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ट्रंप के दौर में क्या अमेरिका की वैश्विक साख घटी? आंकड़े क्या कहते हैं

KKN ब्यूरो। एक समय था जब दुनिया के किसी संकट पर एक सवाल लगभग स्वाभाविक रूप से पूछा जाता था— “अमेरिका क्या सोचता है?” लेकिन आज एक दूसरा सवाल भी तेजी से दिखाई दे रहा है— “क्या अमेरिका पर पहले की तरह भरोसा किया जा सकता है?” यहां किसी राजनीतिक नेता के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाना उद्देश्य नहीं है। सवाल यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की वैश्विक छवि, विश्वसनीयता और प्रभाव के बारे में उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़े वास्तव में क्या कहते हैं। इस सवाल का जवाब एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। क्योंकि अमेरिका की सैन्य शक्ति, आर्थिक क्षमता और तकनीकी प्रभुत्व अभी भी असाधारण रूप से मजबूत हैं। लेकिन दूसरी तरफ उसकी विश्वसनीयता, आकर्षण यानी soft power और सहयोगी देशों के बीच भरोसे से जुड़े कई संकेतकों में गिरावट दिखाई देती है। सबसे महत्वपूर्ण बात—यह केवल आलोचकों का दावा नहीं है। Pew Research Center, Gallup और Global Soft Power Index जैसे अलग-अलग स्रोतों के आंकड़े इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।

दुनिया का भरोसा कितना बदला?

Pew Research Center ने 2026 में 36 देशों के 42,151 लोगों का सर्वे किया। सर्वे 8 फरवरी से 13 मई 2026 के बीच हुआ। नतीजा बेहद महत्वपूर्ण था। इन देशों में अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप के विश्व मामलों में सही निर्णय लेने पर भरोसा रखने वालों का मध्यांक केवल 23% था। अमेरिका की समग्र छवि के मामले में भी तस्वीर कमजोर हुई। 36 देशों का मध्यांक बताता है कि केवल 37% लोगों की अमेरिका के प्रति सकारात्मक राय थी, जबकि 57% की नकारात्मक राय थी।  लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण आंकड़ा है— अमेरिका को “विश्वसनीय साझेदार” मानने वालों की संख्या। कनाडा में 2022 में 83% लोगों ने अमेरिका को विश्वसनीय साझेदार माना था। 2026 में यह आंकड़ा गिरकर केवल 35% रह गया। जर्मनी में केवल 23% लोगों का मानना था कि अमेरिका विदेश नीति बनाते समय उनके देश के हितों को ध्यान में रखता है। 2023 में यही अनुपात 60% था। यहां साख का मतलब केवल लोकप्रियता नहीं है। विश्वसनीयता यानी predictability और partnership का भरोसा भी है और यही वह क्षेत्र है जहां गिरावट सबसे ज्यादा मायने रखती है।

Gallup के आंकड़ों में अमेरिका और चीन आमने-सामने

Gallup के 2025 के वैश्विक नेतृत्व सर्वे के मुताबिक अमेरिकी नेतृत्व की स्वीकृति का मध्यांक 2024 के 39% से घटकर 2025 में 31% रह गया। उधर चीन के नेतृत्व की स्वीकृति 32% से बढ़कर 36% हो गई है। अर्थात पहली बार लगभग 20 वर्षों में चीन को अमेरिका पर 5 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली और यह केवल एक-दो देशों की कहानी नहीं थी। Gallup के मुताबिक 44 देशों में अमेरिकी नेतृत्व की स्वीकृति 10 प्रतिशत अंक या उससे ज्यादा गिरी, जबकि केवल 7 देशों में इतनी ही वृद्धि हुई। सबसे बड़ी गिरावटों में जर्मनी में 39 अंक, पुर्तगाल में 38 अंक और अमेरिका के कई पुराने सहयोगी देशों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा खास इसलिए है क्योंकि अमेरिका की शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था और सेना से नहीं बनती। उसकी शक्ति का एक हिस्सा इस बात से भी बनता है कि दूसरे देश उसके नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए कितने तैयार हैं।

Soft Power में अमेरिका अभी भी नंबर 1, लेकिन बड़ी दरार

यहां कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। Brand Finance के Global Soft Power Index 2026 में अमेरिका अभी भी दुनिया में पहले स्थान पर है। अर्थात यह कहना कि अमेरिका की soft power समाप्त हो गई है, तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। लेकिन उसी रिपोर्ट में अमेरिका की soft-power score 4.6 अंक गिरकर 74.9 रह गई है। जबकि, चीन का स्कोर 73.5 हो गया है। यानी दोनों के बीच अंतर केवल 1.4 अंक रह गया है। दिलचस्प बात ये— कि Brand Finance ने 193 देशों में अमेरिका को सबसे बड़ी गिरावट वाला देश बताया है। Reputation में अमेरिका की रैंकिंग 11 स्थान गिरकर 26वें स्थान पर पहुंच गई है। “Good relations with other countries” में 50 स्थान की गिरावट और “trust” में 24 स्थान की गिरावट दर्ज की गई है। साथ ही governance, human rights, rule of law, safety और political stability जैसे संकेतकों में भी गिरावट दिखाई दी। लेकिन अमेरिका की ताकतें भी उसी रिपोर्ट में स्पष्ट हैं। Arts and entertainment में अमेरिका पहले स्थान पर, space exploration में पहले और global brands में दूसरे स्थान पर रहा। यानी— अमेरिका की शक्ति खत्म नहीं हुई है।

आखिर गिरावट आई कहां?

