फंदा गले में पहन कर भगत सिंह ने मजिस्टेट से क्या कहा

उन्हें यह फ़िक्र है, हरदम… नई तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है? हमें यह शौक है, देखें… सितम की इन्तिहां क्या है? इस पंक्ति के रचनाकार, शहिदे आजम भगत सिंह आज भी सियासी सितम के शिकार है। आजादी के सात दशक बाद भगत सिंह को शहीद का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। कहतें हैं कि वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अनमोल हीरा थें। सवाल उठता है कि भगत सिंह को तय समय से पहले ही फांसी क्यों दे दिया गया? जिस रात फांसी पर चढ़ाया गया, ठीक उससे पहले जेल में ऐसा क्या हुआ कि ब्रटिश हुकूमत की चूलें हिल गई? गले में फंदा पहने भगत सिंह ने वहां मौजूद मजिस्टेट को ऐसा क्या कह दिया… जो, इतिहास बन गया। शहीदे आजम भगत सिंह से जुड़ी, ऐसे और भी कई सवाल है।

23 मार्च की शाम चुपके से दिया फांसी

KKN न्यूज ब्यूरो। वह 24 मार्च 1931 की सुबह थी। सूरज की पहली किरण के साथ फिजां में एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी थी। एक खबर लोग को परेसान करने लगा था। खबर की सच्चाई को जानने के लिए लोग उतावले हो रहे थे। दरअसल, लोगो को पता चला था कि 23 मार्च की शाम को शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दिया गया है। कहतें हैं कि जंगल में लगी आग की तरह यह खबर चंद पलो में भी पूरे देश में फैल गया। सच को जानने के लिए लोग यहां-वहां भागे जा रहे थे। तभी कुछ लोगो की नजर अखबार पर पड़ी। काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च 1931 की शाम 7.33 पर फांसी देने की बात अखबार में छपी हुई थी। वह सोमवार का दिन था। लोगो में घोर निराशा छा गया। ऐसा लगा मानो उसका कोई अपना खो गया है।

क्यों डर गए थे अंग्रेज

सवाल उठता है कि तय समय से पहले ही आजादी के दिवानो को फांसी पर क्यों चढ़ा दिया गया? दरअसल, केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकने के जिस मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी, उसकी तारीख 24 मार्च तय थी। जबकि, ब्रिटिश हुकूमत ने 23 मार्च की शाम को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपके से फांसी पर चढ़ा दिया। बताया जाता है कि फांसी को लेकर उस समय पूरे भारत में जिस तरह से विरोध प्रदर्शन हुए, इससे ब्रिटिश हुकूमत डर गई और उसी का नतीजा हुआ कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।

भगत सिंह ने मजिस्टेट से क्या कहा

ठीक फांसी के वक्त लाहौर के सेंट्रल जेल में ऐसा क्या हुआ था, जिससे अंग्रेज अधिकारी के भी होश उड़ गए? दरअसल, फांसी के समय उस वक्त वहां यूरोप से आये एक डिप्टी कमिश्नर मौजूद थे। जितेन्द्र सन्याल ने अपनी पुस्तक ‘भगत सिंह’ में लिखा है कि फांसी के फंदा को आलिंगन करने से ठीक पहले भगत सिंह ने वहां मौजूद मजिस्टेट को संबोधित करते हुए कहा… ‘मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप बेहद भाग्यशाली हैं। क्योंकि, आपको यह देखने का मौका मिल रहा है कि भारत के क्रांतिकारी, किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर झूल जाते हैं…।’ भगत सिंह के इस अल्फाज को सुन कर वहां मौजूद सभी अधिकारी सकते में आ गए। कहतें हैं कि भगत सिंह के मुंह से निकला, यह आखरी वाक्य था। इसके तुरंत बाद उनको फांसी पर चढ़ा दिया गया।

फांसी से ठीक पहले क्या कर रहें थें भागत सिंह

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत से कुछ देर पहले लाहौर सेंट्रल जेल का नजारा रोमांच करने वाला था। किताबो का अध्ययन करने से पता चलता है कि 23 मार्च 1931 की शाम फांसी पर चढ़ने से चंद मिनट पहले भगत सिंह, लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्त आ गया है, तो उन्होंने कहा- ‘ठहरिये…! अभी एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है…।’ भगत सिंह के इस आत्मविश्वास को देख कर जेल के अधिकारी हैरान थे। अचानक एक मिनट बाद, किताब को छत की ओर उछाल कर भगत सिंह बोले- ‘ठीक है… अब चलो…।’

जब इंकलाब के नारो से गूंज उठा सेंट्रल जेल

जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अपने वार्ड से फांसी घर की ओर जाने लगे, जेल के सभी कैदी, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। करीब 15 मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद की गूंज से लाहौर सेंट्रल जेल का कोना- कोना गूंज उठा। आलम ये था कि अंग्रेज के अधिकारी भी सहम गए। इधर, फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के चेहरे पर खौफ की जगह मस्ती का आलम था। वह तीनो मस्ती में झुमते हुए गीत गा रहे थे- ‘मेरा रंग दे बसंती चोला, माए, रंग दे बसंती चोला…।’

