पांचवीं पुण्यतिथि पर दरहीपट्टी में श्रद्धांजलि सभा, वक्ताओं ने कहा—अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि
मीनापुर की राजनीति में कुछ नेता चुनाव जीतकर इतिहास का हिस्सा बनते हैं और कुछ नेता चुनाव हारने के बाद भी जनता की स्मृति से बाहर नहीं होते। मीनापुर की राजनीति में हिंदकेसरी यादव का नाम इसी दूसरी श्रेणी में रखा जाता है। दरहीपट्टी स्थित अभिनव उत्सव पैलेस में गुरुवार को पूर्व मंत्री और मीनापुर से चार बार विधायक रहे स्व. हिंदकेसरी यादव की पांचवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने उन्हें मीनापुर के विकास, जनआंदोलन और वंचित तबकों की आवाज से जोड़ते हुए उनके राजनीतिक जीवन और सामाजिक योगदान को याद किया। हिंद केसरी यादव का निधन 8 अक्टूबर 2021 को हुआ था। वह 85 वर्ष के थे। बिहार के राज्यपाल कार्यालय ने भी उनके निधन पर शोक संदेश जारी किया था।
मीनापुर की राजनीति में हिंदकेसरी का उभार कैसे हुआ?
हिंदकेसरी यादव का राजनीतिक उभार उस दौर में हुआ जब मीनापुर में वाम राजनीति, विशेषकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, का मजबूत प्रभाव था। 1980 के विधानसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जनकधारी प्रसाद कुशवाहा ने मीनापुर सीट जीती थी। इसके बाद 1985 में हिंद केसरी यादव लोकदल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे और 25,307 वोट हासिल कर 3,820 वोट के अंतर से जीत दर्ज की। इसके बाद उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ा। 1990 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने 46,600 वोट हासिल कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जनकधारी प्रसाद कुशवाहा को 13,555 वोट से हराया। 1995 में भी उन्होंने जीत दर्ज की और कांग्रेस उम्मीदवार सकलदेव सहनी को 19,890 वोट से पीछे छोड़ा। इस तरह 1985, 1990 और 1995 में लगातार तीन चुनाव जीतकर उन्होंने मीनापुर की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई। 2000 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जब निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश प्रसाद ने उन्हें 2,952 वोट से हराया। फरवरी 2005 के चुनाव में हिंद केसरी यादव ने राजद के टिकट पर वापसी की और दिनेश प्रसाद को 1,857 वोट से पराजित कर दिया। हालांकि, विधानसभा भंग हो जाने की वजह से वो चौथी बार मात्र छह महीने तक ही निर्वाचित प्रतिनिधि रह सके। इस चुनावी सफर के आधार पर वह मीनापुर से चार बार विधायक रहे।
सिर्फ विधायक नहीं, दो बार मंत्री भी बने
हिंदकेसरी यादव की राजनीतिक पहचान केवल मीनापुर के विधायक तक सीमित नहीं रही। वह बिहार सरकार में दो बार मंत्री रहे। 1990 में उन्हें पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी मिली, जबकि 1997 में पंचायती राज और मत्स्य संसाधन विभाग के मंत्री रहे। मीनापुर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने उनके मंत्री रहने से ज्यादा उनकी जनसुलभ राजनीतिक शैली को याद किया। वक्ताओं के अनुसार, सत्ता में रहने के बावजूद वह क्षेत्र के लोगों से दूरी बनाने के बजाय लगातार उनके बीच बने रहे। उनके बारे में यह बात पहले भी सामने आती रही है कि वह सुरक्षा घेरे में रहने के बजाय आम लोगों के बीच जाने को प्राथमिकता देते थे। 2021 की एक विस्तृत स्मृति-रिपोर्ट में उनके हवाले से बताया गया था कि वह अंगरक्षक रखने से इनकार करते थे और जनता के भरोसे को अपनी सुरक्षा मानते थे।
