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केन्द्र के गले की फांस बन सकता है तेल का खेल

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सियासी मुहरा न बन जाये पेट्रोल की कीमत

तेल का खेल अब भाजपा के गले की फांस बनने लगा है। तेल की कीमतों में हो रही लगातार बृद्धि और इसके बाद एक पैसे की कमी को आम उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा है।

सोशल मीडिया पर तेल के इस खेल को लेकर जो चर्चाए आम है, उसका खामियाजा केन्द्र सरकार को भुगतना पड़े तो इसमें किसी को अश्चर्य नही होगा। सवाल उठता है कि तेल के इस खेल का सर्वाधिक लाभ किसको हो रहा है? विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार ने वर्षों तक सस्ते कच्चे तेल की कीमतों का फायदा लोगों तक नहीं पहुंचाया और इसी दौलत से सरकारी खजाना भरते रहे। उधर, बीजेपी के नेता कह रहे हैं कि तेल जब भी महंगा होता है तो इसका सर्वाधिक लाभ राज्य की सरकारो को होती हैं। अब लाभ चाहे केन्द्र की सरकार को हो या राज्य की सरकारो को, खामियाजा तो आम लोगो को ही भुगताना पड़ रहा है।
ऐसे होता है मूल्य का निर्धारण
दरअसल, पेट्रोल पम्प पर तेल आपको किस कीमत पर मिलेगा? इसका निर्धारण तीन स्तरो पर होता है। अव्वल तो ये कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत इसका सबसे पहला मापदंड है। इसके अतिरिक्त केन्द्र और राज्य सरकारें उसपर कितना टैक्स वसूल रही हैं? आपको बतातें चलें कि तेल के कीमत से लगभग डेढ़ गुणा टैक्स उपभोक्ताओं को चुकता करना पड़ रहा है। जानकार बतातें हैं कि यदि सरकारी टैक्स का समुचित निर्धारण हो जाये भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत लगभग आधी रह जाएगी।
एक साल से नही बदला एकसाइज ड्यूटी
बतातें चलें कि केन्द्र सरकार पेट्रोल डीजल पर एक्साइज ड्यूटी लगाती है और राज्य की सरकारें वैट और सेल्स टैक्स वसूलती हैं। ध्यान देने की बात ये है केन्द्र सरकार द्वारा लगाई जाने वाली एक्साइज ड्यूटी का सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमत से कोई लेना-देना नहीं है और ये तभी बदलता है जब केन्द्र सरकार खुद इसमें बदवाल करे। इस वक्त पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 19.48 रूपए प्रति लीटर और डीजल पर 15.33 रूपए प्रति लीटर है। इसमें आखिरी बार बदलाव 4 अक्टूबर 2017 को किया गया था। लेकिन राज्यों द्वारा पेट्रोल-डीजल पर वसूला जाने वाले वैट और सेल्स टैक्स का फॉर्मूला ऐसा है कि जितनी ज्यादा कीमत बढ़ेंगी, राज्य सरकार का टैक्स भी खुद-ब-खुद बढ़ता जाएगा। यानी तेल जितना मंहगा बिकेगा, राज्यों की कमाई उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। लेकिन क्या सचमुच तेल से सबसे ज्यादा कमाई राज्य की सरकार कर रही हैं?
जानिए सरकारी टैक्स का खेल
पेट्रोल पर पर सबसे ज्यादा टैक्स बीजेपी शासित महाराष्ट्र सरकार वसूलती है जहां इस पर 38.76 प्रतिशत वैट लगता है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश करीब 22 रूपए, पंजाब करीब 21 रूपए, तेंलगाना करीब 20 रूपए प्रति लीटर की कमाई टैक्स वसूली के जरिए कर रहे हैं। केंद्र में मोदी सरकार के आने से पहले 1 अप्रैल 2014 को सेन्ट्रल एक्साइज ड्यूटी पेट्रोल पर प्रति लीटर 9.48 रूपए और डीजल पर 3.56 रूपए थी। बिहार में डीजल 19 फीसदी और पेट्रोल पर 26 फीसदी का वैट देना पड़ता है।
386 फीसदी बढ़ा टैक्स
मोदी सरकार ने आते ही टैक्स में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी करनी शुरू कर दी। दो साल के भीतर ही मार्च 2016 तक पेट्रोल पर एक्साइज 126 प्रतिशत यानी 9.48 रूपए से बढ़कर 21.48 रूपए प्रति लीटर तक पहुंच गया। डीजल में एक्साइज ड्यूटी तो और भी जबरदस्त तरीके से बढी़। दो साल के भीतर मार्च 2016 तक, डीजल पर एक्साइज 386 प्रतिशत, यानी करीब चार गुना बढ़कर, 17.33 रूपए प्रति लीटर तक पहुंच गया। पीपीएसी के आंकड़ों के मुताबिक 2014 से 2017 के बीच में तेल पर टैक्स से राज्यों की आमदनी 21 प्रतिशत बढ़ी. लेकिन इसी दौरान केन्द्र सरकार ने एक्साइड ड्यूटी बढ़ाकर तेल से अपनी कमाई 144 प्रतिशत बढ़ा ली।

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