मनीष वर्मा के सामने खुली कार्यकर्ताओं की परत-दर-परत पीड़ा
KKN ब्यूरो। मीनापुर में रविवार का दिन जदयू के लिए महज एक कार्यकर्ता संवाद का दिन नहीं था। आदर्श विद्यापीठ, टेंगरारी में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा पहुंचे थे। मंच सजा था। कार्यकर्ता मौजूद थे। संगठन के पदाधिकारी सामने बैठे थे। लेकिन जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ा, औपचारिक स्वागत की चमक के पीछे छिपी बेचैनी सामने आने लगी। मुद्दा सिर्फ यह नहीं था कि कार्यकर्ता को कितना सम्मान मिल रहा है। बात उससे आगे बढ़ गई। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, समानांतर संगठन, प्रखंड और अंचल कार्यालयों में उनकी बात नहीं सुने जाने, संगठन और विधायक के बीच समन्वय की कमी और प्रशासनिक पकड़ कमजोर होने जैसे सवाल सीधे राष्ट्रीय महासचिव के सामने रखे गए। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इन शिकायतों को किसी एक व्यक्ति की नाराजगी के रूप में नहीं रखा गया। कई वक्ताओं ने अलग-अलग लहजे में लगभग एक ही बेचैनी व्यक्त की— “संगठन में सब कुछ ठीक नहीं है।”
मनीष वर्मा के सामने कार्यकर्ताओं ने खोली शिकायतों की गठरी
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रखंड अध्यक्ष अभिषेक कुमार ने की, जबकि संचालन मुखिया वरुण कुमार ने किया। मंच से बोलते हुए कार्यकर्ताओं ने संगठन की आंतरिक स्थिति से जुड़े कई मुद्दे उठाए। मान-सम्मान का सवाल था। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का सवाल था। समानांतर संगठन के आरोप थे। प्रखंड और अंचल कार्यालयों में कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुने जाने की शिकायत थी। और सबसे अहम— संगठन और विधायक के बीच समन्वय की कमी…। राजनीतिक संगठन में यह शिकायत मामूली नहीं होती। क्योंकि कार्यकर्ता केवल चुनाव के समय दिखाई देने वाली भीड़ नहीं होता। वही कार्यकर्ता गांव, पंचायत और बूथ तक संगठन का चेहरा होता है। यदि वही कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे कि उसकी बात पार्टी के भीतर नहीं सुनी जा रही, तो समस्या केवल व्यक्तिगत असंतोष की नहीं रहती। वह धीरे-धीरे संगठनात्मक दूरी में बदल सकती है।
मनीष वर्मा का संदेश—सम्मान भी चाहिए, काम भी होना चाहिए
मनीष वर्मा ने कार्यकर्ताओं की शिकायतों के जवाब में कहा कि कार्यकर्ताओं को सम्मान मिलना जरूरी है और लोगों का काम होना भी जरूरी है। उन्होंने नए बिहार के निर्माण के लिए फिर से संकल्प लेने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि करीब 30 साल पहले जिस तरह संघर्ष किया गया था, उसी तरह फिर संघर्ष की जरूरत है। उन्होंने संगठन की स्थिति को धार देने के लिए रूपक का इस्तेमाल करते हुए कहा— “चाकू भोथड़ा गया है, इस पर धार लगाना फिर से जरूरी है।” यह वाक्य महज भाषण का हिस्सा नहीं था। इसे मीनापुर में उठी शिकायतों के संदर्भ में देखें तो इसका राजनीतिक अर्थ और गहरा दिखाई देता है। क्योंकि जब संगठन के भीतर से ही कार्यकर्ता मान-सम्मान, समन्वय और प्रशासनिक पहुंच की शिकायत कर रहे हों, तब “धार” की जरूरत का संदेश सीधे संगठन की सक्रियता से जुड़ जाता है। मनीष वर्मा ने जदयू के पुराने संघर्ष और राजनीतिक सफर का भी उल्लेख किया तथा कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय होने का आह्वान किया। जदयू की दूसरी जगहों पर हुई बैठकों में भी मनीष वर्मा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को जनता के बीच सक्रिय रखने पर जोर देते रहे हैं।
