ी बैठक आयोजित की जाएगी। माना जा रहा है कि यह बैठक Nepal Politics में नया मोड़ साबित होगी।

आधी रात तक चली बातचीत

जनरल सिग्देल ने यह निर्णय अचानक नहीं लिया। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने देर रात तक Gen Z Movement के नेताओं और अन्य प्रमुख हस्तियों से कई दौर की बातचीत की।

करीब रात 2 बजे वह सुशीला कार्की के धापासी स्थित आवास पहुँचे और उनसे अनुरोध किया कि वे इस कठिन दौर में देश का नेतृत्व करें। शुरू में कार्की ने अनिच्छा जताई और ज़िम्मेदारी लेने से मना किया।

लेकिन लगभग पंद्रह घंटे की मशक्कत और विभिन्न समूहों की अपील के बाद उन्होंने हामी भर दी। Gen Z समूहों ने भी औपचारिक तौर पर उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया, जिससे सेना की योजना को मजबूती मिली।

बालेन्द्र शाह ने दिया समर्थन

काठमांडू के मेयर Balendra Shah, जिन्हें लोग बालेन शाह के नाम से जानते हैं, का नाम भी Interim Head की दौड़ में था। लेकिन उन्होंने स्वयं सुशीला कार्की का समर्थन किया और कहा कि वह इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं।

बालेन्द्र शाह के समर्थन से कार्की के नेतृत्व को और मज़बूती मिली। युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच शाह का प्रभाव काफी गहरा है, और उनकी राय ने राजनीतिक स्थिति को स्पष्ट कर दिया। अब Nepal Army की निगरानी में Bangladesh Model पर आधारित Interim Government बनने की राह लगभग साफ हो गई है।

सेना की प्राथमिकताएँ

जनरल सिग्देल ने साफ कर दिया है कि नई व्यवस्था की शुरुआत शांति और कानून व्यवस्था से होगी।

  • हिंसा पर काबू पाना और सड़कों पर सुरक्षा सुनिश्चित करना।

  • सभी राजनीतिक दलों और युवा समूहों को वार्ता की मेज पर लाना।

  • साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करना।

सेना चाहती है कि गुरुवार या शुक्रवार तक Interim Government का औपचारिक गठन कर दिया जाए।

पहली महिला मुख्य न्यायाधीश से राष्ट्रीय नेतृत्व तक

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला Chief Justice रही हैं। जून 2017 में वह रिटायर हुईं। लेकिन रिटायरमेंट से पहले ही उन्हें संसद में विपक्षी दलों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। उनके पद छोड़ते ही यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया।

अब एक बार फिर वह देश के इतिहास में अहम भूमिका निभाने जा रही हैं। Nepal Army के सहयोग से वह नई संविधान प्रक्रिया की निगरानी करेंगी। मौजूदा संविधान, जो दस साल पहले लागू हुआ था, अब लगभग अप्रभावी माना जा रहा है।

सेना की पूर्व चेतावनी

यह घटना उस चेतावनी की भी याद दिलाती है जो इस साल मार्च 2025 में दी गई थी। उस समय जनरल सिग्देल ने प्रधानमंत्री ओली को आगाह किया था कि वे पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह को न तो गिरफ्तार करें और न ही नजरबंद।

2006 में जब नेपाल ने धर्मनिरपेक्ष गणराज्य का रास्ता अपनाया था, तब Royal Nepal Army का नाम बदलकर Nepal Army कर दिया गया था। संस्था ने खुद को राजनीति से दूर रखने का ऐलान किया था। लेकिन जब भी राजनीतिक संकट गहराया, सेना ने हस्तक्षेप कर हालात को नियंत्रित किया।

सेना की ऐतिहासिक भूमिका

Nepal Army कई बार देश के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर चुकी है। मई 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड ने सेना प्रमुख रूकमंगद कटवाल को हटाने की कोशिश की थी।

लेकिन राष्ट्रपति रामबरन यादव ने इस निर्णय को खारिज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि प्रचंड को इस्तीफा देना पड़ा। उस समय भी सेना ने अपनी संस्थागत शक्ति और प्रभाव का परिचय दिया था।

आज भी स्थिति मिलती-जुलती है, फर्क बस इतना है कि इस बार सेना सीधे सत्ता नहीं ले रही। बल्कि सुशीला कार्की को Interim Government का नागरिक चेहरा बनाकर सामने ला रही है।

Gen Z आंदोलन की ताकत

Nepal के हालिया प्रदर्शनों में Gen Z Movement की भूमिका सबसे अहम रही है। युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से परेशान होकर सड़कों पर उतरी।

उनकी आवाज़ ने सरकार पर दबाव डाला और Oli Government का पतन तेज़ कर दिया। जनरल सिग्देल ने Gen Z नेताओं से लगातार संवाद कर यह स्वीकार किया कि नई राजनीति में युवाओं की अहम भूमिका होगी।

उनका समर्थन सुशीला कार्की के लिए भी अहम साबित हुआ। यह Nepal Politics में एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है।

अंतरराष्ट्रीय नजरें

नेपाल की इस अचानक बदलती स्थिति पर अब अंतरराष्ट्रीय निगाहें टिकी हैं। भारत, चीन, अमेरिका और यूरोपीय देश नेपाल की स्थिरता में गहरी रुचि रखते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि Bangladesh Model पर आधारित व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति मिल सकती है, यदि इससे शांति और स्थिरता सुनिश्चित हो।

पड़ोसी देश अभी सतर्क रुख अपनाएंगे और देखेंगे कि Interim Government किस तरह से गठित होती है और कितना समावेशी रूप अपनाती है।

आगे की राह

विश्लेषकों के अनुसार, Interim Government का रोडमैप तीन चरणों में होगा। पहले कानून-व्यवस्था बहाल करना। फिर संवैधानिक सुधारों पर ध्यान देना। उसके बाद स्थायी राजनीतिक समाधान खोजना।

संविधान में संघीय ढांचे, अल्पसंख्यक अधिकारों और शासन प्रणाली पर बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है।

सुशीला कार्की की छवि एक निष्पक्ष और ईमानदार न्यायाधीश की रही है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं।

चुनौतियाँ और उम्मीदें

Interim Government के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनविश्वास बहाल करना है। हिंसक प्रदर्शनों ने जनता के बीच गहरी नाराज़गी पैदा की है।

युवा समूह तत्काल सुधार चाहते हैं जबकि पारंपरिक राजनीतिक दल अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

आर्थिक मोर्चे पर भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं। प्रदर्शनों ने व्यापार और पर्यटन को प्रभावित किया है। Nepal Economy पहले ही नाजुक स्थिति में थी। ऐसे में विदेशी सहायता और सहयोग अहम साबित होंगे।

नेपाल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। Nepal Army के हस्तक्षेप ने सत्ता समीकरण बदल दिए हैं। सुशीला कार्की का Interim Government का नेतृत्व स्वीकार करना जनता में नई उम्मीद जगाता है।

युवा संगठनों, राजनीतिक नेताओं और बालेन्द्र शाह जैसे लोकप्रिय चेहरों का समर्थन उन्हें और मज़बूती देता है।

लेकिन रास्ता आसान नहीं है। शांति बहाली, जनता का विश्वास और नई राजनीतिक दिशा बनाना कठिन परीक्षा होगी।

यह संक्रमण नेपाल के भविष्य की राजनीति को तय करेगा। सवाल यही है कि क्या यह प्रयोग स्थिर लोकतंत्र की राह खोलेगा या सिर्फ एक और अस्थायी व्यवस्था बनेगा।

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