शहीद के शव को जलाने का क्यों किया प्रयास

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने के बाद अंग्रेज अधिकारी इतने डर गए कि फांसी के बाद अंग्रेजों ने शहीद के शरीर के टुकड़े- टुकड़े करके, बोरियों में भरा और चुपके से उन बोरियों को दूसरे दरबाजे से निकाल कर फिरोजपुर ले गए। योजना के मुताबिक अंग्रेज अधिकारी आंदोलन भड़कने के भय से तीनो शव पर मिट्टी का तेल डालकर उसको जलाने लगे। किंतु, आग की लपटो को देख कर समीप के ग्रामीणो की भीड़ इखट्ठा हो गई। भीड़ बढ़ते देख अंग्रेज अधिकारी इतने डर गए कि लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंक कर वहां से भाग निकले। बाद में गांव वालों ने मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित किया और तीनो शहीद का विधिवत दाह संस्कार किया। हुसैनीवाला में तीनों का शहीद स्मारक आज भी मौजूद है।

क्या परिवार को फांसी के बारे में बताया गया था

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी को लेकर आज भी कई तरह की विवाद मौजूद है। इस बारे में अलग- अलग जगहो पर अलग- अलग जानकारियां मिलती है। हालांकि, कई किताब और फिल्मों में यह जानकारी दी गई है कि 23 मार्च 1931 की शाम को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी दे दी गई थीं। आपको याद होगा जब वर्ष 2002 में राजकुमार संतोषी की एक फिल्म आई थीं। फिल्म का नाम था ‘द लीजेंड ऑफ सिंह’। इसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी की तारीख 23 मार्च की शाम, बताया गया था। फिल्म में यह दिखाया गया है कि भगत सिंह के परिवार को इस बात की जानकारी मिल जाती है कि तीनों क्रांतिकारियों को तय तारीख से एक रोज पहले ही फांसी दी जा रही है। यदि आपको फिल्म का दृष्य याद हो तो, आपको याद ही होगा कि परिवार के लोग लाहौर सेंट्रल जेल के बाहर प्रदर्शन कर रहे होते हैं। जबकि, अंदर उन्हें फांसी दे दी जाती है। फांसी की खबर पर उग्र हुए लोग जेल के अंदर घुसने की कोशिश भी करते हैं।

पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिसप्यूट बिल क्या है

सवाल उठता है कि आखिर किस आरोप में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिया गया था? इस सवाल को  समझने के लिए पीछे का पन्ना पलटना होगा। दरअसल, ब्रिटिश इंडिया की सरकार दिल्ली की असेंबली में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिसप्यूट बिल’ लाने की तैयारी कर चुकी थी। यह दोनो ही दमनकारी बिल था। इसके कानून बन जाने के बाद भारत के आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगो को कठोरता से कुचलने अधिकारी अंग्रेज अधिकारी को मिलने वाला था। जनता में क्रांति का बीज पनपने से  पहले ही, अंग्रेज उसको कुचलने की तैयारी कर लेना चाहते थे।

क्रांतिकारियों ने पर्चा में क्या लिखा था

भगत सिंह और उनके साथियों ने ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिसप्यूट बिल’ का विरोध दर्ज कराने का निर्णय लिया। तय हुआ कि दमनकारी बिल पर विचार-विमर्श के समय ही सेंट्रल असेंबली में धमाका किया जाए। इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त को जिम्मा मिला। मकसद किसी को हानि पहुंचाना नहीं था। लिहाजा तय हुआ कि असेम्बली के खाली स्थान को चिन्हित करके बम फेंका जाये और ऐसा ही हुआ भी। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में बम विस्फोट करके धमाका कर दिया। बम फेकने के बाद भगत सिंह वहां से भागे नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दे दी। क्रांतिकारियों ने गिरफ़तारी से पहले वहां पर्चा बांट कर अपनी मांगे रख दी। पर्चा में लिखा था- बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊंचे शब्द की आवश्यकता होती है। कालांतर में ‘लाहौर षड़यन्त्र’ केस के नाम से मुकदमा चला और परिणाम क्या हुआ? यह किसी से छिपा नहीं है। जूरी ने राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी की सज़ा दी। जबकि, बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावाज की सजा सुनाई गई।

भगत सिंह ने क्रांति की मुश्किल राह क्यों अपनाई

खेलने और मौज मस्ती करने की उम्र में भगत सिंह के मन में क्रांति के बीज कैसे पनप गया? बात उस वक्त की है, जब भगत सिंह की उम्र महज बारह वर्ष की थीं। उस वक्त जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। बतातें चलें कि भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को रौलेट एक्ट के विरोध में एक सभा हो रही थीं। तभी अचानक अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने अकारण ही भीड़ पर गोलियां चलवा दीं। इसमें 400 से अधिक लोगो की मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही नन्हें भगत अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंच गये थे। नन्हें भगत पर इस घटना का इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने अंग्रेजो से बदला लेने की ठान ली। उस वक्त के महान क्रांतिकारी पंडित चन्द्रशेखर आजाद से मिलें और आजादी की लड़ाई में कूद गए।