43 सीट से 85 सीट तक—मनीष वर्मा ने सुनाया सियासी सफर
मनीष वर्मा ने अपने संबोधन में जदयू के पुराने चुनावी संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 43 सीटें मिली थीं। उन्होंने बताया कि उस समय नीतीश कुमार का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ था। संगठन ने सीटों को दोगुना करने का संकल्प लिया। उन्होंने आगे कहा कि 85 सीटें रहने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने पर पूरे राज्य की जनता मर्माहत थी। साथ ही उन्होंने सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने पर खुशी और नीतीश कुमार के पद से हटने पर गम की बात कही। यहां मनीष वर्मा का भाषण स्पष्ट रूप से संगठन के भीतर पुराने नेतृत्व और जदयू की राजनीतिक विरासत को जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दिया। उन्होंने नीतीश कुमार के शासनकाल की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया और कहा कि बिहार का सम्मान बढ़ा तथा समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने का काम हुआ। यह उनका राजनीतिक आकलन है; कार्यक्रम में उन्होंने इसे अपने संबोधन के हिस्से के रूप में रखा।
भाषण का सबसे कड़ा हिस्सा था—“व्यवस्था ढीली पड़ रही है”
मनीष वर्मा ने कहा कि जदयू को लगभग 20 वर्षों तक सत्ता में रहने का जनादेश संघर्ष के बल पर मिला, लेकिन अब व्यवस्था ढीली पड़ती जा रही है। उन्होंने प्रशासन पर पकड़ में कमी आने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में 56 प्रतिशत लोगों के पास जमीन नहीं है, राज्य अभी भी गरीब राज्यों में शामिल है और शिक्षा तथा महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में काम बाकी है। इन आंकड़ों और दावों को अलग-अलग आधिकारिक आंकड़ों से परखा जाना चाहिए। राजनीतिक दृष्टि से उनका संदेश साफ था— सत्ता में रहना पर्याप्त नहीं है, संगठन को जमीन पर फिर से सक्रिय करना होगा।
पूर्व जिलाध्यक्ष ने कहा—“पार्टी को दीमक लग गया है”
कार्यक्रम में पूर्व जिलाध्यक्ष रामबाबू सिंह कुशवाहा ने संगठन की स्थिति पर बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पार्टी को “दीमक लग गया है” और इसे ठीक करने की जरूरत है। उनका एक और वाक्य कार्यकर्ताओं के बीच व्याप्त असंतोष की ओर इशारा करता था— “कमाए लगोंटी वाला, खाये धोती वाला—यह नहीं चलेगा।” यह टिप्पणी संगठन में मेहनत करने वाले और उसका लाभ उठाने वाले लोगों के बीच कथित अंतर को लेकर थी। यानी शिकायत केवल प्रशासन से नहीं थी। संगठन के भीतर हिस्सेदारी और सम्मान को लेकर भी बेचैनी है।
मीनापुर में गुटबंदी—वरिष्ठ नेता ने सीधे उठाया सवाल
वरिष्ठ नेता शिवचंद्र प्रसाद ने मीनापुर में जदयू के गुटबंदी का शिकार होने की बात कही। उन्होंने विशेष रूप से प्रखंड अध्यक्ष और विधायक के बीच सामंजस्य की कमी का मुद्दा उठाया और इसे तत्काल दूर करने की जरूरत बताई। उनका तर्क था कि यदि यह दूरी बनी रही तो विरोधी ताकतें इसका लाभ उठा सकती हैं। यहीं कार्यक्रम का सबसे संवेदनशील राजनीतिक बिंदु सामने आता है। क्योंकि किसी भी विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का प्रखंड संगठन और निर्वाचित विधायक यदि एक-दूसरे से अलग दिशा में चलते हैं, तो उसका असर केवल पार्टी की बैठकों तक सीमित नहीं रहता। उसका असर कार्यकर्ताओं की सक्रियता, प्रशासन तक पहुंच और जनता से संवाद पर भी पड़ सकता है।
प्रखंड अध्यक्ष का सवाल—सरकार हमारी, फिर कार्यकर्ता परेशान क्यों?
