Home Bihar क्या सच में जाएगी एमएलसी की कुर्सी, संविधान में क्या है प्रावधान

क्या सच में जाएगी एमएलसी की कुर्सी, संविधान में क्या है प्रावधान

बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की सदस्यता को लेकर अटकलबाजी आरंभ

बिहार की राजनीति में 31 अक्टूबर को एक ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने दो नव निर्वाचित निर्दलीय विधान पार्षदों की सदस्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए। तिरहुत स्नातक से बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राहुल राज ने भाजपा प्रदेश कार्यालय में पहुंचकर पार्टी नेतृत्व के साथ बैठक की। शुरुआती खबरों में दोनों के भाजपा में शामिल होने की बात कही गई। राहुल राज ने मीडिया से बातचीत में भाजपा की सदस्यता दोबारा लेने की बात भी कही। बंशीधर ने भी पहले सदस्यता लेने की बात कही थी।

लेकिन विवाद उठते ही तस्वीर बदलने लगी। भाजपा की ओर से कहा गया कि दोनों ने पार्टी की सदस्यता नहीं ली, बल्कि सरकार को समर्थन दिया है। बंशीधर ब्रजवासी ने फेसबुक लाइव में सदस्यता लेने से इनकार कर दिया। राहुल राज की ओर से बाद में स्थिति स्पष्ट करने वाला कोई नया सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया। इस बीच राजद नेता तेजस्वी यादव ने दोनों की सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है। आखिर सच्चाई क्या है? क्या दोनों की विधान पार्षदी खतरे में है? क्या चुनाव जीतने के 15 दिनों के भीतर पार्टी में शामिल होने की कोई छूट है? संविधान और न्यायालयों के फैसले इस मामले में क्या कहते हैं?

सदस्यता ग्रहण करने की हकीकत क्या है?

31 अक्टूबर को समाचार एजेंसी पीटीआई ने दोनों नेताओं के भाजपा में शामिल होने की खबर प्रकाशित की। इस रिपोर्ट में राहुल राज का बयान भी दर्ज है। उन्होंने कहा कि उन्होंने पार्टी की सदस्यता दोबारा ली है। उन्होंने यह भी दावा किया कि निर्दलीय एमएलसी चुनाव के 15 दिनों के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है। बंशीधर ब्रजवासी ने भी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से चर्चा के बाद भाजपा में शामिल होने की बात कही थी।

दूसरी तरफ, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भाजपा की ओर से दोनों को पार्टी में शामिल किए जाने और प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी द्वारा स्वागत किए जाने का उल्लेख है। लेकिन बाद में भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे केवल समर्थन देने की घोषणा बताया। बंशीधर ब्रजवासी ने भी फेसबुक लाइव में कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली है और सरकार को समर्थन दिया है।

इसलिए फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक साक्ष्य एक-दूसरे से टकराते हैं। तस्वीरों में पार्टी कार्यालय में मौजूदगी, स्वागत और सदस्यता पर्ची जैसी चीजें महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती हैं, लेकिन अकेले इनसे कानूनी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वास्तविक सदस्यता फॉर्म, पार्टी का सदस्यता रजिस्टर, भाजपा की आधिकारिक स्वीकृति और दोनों नेताओं के प्रमाणित बयान निर्णायक होंगे।

संविधान की दसवीं अनुसूची क्या कहती है?

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को आम तौर पर दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसका उद्देश्य निर्वाचित जन प्रतिनिधियों द्वारा चुनाव के बाद राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है।

इस अनुसूची के पैरा 2(2) में स्पष्ट प्रावधान है कि कोई व्यक्ति यदि किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुआ है, तो चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाएगा।

यह प्रावधान केवल लोकसभा या विधानसभा तक सीमित नहीं है। दसवीं अनुसूची में ‘हाउस’ की परिभाषा के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के दोनों सदन शामिल हैं। इसलिए बिहार विधान परिषद के निर्वाचित निर्दलीय सदस्य भी इसके दायरे में आते हैं। संविधान का अनुच्छेद 191(2) भी दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए गए व्यक्ति की राज्य विधानमंडल की सदस्यता समाप्त होने का आधार प्रदान करता है। पैरा 2(2) में निर्दलीय सदस्य के लिए चुनाव के बाद पार्टी में शामिल होने की कोई 15 दिन की छूट नहीं है।

राहुल राज का 15 दिन वाला दावा कितना सही है?

राहुल राज ने मीडिया के सामने दावा किया था कि निर्दलीय एमएलसी चुनाव के 15 दिनों के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए तो उसे पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार माना जा सकता है। लेकिन संविधान की दसवीं अनुसूची में ऐसा कोई प्रावधान नहीं मिलता है।

दरअसल, 15 दिन का उल्लेख दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(b) में है। यह प्रावधान किसी राजनीतिक दल के सदस्य द्वारा पार्टी के निर्देश के विरुद्ध सदन में मतदान करने या मतदान से अनुपस्थित रहने के बाद पार्टी की ओर से उस कार्रवाई को माफ किए जाने से संबंधित है। यह निर्दलीय निर्वाचित सदस्य के पार्टी में शामिल होने की समय-सीमा नहीं है। इसी तरह, पैरा 2(3) में छह महीने की अवधि का उल्लेख मनोनीत सदस्यों के लिए है, निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के लिए नहीं। दोनों स्थितियों को एक समझना कानूनी भूल होगी।