बाढ़ और सुखाड़ के खिलाफ भितिहरवा से दिल्ली तक पदयात्रा
श्रद्धांजलि सभा में हिंद केसरी यादव के जिस आंदोलन को सबसे ज्यादा याद किया गया, वह बाढ़ और सुखाड़ की समस्या से जुड़ा उनका पदयात्रा अभियान था। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने भितिहरवा से दिल्ली के संसद भवन तक पैदल यात्रा की थी और बाढ़-सुखाड़ से स्थायी मुक्ति की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया था। स्थानीय और हालिया रिपोर्टिंग में भी इस पदयात्रा को उनके राजनीतिक जीवन के प्रमुख आंदोलनों में गिना गया है। मीनापुर के लिए इस आंदोलन का महत्व इसलिए भी है कि बाढ़ आज भी इलाके की सबसे गंभीर संरचनात्मक समस्याओं में बनी हुई है। यानी जिस मुद्दे को लेकर हिंद केसरी यादव दशकों पहले सड़क पर उतरे थे, वह मुद्दा आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यही उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी है— नेता बदल गए, सरकारें बदल गईं, योजनाएं बदलीं, लेकिन बाढ़ का सवाल अब भी मीनापुर के भूगोल में मौजूद है। उन्होंने शिक्षा को विकास का आधार बनाया। श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि हिंद केसरी यादव के कार्यकाल में मीनापुर क्षेत्र में बड़ी संख्या में विद्यालयों की स्थापना हुई और ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का विस्तार हुआ। “सैकड़ों विद्यालय उनकी पहल से स्थापित की गई।” हिंद केसरी यादव के मामले में स्थानीय राजनीतिक स्मृति उन्हें शिक्षा और ग्रामीण सड़क जैसे मुद्दों से मजबूती से जोड़ती है। श्रद्धांजलि सभा में भी वक्ताओं ने उनके कार्यकाल में विद्यालयों की स्थापना और ग्रामीण सड़कों के विकास का उल्लेख किया।
बिना सुरक्षा के राजनीति: उनके व्यक्तित्व की सबसे चर्चित तस्वीर
हिंद केसरी यादव की राजनीतिक शैली का एक पहलू बार-बार सामने आता है—बिना सुरक्षा घेरे जनता के बीच रहना। 2021 में उनके निधन के बाद प्रकाशित स्मृति आलेख में बताया गया था कि विधायक बनने के बाद भी वह बिना अंगरक्षक क्षेत्र में घूमते थे। जब उन्हें सुरक्षा रखने की सलाह दी जाती तो वह इससे इनकार कर देते थे। यह केवल व्यक्तिगत सादगी का मामला नहीं था। यह उनकी राजनीतिक शैली का प्रतीक भी था। उनका तर्क था कि जनता के बीच रहने वाला जनप्रतिनिधि जनता से डरकर नहीं चल सकता। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर वक्ताओं ने फिर इस प्रसंग को याद किया और कहा कि आम लोगों का भरोसा ही उनकी सुरक्षा था।
शराबबंदी से लेकर किसान मुद्दों तक, आंदोलन उनका राजनीतिक औजार रहा
हिंद केसरी यादव का राजनीतिक जीवन केवल विधानसभा चुनावों तक सीमित नहीं रहा। 2012 में पारू के नेकनामपुर में जहरीली शराब से मौतों के बाद उन्होंने शराब के खिलाफ पदयात्रा निकाली थी। इस दौरान उन पर हमला भी हुआ था। इसके बावजूद उन्होंने शराब विरोधी अभियान जारी रखा। 2015 में भी मीनापुर में किसान मोर्चा की बैठक के दौरान उन्होंने यूरिया की कालाबाजारी, भूमि अधिग्रहण और दूसरे मुद्दों को लेकर आंदोलन की घोषणा की थी। उस समय उनकी ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अर्थी पदयात्रा निकालने की बात कही गई थी। यानी उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सड़क पर संघर्ष था। विधानसभा उनके लिए राजनीति का एक मंच था, लेकिन अंतिम मंच नहीं।
“आंदोलन का दूसरा नाम हिंद केसरी” क्यों कहा गया?