प्रखंड अध्यक्ष अभिषेक कुमार ने भी इसी दिशा में सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य में एनडीए की सरकार है और मीनापुर के विधायक जदयू के हैं। इसके बावजूद यदि कार्यकर्ताओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो तकलीफ होना स्वाभाविक है। उन्होंने दावा किया कि 50 प्रतिशत कार्यकर्ता अंचल कार्यालय की कार्यशैली से नाराज हैं। यह एक स्थानीय राजनीतिक दावा है, जिसका स्वतंत्र सांख्यिकीय सत्यापन उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य के बजाय कार्यक्रम में रखे गए दावे के रूप में देखना चाहिए। लेकिन यह दावा अपने भीतर एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ता है— अगर सत्ता के दोनों स्तरों पर गठबंधन की सरकार है, तो स्थानीय कार्यकर्ता और प्रशासन के बीच संवाद में रुकावट आखिर कहां है?
टेंगरारी से हरपाली तक—संवाद का दूसरा पड़ाव
कार्यक्रम के बाद मनीष वर्मा केवल मंच तक सीमित नहीं रहे। वह पैगम्बरपुर पंचायत की मुखिया प्रियंका कुमारी के आवास, हरपाली पहुंचे और कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर उनकी बातें सुनीं। इस दौरान पार्टी के युवा नेता और मीनापुर के सांसद प्रतिनिधि पंकज कुमार पप्पू ने उन्हें मीनापुर विधानसभा क्षेत्र में जदयू की गतिविधियों की जानकारी दी। यह दूसरा पड़ाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी संगठन की वास्तविक स्थिति अक्सर मंच से ज्यादा कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई देती है। मंच पर भाषण होता है। बंद कमरे या छोटे समूह के बातचीत में शिकायतों की असली तह खुलती है। मनीष वर्मा का कार्यकर्ताओं के बीच जाकर उनकी पीड़ा सुनना इसी संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
सवाल अब मनीष वर्मा से ज्यादा मीनापुर जदयू के सामने है
इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक पार्टी कार्यक्रम की खबर मानकर छोड़ देना शायद इसके वास्तविक राजनीतिक अर्थ को छोटा कर देगा। क्योंकि एक ही कार्यक्रम में अलग-अलग लोगों ने लगभग एक ही तरह की समस्याएं उठाईं— सम्मान। समन्वय। संगठन। प्रशासन। कार्यकर्ताओं की अनदेखी। इनमें से कोई एक शिकायत हो तो उसे स्थानीय असंतोष कहा जा सकता है। लेकिन जब कई स्तरों के पदाधिकारी और वरिष्ठ नेता एक ही दिशा में सवाल उठाएं, तो संगठन के लिए उसे गंभीरता से देखना स्वाभाविक है। हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि इन आरोपों की वास्तविकता को दस्तावेजी और प्रशासनिक स्तर पर परखा जाए। केवल मंच से कही गई बातों के आधार पर पूरे संगठन की स्थिति का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
अब असली परीक्षा “संवाद” की है
मीनापुर में रविवार को संवाद हुआ। शिकायतें सामने आईं। राष्ट्रीय महासचिव ने सुना। लेकिन राजनीति में किसी संवाद की असली सफलता मंच पर नहीं, उसके बाद होने वाले बदलाव में दिखाई देती है। क्या संगठन और विधायक के बीच समन्वय बढ़ेगा? क्या कार्यकर्ताओं की शिकायतों के लिए कोई नियमित व्यवस्था बनेगी? क्या अंचल और प्रखंड कार्यालयों में उनकी समस्याओं की सुनवाई बेहतर होगी? क्या समानांतर संगठन की शिकायत दूर होगी? क्या पुराने और सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच दूरी कम होगी? सबसे अहम— क्या मीनापुर जदयू फिर उस संगठनात्मक धार को हासिल कर पाएगा जिसकी कमी खुद पार्टी के मंच से महसूस की गई? मीनापुर के टेंगरारी से उठी आवाज फिलहाल एक कार्यक्रम की आवाज है। लेकिन अगर यह आवाज आने वाले दिनों में संगठनात्मक सुधार की मांग में बदलती है, तो यह संवाद केवल संवाद नहीं रहेगा। वह जदयू के लिए आत्ममंथन की शुरुआत बन सकता है और अगर शिकायतें फिर उसी तरह लौटती रहीं, तो सवाल और कठोर होगा— क्या समस्या कार्यकर्ताओं में है, व्यवस्था में है, नेतृत्व में है या इन तीनों के बीच टूटते हुए उस समन्वय में, जिस पर किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत टिकी होती है? मीनापुर में अब सभी की निगाहें इसी सवाल के जवाब पर टिकी हैं।
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