गुमशुदगी का आंकड़ा गंभीर है
एक लड़की घर से निकलती है। परिवार समझता है कि वह शायद सहेली के घर गई होगी। कुछ घंटे गुजरते हैं। फिर फोन बंद मिलता है। रात होती है। घर के लोग रिश्तेदारों और परिचितों को फोन करते हैं। अगले दिन थाना पहुंचते हैं और फिर एक कागज पर एक शब्द लिखा जाता है— “गुमशुदा।” लेकिन उस एक शब्द के पीछे कई बार एक पूरा संसार गायब हो चुका होता है। किसी गरीब परिवार की बेटी को नौकरी का सपना दिखाया गया हो सकता है। किसी किशोरी को विवाह का भरोसा दिया गया हो सकता है। किसी को घर से बहला-फुसलाकर दूसरे राज्य ले जाया गया हो सकता है। इसके बाद वह कहां पहुंची? घरेलू श्रम में? बंधुआ जैसी परिस्थितियों में? जबरन विवाह में? यौन शोषण के अंधेरे में या किसी ऐसे तस्करी तंत्र में, जहां उसकी पहचान और स्वतंत्रता दोनों उससे छीन ली गईं? बिहार के हालिया आंकड़े इन सवालों को टालने की इजाजत नहीं देते। लेकिन इन आंकड़ों को पढ़ते समय एक सावधानी भी जरूरी है। हर लापता बच्चा तस्करी का शिकार हो, यह कहना प्रमाणित नहीं है। मगर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं लापता बच्चे के मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रारंभिक स्तर पर अपहरण अथवा तस्करी की आशंका को ध्यान में रखकर तत्काल कार्रवाई का निर्देश दिया है। यही इस कहानी का सबसे भयावह बिंदु है।
लापता बच्चों में लड़कियों का अनुपात अधिक
बिहार पुलिस के हवाले से प्रकाशित हालिया आंकड़ों के अनुसार 2025 में राज्य में 14,699 बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज हुए। यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 40 बच्चे। इन मामलों में लगभग 8,600 लड़कियां थीं। यह कुल दर्ज मामलों का करीब 59 प्रतिशत बैठता है। 2026 में जून तक 10,577 बच्चों की गुमशुदगी दर्ज हुई, जिनमें लगभग 6,700 लड़कियां थीं। इस अवधि में लड़कियों की हिस्सेदारी करीब 63 प्रतिशत बैठती है। यानी उपलब्ध इन आंकड़ों में एक स्थायी पैटर्न उभरता है—लापता बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में काफी अधिक है। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण आंकड़ा-संबंधी सावधानी जरूरी है। अलग-अलग रिपोर्टों में पोर्टल पर दर्ज मामलों और पुलिस अभिलेखों के समेकन के आधार पर संख्याओं में अंतर दिखाई देता है। इसलिए इन आंकड़ों को अंतिम और अपरिवर्तनीय संख्या मानने के बजाय उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड की स्थिति के रूप में देखना अधिक उचित है। बिहार राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो स्वयं अपने ऑनलाइन आंकड़ों के बारे में कहता है कि वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा जिलों और इकाइयों से प्राप्त होता है और प्रमाणित आंकड़ों के लिए संबंधित इकाई से संपर्क किया जाना चाहिए। लेकिन आंकड़ों में कुछ अंतर होने के बावजूद एक तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता— लड़कियों की हिस्सेदारी चिंताजनक रूप से ऊंची है।
बरामदगी में भी लड़कियों की संख्या बहुत ज्यादा
2025 में बिहार पुलिस के अनुसार 7,772 लापता बच्चों को बरामद किया गया। इनमें 1,205 लड़के और 6,567 लड़कियां थीं। 2026 में जून तक 5,232 बच्चों की बरामदगी हुई, जिसमें 868 लड़के और 4,364 लड़कियां थीं। यह आंकड़ा पहली नजर में राहत देता है। लेकिन इसके भीतर एक दूसरा सवाल छिपा है। अगर बरामद होने वाले बच्चों में भी लड़कियों की संख्या इतनी अधिक है, तो क्या लड़कियों की गुमशुदगी का कोई विशिष्ट सामाजिक कारण है? यही वह जगह है जहां मानव तस्करी, विवाह के लिए अपहरण, रोजगार के झांसे और यौन शोषण की आशंकाओं की जांच जरूरी हो जाती है। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि बरामद प्रत्येक लड़की तस्करी या यौन शोषण की शिकार थी। लेकिन ऐसी आशंकाओं को जांच का हिस्सा बनाया जाना स्वयं सरकारी व्यवस्था का घोषित उद्देश्य है।
नौकरी और शादी का सपना कहीं तस्करी का रास्ता तो नहीं?