 साइमन कमिशन और जालियांवाला बाग का कनेक्शन

ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में संविधान सुधार के लिए वर्ष 1927 में साइमन आयोग का गठन कर दिया। यह सात ब्रिटिश सांसदो का एक समूह था। इधर, चौरी- चोरा की घटना के बाद आजा़दी की लड़ाई में ठहराव आ गया था। लिहाजा, 1927 में कॉग्रेस ने अपने मद्रास अधिवेशन में साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला लिया। मुस्लिम लीग ने भी साइमन के बहिष्कार का समर्थन किया था। इस बीच 3 फरवरी 1928 को कमीशन भारत पहुंच गया। कोलकाता, लाहौर, लखनउ, विजयवाड़ा और पुणे सहित देश के अधिकांश हिस्सो में साइमन को जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों ने साइमन कमीशन को काले झंडे दिखाए और गो बैक साइमन के नारे लागए। इस बीच 30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन का विरोध करने के लिए जालियांवाला बाग में सभा बुलाई गई। शांति पूर्वक सभा कर रहे युवाओं पर पुलिस ने लाठी बरसा दी और भीड़ पर अंधा-धूंध गोलिया बरसाई गई। सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स के आदेश पर पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियां बरसाईं। वह बुरी तरह से जख्मी हो गए। बाद में 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

जब सांडर्स से लिया बदला

इस घटना की सूचना मिलते ही भगत सिंह ने सांडर्स को मारने की योजना बनाई। योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर के कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि उनका साइकिल ख़राब हो गयी हो। समीप के ही एक स्कूल की चहारदीवारी की आर लेकर चन्द्रशेखर आज़ाद इन लोगो को कवर देने के लिए घात लगा कर बैठे थे। वह 17 दिसम्बर 1928 का दिन था और दोपहर बाद ठीक सवा चार बजे सांडर्स अपने ऑफिस से जैसे ही बाहर निकला, राजगुरु ने सांडर्स पर गोली चला दी। गोली सांडर्स के सिर में लगी और व जमीन पर लुढ़क गया। इसके बाद भगत सिंह ने ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए सांडर्स के सीने में चार और गोली उतार दी। गोली की आवाज सुन कर सांडर्स के एक वॉडीगार्ड, चनन सिंह ने भगत सिंह को अपने निशाने पर ले लिया। किंतु, इससे पहले कि वह फायर करता, चन्द्रशेखर आजाद ने बड़ी ही फुर्ती से अपना पिस्तौल निकाला और एक ही गोली में चनन सिंह का काम तमाम कर दिया। लाला लाजपत राय की मौत का बदला पूरा हो चुका था।

काकोरी कांड का कैसे हुआ असर

जाट परिवार में भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था। हालांकि इसको लेकर विवाद है। कई अभिलेखो में जन्म की तारीख 19 अक्टूबर 1907 बताया गया है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। कहतें हैं कि जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना कर दी। इसी दौरान काकोरी कांड हो गया। इस आरोप में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित चार क्रान्तिकारियों को ब्रिठिश हुकूमत ने फांसी दे दी। राम प्रसाद विस्मिल के फांसी की खबर से भगत सिंह इतने उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद की पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

भगत सिंह का लिखा पत्र बना दस्ताबेज

यहां आपको बताना जरुरी है कि जेल में भगत सिंह करीब दो साल रहे। आपको बता दें कि जेल में रहते हुए ब्रिटिश हुकूमत के ख्रिलाफ भगत सिंह और उनके साथियों ने 64 रोज तक भूख हडताल किया था। इस दौरान उनके एक साथी यतीन्द्र नाथ दास की भूख हड़ताल से मौत हो गई। जेल में रहते हुए भगत सिंह ने कई लेख लिखे और परिजनो को कई पत्र लिखे थे। आज यही पत्र भगत  सिंह के विचारो का दर्पण बन चुका हैं। एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा है- ‘हीरे, इमारत की खुबसूरती को बढ़ा सकता है। देखने वालों में चकाचौध भर सकता है। लेकिन वह इमारत की बुनियाद नहीं बन सकता…।’ इसी प्रकार अपने आखरी पत्र में भगत  सिंह ने अपने बड़े भाई को लिखा- ‘मेरे जीवन का अवसान समीप है। प्रात:कालीन प्रदीप के समान मेरा जीवन भोर के प्रकाश में विलिन हो जायेगा। किंतु, मेरा विचार बिजली की तरह हमेशा चमकता रहेगा। ऐसे में महज मुट्ठी भर राख के विनष्ट होने का दुख करने की कोई आवश्यकता नहीं है…।’

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