दरहीपट्टी की श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने उन्हें “आंदोलन का दूसरा नाम” बताया। यह राजनीतिक श्रद्धांजलि का हिस्सा है, लेकिन इसके पीछे उनके सार्वजनिक जीवन के कई उदाहरण भी मौजूद हैं—बाढ़-सुखाड़ के खिलाफ पदयात्रा, शराबबंदी का अभियान, किसान मुद्दों पर आंदोलन और कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष। इसलिए हिंद केसरी यादव की राजनीतिक विरासत को केवल उनके चुनावी आंकड़ों से समझना अधूरा होगा। उनका एक चेहरा विधायक का था। दूसरा मंत्री का। लेकिन तीसरा चेहरा आंदोलनकारी का था और संभवतः यही तीसरा चेहरा उनकी राजनीतिक स्मृति को आज भी जीवित रखता है।
मीनापुर के लिए हिंद केसरी की विरासत का असली सवाल
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह बात केवल श्रद्धांजलि का वाक्य नहीं, बल्कि मीनापुर के वर्तमान से जुड़ा सवाल भी है। बाढ़ आज भी है। रोजगार और पलायन आज भी है। कृषि की चुनौतियां आज भी हैं। ग्रामीण सड़कों और संपर्क की जरूरत आज भी है। शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता पर सवाल आज भी हैं। यानी जिन मुद्दों को लेकर पिछली पीढ़ी के नेता सड़क पर उतरे, उनमें से कई मुद्दे आज भी नई शक्ल में मौजूद हैं। इसलिए हिंद केसरी यादव की विरासत को सिर्फ प्रतिमा पर फूल चढ़ाने से नहीं समझा जा सकता। उनकी विरासत का असली परीक्षण यह होगा कि मीनापुर आज उन सवालों को कितना हल कर पाया है, जिनके लिए वह कभी आंदोलन करते थे।
पांचवीं पुण्यतिथि पर फिर वही सवाल सामने आया
कार्यक्रम की अध्यक्षता और संचालन से जुड़े स्थानीय नेताओं तथा पत्रकारों सहित बड़ी संख्या में लोगों ने हिंद केसरी यादव को श्रद्धांजलि दी। पूर्व मुखिया सदरूल खान ने कार्यक्रम का संचालन किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. लोक शक्ति यादव ने किया। सभा में पूर्व एमएलसी प्रत्याशी गोपी किशन, राजद के निवर्तमान प्रदेश प्रवक्ता मो. समी एकबाल, रीना यादव, भारत रतन यादव, पूर्व प्रमुख सुरेश राय, मिथिलेश यादव, प्रेमलाल राय, बिजली ठाकुर, रामश्रेष्ठ राय, रामएकबाली राय, जगदीश राय, सोनफी राय, बिहारी राय, लालबाबू राय, उमाशंकर राय, राजाराम राय, जियाउद्दीन अंसारी, रामप्रीत राय, शिवजी सहनी, शशिरंजन कुमार, फूलबाबू राय, मोईम अंसारी, रमाशंकर राय, रामसंजीवन यादव, उमाशंकर गुप्ता, संजय कुमार, लखनलाल निषाद समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। लोगों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। लेकिन पांचवीं पुण्यतिथि की यह सभा मीनापुर के सामने एक पुराना सवाल फिर छोड़ गई— जिस नेता ने बाढ़, शिक्षा, सड़क और कमजोर तबकों के अधिकार को अपनी राजनीति का मुद्दा बनाया, क्या आज की मीनापुर उन सवालों से आगे निकल चुकी है? अगर जवाब हां है, तो उनकी लड़ाई सफल मानी जाएगी। अगर जवाब नहीं है, तो शायद हिंदकेसरी यादव की सबसे बड़ी विरासत यही है कि उनके उठाए सवाल आज भी मीनापुर से जवाब मांग रहे हैं।
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