गरीबी केवल आर्थिक अभाव नहीं है। कई बार वह निर्णय लेने की क्षमता को भी कमजोर कर देती है। घर में रोजगार नहीं है। किशोरी पढ़ाई छोड़ चुकी है। परिवार पर कर्ज है। कोई परिचित कहता है—दिल्ली में काम मिल जाएगा। पंजाब में नौकरी है। हरियाणा में अच्छा घर मिलेगा। किसी दूसरे राज्य में विवाह हो जाएगा। गरीब परिवार के लिए यह प्रस्ताव अवसर जैसा दिखाई दे सकता है। लेकिन मानव तस्करी के मामलों में यही लालच प्रवेश-द्वार बन सकता है। गृह मंत्रालय ने राज्यों को लापता बच्चों की तस्करी रोकने और उन्हें खोजने के लिए अलग से परामर्श जारी किया है। केंद्र सरकार ने मानव तस्करी की रोकथाम को राज्यों की जिम्मेदारी बताते हुए इसके लिए राज्य स्तर पर कार्रवाई और समन्वय की व्यवस्था पर जोर दिया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मार्च 2026 में बिहार समेत पांच राज्यों में बढ़ती गुमशुदगी और बच्चों के सीमित ट्रेसिंग रिकॉर्ड से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया था। आयोग ने बिहार के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। आयोग ने यह भी कहा था कि रिपोर्ट सही होने पर मामला गंभीर मानवाधिकार चिंता पैदा करता है।
“24 घंटे बाद एफआईआर” वाली धारणा कितनी सही है?
लापता बच्चों के मामलों में अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि पुलिस ने तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की। लेकिन कानूनी स्थिति इससे कहीं अधिक कठोर है। सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चा बचाओ आंदोलन मामले में स्पष्ट किया था कि किसी बच्चे के लापता होने की सूचना मिलने पर प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए और उसके बाद तत्काल जांच एवं अनुवर्ती कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि लापता बच्चे के मामले में प्रारंभिक तौर पर अपहरण या तस्करी की आशंका को ध्यान में रखा जाए, जब तक जांच से इसके विपरीत तथ्य सामने न आ जाएं। गृह मंत्रालय ने इसके बाद राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों में अनिवार्य प्राथमिकी दर्ज करने संबंधी परामर्श जारी किया। इसलिए “24 घंटे इंतजार करना ही नियम है” जैसी धारणा भ्रामक हो सकती है। बच्चा लापता है तो समय महत्वपूर्ण है। पहले कुछ घंटे जितने निर्णायक हो सकते हैं, उतने शायद कई दूसरे घंटो में संभव नहीं है।
मिशन वात्सल्य ने खोज को नई तकनीकी ताकत दी है
केंद्र सरकार ने 2025 में संशोधित मिशन वात्सल्य पोर्टल शुरू किया, जिसमें पहले के ट्रैकचाइल्ड और खोया-पाया तंत्र को एकीकृत किया गया। जुलाई 2026 में सरकार ने बताया कि मिशन वात्सल्य के एकीकृत पोर्टल में लापता और बरामद बच्चों की जानकारी के मिलान की सुविधा विकसित की गई है। यह व्यवस्था अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली से भी जुड़ी है। इसका मतलब यह है कि बिहार से लापता कोई बच्चा अगर देश के किसी दूसरे हिस्से में बरामद होता है, तो उसकी पहचान और मूल रिकॉर्ड का मिलान किया जा सकता है। यही वजह है कि बिहार पुलिस की तलाश प्रणाली में पोर्टल की भूमिका बढ़ी है। सितंबर 2026 में बिहार पुलिस के “ऑपरेशन तलाश” के दौरान 20 अगस्त से 2 सितंबर के बीच 3,359 लापता बच्चों को ट्रेस किया और 3,357 बच्चों को बरामद किया। इनमें 2,705 लड़कियां और 652 लड़के थे। यह संख्या बताती है कि तकनीकी निगरानी और विशेष अभियान से बरामदगी की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
बिहार में समस्या सिर्फ “लापता” होने की नहीं है
किसी बच्चे की बरामदगी कहानी का अंत नहीं है। अगर बच्चा किसी तस्करी के जाल से मिला है तो उसके बाद क्या? क्या वह सुरक्षित घर लौट पाया? क्या उसके साथ यौन हिंसा हुई? क्या उससे जबरन काम कराया गया? क्या उसका विवाह कराया गया? क्या वह मानसिक आघात से गुजर रहा है? क्या परिवार उसे स्वीकार करने की स्थिति में है? क्या अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चला और क्या वह दोबारा उसी परिस्थिति में फंसने से सुरक्षित है? यहीं पुनर्वास की असली परीक्षा शुरू होती है। मिशन वात्सल्य का घोषित उद्देश्य भी केवल बच्चे को खोज लेना नहीं, बल्कि देखभाल, संरक्षण, पुनर्वास और परिवार में पुनर्समावेशन तक व्यवस्था खड़ी करना है। इसमें बाल कल्याण समितियां, जिला बाल संरक्षण इकाइयां, बाल देखभाल संस्थान और विशेष किशोर पुलिस इकाइयां जैसी संस्थाएं शामिल हैं। बिहार में 2021 से 2025 के बीच लगभग 45,000 देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के पुनर्वास की जानकारी भी सामने आई है। इनमें लापता, तस्करी के शिकार, घर से भागे और अन्य श्रेणियों के बच्चे शामिल थे।
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