समर्थन और पार्टी में शामिल होना अलग-अलग

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ इमकोंग इमचेन बनाम भारत संघ का फैसला है। इस मामले में न्यायालय ने निर्दलीय निर्वाचित सदस्य और राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुने गए सदस्य के बीच अंतर स्पष्ट किया है। फैसले में कहा गया कि किसी निर्दलीय सदस्य का किसी राजनीतिक दल को बाहर से समर्थन देना और उस दल में शामिल हो जाना अलग अलग बातें हैं। यह तय करने के लिए कि सदस्य ने वास्तव में पार्टी ज्वाइन की है या केवल बाहर से समर्थन दिया है, उसके व्यवहार, उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों की जांच से स्पष्ट करनी होगी।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि सदस्यता फॉर्म नहीं भरा या फीस नहीं दी। यदि अन्य तथ्यों से यह साबित होता है कि सदस्य वास्तव में राजनीतिक दल में शामिल हो गया है, तो औपचारिकताओं की कमी उसे दलबदल कानून से नहीं बचा सकती। यही इस मामले की सबसे अहम कानूनी कसौटी है। यदि दोनों नेताओं ने केवल सरकार को समर्थन दिया है, तो यह अपने आप अयोग्यता का आधार नहीं है। लेकिन यदि पार्टी में शामिल होना प्रमाणित हो जाता है, तो पैरा 2(2) लागू हो सकता है।

क्या दोनों की एमएलसी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जायेगी?

अभी तक उपलब्ध जानकारी में बिहार विधान परिषद के सभापति की ओर से दोनों नेताओं को अयोग्य घोषित करने का कोई अंतिम आदेश सामने नहीं आया है। दसवीं अनुसूची के पैरा 6(1) के अनुसार, दलबदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित प्रश्न का निर्णय संबंधित सदन के सभापति या अध्यक्ष करते हैं। इसलिए बिहार विधान परिषद के सभापति के समक्ष शिकायत और उसके बाद जांच की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

तेजस्वी यादव ने 1 नवंबर को दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। जन सुराज की ओर से भी इस मामले को सभापति के समक्ष उठाने की बात सामने आई है। लेकिन मांग उठना और औपचारिक याचिका दाखिल होना दो अलग बातें हैं। इस पड़ताल के समय तक किसी औपचारिक याचिका पर अंतिम निर्णय या सदस्यता समाप्त करने का आदेश प्रमाणित नहीं हुआ है।

अब दोनों नेताओं के पास बचने का कानूनी विकल्प क्या है?

दोनों नेताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण विकल्प यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की थी या केवल सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। यदि उन्होंने सदस्यता नहीं ली है, तो उन्हें अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज और स्पष्ट बयान प्रस्तुत करने होंगे। पार्टी का सदस्यता रजिस्टर, सदस्यता आवेदन, स्वीकृति और संबंधित पत्राचार जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। केवल बाद में सदस्यता से इनकार कर देना पर्याप्त नहीं होगा, यदि पहले के बयान और अन्य प्रमाण इसके विपरीत हों।

यदि यह साबित हो जाता है कि उन्होंने चुनाव के बाद भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी, तो संविधान के पैरा 2(2) के तहत अयोग्यता का गंभीर जोखिम है। ऐसी स्थिति में बाद में पार्टी छोड़ देने या सदस्यता वापस लेने से पहले घटित दलबदल स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। दसवीं अनुसूची में निर्दलीय सदस्य के लिए कोई सामान्य छूट या 15 दिन की राहत नहीं है। पैरा 4 का विलय संबंधी अपवाद भी राजनीतिक दल के मूल सदस्यों के विलय की विशिष्ट परिस्थिति से जुड़ा है। निर्दलीय सदस्य के लिए इसे सामान्य बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

सभापति के निर्णय से असहमति होने पर न्यायिक समीक्षा का रास्ता भी उपलब्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने किहोटो होलोहान बनाम जाचिल्हू मामले में स्पष्ट किया था कि सभापति का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं है। हालांकि, अदालत आम तौर पर संवैधानिक और कानूनी आधारों पर निर्णय की जांच करती है। वह हर मामले में सीधे तथ्यों का नया चुनावी फैसला नहीं करती।

सदस्यता का फैसला तस्वीरों से नहीं, प्रमाणों से होगा

बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की विधान परिषद सदस्यता पर संकट की आशंका निराधार नहीं है। संविधान का प्रावधान स्पष्ट है। निर्दलीय निर्वाचित सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्यता के दायरे में आ सकता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि केवल सरकार को समर्थन देने से अपने आप दलबदल साबित नहीं होता।

राहुल राज का सदस्यता लेने संबंधी सार्वजनिक बयान, बंशीधर ब्रजवासी का पहले सदस्यता लेने और फिर इनकार करने का घटनाक्रम, भाजपा की शुरुआती प्रतिक्रिया और बाद का स्पष्टीकरण— इन सभी की निष्पक्ष जांच जरूरी है। फिलहाल दोनों की सदस्यता समाप्त नहीं हुई है। अंतिम फैसला सभापति को उपलब्ध प्रमाणों और संविधान के प्रावधानों के आधार पर करना होगा।

इस पूरे प्रकरण का असली सवाल यही है— क्या दोनों नेताओं ने केवल सरकार को समर्थन दिया था, या निर्दलीय जीतने के बाद राजनीतिक दल की सदस्यता भी ग्रहण कर ली थी? इसी एक सवाल का प्रमाणित जवाब उनकी विधान पार्षदी का भविष्य तय कर सकता है।

नोट: भाजपा का आधिकारिक सदस्यता रजिस्टर या दोनों नेताओं के सदस्यता आवेदन, भाजपा का 31 अक्टूबर का मूल लिखित बयान, बंशीधर ब्रजवासी का पूरा फेसबुक लाइव और सभापति कार्यालय में दाखिल किसी शिकायत की प्रति। इनके बिना यह दावा करना कि दोनों निश्चित रूप से भाजपा में शामिल हुए या उनकी सदस्यता निश्चित रूप से जाएगी, कहना जल्दबाजी होगी।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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