मोहम्मद अली जिन्ना और सिख नेताओं के बीच टकराव: पंजाब के बंटवारे की असली कहानी

Mohammad Ali Jinnah

भारत की आज़ादी जितनी अहम थी, उतनी ही बड़ी त्रासदी उसका बंटवारा रहा। विभाजन ने पंजाब और बंगाल को झकझोर कर रख दिया। यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय आपदा कही जाती है, जिसमें करीब 10 लाख लोग मारे गए और एक करोड़ से अधिक लोगों ने पाकिस्तान से भारत की ओर पलायन किया। इनमें हिंदू और सिख सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। विशेषकर पंजाब में लोगों ने अपनी संपत्ति, घर और ज़मीन छोड़कर खाली हाथ सीमाएं पार कीं।

जिन्ना की मंशा: पूरा पंजाब पाकिस्तान में

आज पंजाब दो हिस्सों में बंटा है—एक भारत में और दूसरा पाकिस्तान में। लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि पूरा पंजाब उनके इस्लामिक मुल्क का हिस्सा बने। इस सिलसिले में जिन्ना ने सिख नेताओं से मुलाकात की थी। इनमें मास्टर तारा सिंह और पटियाला के महाराजा जैसे नेता शामिल थे।

जिन्ना ने सिख नेताओं से कहा था कि अगर वे उनके प्रस्ताव पर दस्तखत कर दें तो पूरा पंजाब पाकिस्तान में शामिल होगा और सिखों को स्वायत्तता दी जाएगी।

सिख नेताओं की शर्त: लिखित आश्वासन

इतिहासकार तर्लोचन सिंह के मुताबिक, सिख नेताओं ने जिन्ना से सीधा सवाल किया—“आप तो कह देंगे, लेकिन आपके बाद क्या होगा?” जिन्ना ने जवाब दिया कि उनकी बात को कोई नकार नहीं पाएगा। मगर सिख चाहते थे कि यह आश्वासन संविधान में लिखा जाए। जब जिन्ना ने लिखित गारंटी देने से इनकार किया, तो यहीं से विवाद शुरू हो गया।

सिखों का विरोध और पंजाब का बंटवारा

उस वक्त पंजाब मुस्लिम बहुल इलाका था। अगर सिखों ने विरोध नहीं किया होता तो पूरा पंजाब पाकिस्तान में चला जाता। लेकिन सिख नेताओं की दृढ़ता के कारण पंजाब का विभाजन हुआ और इसका एक बड़ा हिस्सा भारत में रहा। यही कारण है कि सिख पहचान आज भी भारतीय पंजाब से जुड़ी हुई है।

विभाजन की पीड़ा और सिख असंतोष

विभाजन का ज़ख्म आज भी सिखों के दिलों में ताज़ा है। लाखों सिख मारे गए, लाखों को पलायन करना पड़ा और ननकाना साहिब जैसा पवित्र स्थल पाकिस्तान में रह गया। सिखों का मानना है कि उनके बलिदानों को उचित मान्यता नहीं मिली। तर्लोचन सिंह का कहना है कि आज भी सिख यह मलाल जताते हैं कि कभी उनकी सीमा अटारी से गुरुग्राम तक फैली थी, लेकिन आज वे सीमित होकर रह गए हैं।

सिख अलगाववाद की जड़ें

तर्लोचन सिंह के अनुसार, सिख अलगाववाद की जड़ें भी विभाजन के समय की घटनाओं में छिपी हैं। उनका कहना है कि विभाजन के दौरान हुए नुकसान और बलिदानों की अनदेखी ने लंबे समय तक असंतोष को जन्म दिया। यही असंतोष आगे चलकर अलगाववादी सोच में बदलता गया।

इतिहास पढ़ाने की जरूरत

तर्लोचन सिंह ने यह भी कहा कि विभाजन का पूरा इतिहास देश में पढ़ाया ही नहीं गया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान भी इस पर जोर दिया था। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को सिख बलिदानों और विभाजन की असली तस्वीर से अवगत कराना ज़रूरी है।

सिख नेताओं और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच टकराव ने इतिहास की दिशा बदल दी। अगर सिखों ने जिन्ना का प्रस्ताव मान लिया होता तो पूरा पंजाब पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता। लेकिन सिखों के विरोध ने भारत को पंजाब का बड़ा हिस्सा दिलाया। बावजूद इसके, विभाजन के ज़ख्म और उससे जुड़े मलाल आज भी सिख समाज को खलते हैं। यह घटना न सिर्फ पंजाब बल्कि पूरे देश के इतिहास में गहरी छाप छोड़ गई।

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