Pew के 2026 सर्वे में यूरोप अमेरिका के प्रति सबसे अधिक नकारात्मक क्षेत्रों में दिखाई देता है। सर्वे किए गए सभी 10 यूरोपीय देशों में बहुमत ने ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा नहीं जताया। 8 देशों में लगभग तीन-चौथाई या उससे अधिक लोगों ने भरोसे की कमी व्यक्त की। 2025 की तुलना में ग्रीस और इटली में ट्रंप पर भरोसा 15 प्रतिशत अंक घटा। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका की वैश्विक शक्ति का एक बड़ा आधार NATO और यूरोपीय गठबंधन रहा है। ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय सहयोगियों से रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव बनाया। परिणामस्वरूप NATO देशों ने 2025 के हेग सम्मेलन में 2035 तक GDP के 5% तक रक्षा और सुरक्षा संबंधी खर्च बढ़ाने की प्रतिबद्धता स्वीकार की। NATO के अनुसार यूरोपीय सहयोगियों और कनाडा का संयुक्त रक्षा खर्च 2025 में वास्तविक terms में 2024 की तुलना में लगभग 20% बढ़ा।  लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। वह ये कि सहयोगी देश अधिक रक्षा खर्च करने लगें—यह अमेरिकी नीति की उपलब्धि हो सकती है। लेकिन यदि उसी प्रक्रिया में वे अमेरिका की विश्वसनीयता पर कम भरोसा करने लगें, तो यह दूसरी तरह की समस्या है। यानी burden-sharing बढ़ सकता है और trust घट सकता है—दोनों एक साथ संभव हैं।

सबसे बड़ा चेतावनी संकेत?

कनाडा अमेरिका का पड़ोसी ही नहीं, NATO सहयोगी और अत्यंत गहरा आर्थिक साझेदार भी है। Pew के आंकड़ों में अमेरिका को विश्वसनीय साझेदार मानने वालों की संख्या कनाडा में 2022 के 83% से घटकर 2026 में 35% रह गई है। यह लगभग 48 प्रतिशत अंक की गिरावट है। इसी तरह 2025 के Pew सर्वे में कनाडा में अमेरिका की favorable rating 54% से घटकर 34% हो गई थी। यहां यह सावधानी जरूरी है कि हर गिरावट का पूरा कारण केवल ट्रंप की नीति साबित नहीं किया जा सकता। जनमत पर व्यापार विवाद, सीमा संबंधी तनाव, घरेलू राजनीति और दूसरे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम भी असर डाल सकते हैं। लेकिन समय-संबंधी पैटर्न यह जरूर दिखाता है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान अमेरिका की छवि में तेज बदलाव आया।

व्यापार: “America First” या भरोसे की कीमत?

ट्रंप की आर्थिक विदेश नीति का एक प्रमुख तत्व tariffs रहा है। इसका उद्देश्य अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देना और व्यापारिक साझेदारों से अधिक अनुकूल शर्तें हासिल करना रहा है। लेकिन इसका दूसरा असर भी है। European Commission के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार 2025 में घोषित अमेरिकी tariffs से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का अनुमान था और संभावित retaliatory tariffs से अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों पर असर बढ़ सकता था। रिपोर्ट ने यह भी कहा कि बढ़ी हुई अनिश्चितता और निवेशकों के भरोसे में कमी आर्थिक नुकसान को बढ़ा सकती है। फिर भी कहानी का दूसरा पक्ष देखना जरूरी है। 2025 में अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच वस्तु एवं सेवा व्यापार लगभग €1.8 trillion रहा और दोनों तरफ का निवेश करीब €4.9 trillion था। अर्थात व्यापारिक विवादों के बावजूद transatlantic economic relationship टूटा नहीं है। इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है— अमेरिका की bargaining power कम नहीं हुई है, लेकिन उसकी predictability को लेकर चिंता बढ़ी है।

साख का दूसरा मोर्चा

ट्रंप प्रशासन ने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में WHO से बाहर निकलने और Paris Climate Agreement से फिर withdrawal की प्रक्रिया शुरू की तथा USAID के अधिकांश कार्यक्रम समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए। अमेरिकी कांग्रेस की Congressional Research Service के अनुसार Paris Agreement से अमेरिकी withdrawal की प्रक्रिया 2026 में प्रभावी हुई। यह कदम अमेरिकी प्रशासन के दृष्टिकोण से संप्रभुता, खर्च और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की नीति के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। लेकिन विदेशों में इन कदमों का दूसरा अर्थ निकाला जा सकता है— क्या अमेरिका लंबे समय तक उन वैश्विक संस्थाओं और समझौतों में स्थिर साझेदार रहेगा जिन्हें उसने स्वयं बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी? यही सवाल soft power के लिए महत्वपूर्ण है।

दुनिया अमेरिका से डरती है या भरोसा करती है?

सितंबर 2026 में Rockefeller Foundation द्वारा कराए गए एक वैश्विक सर्वे में 34 देशों के 35,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया। केवल 39% लोग अमेरिका को विश्व मामलों में नेतृत्व करने में सहज थे। इसके मुकाबले कनाडा के लिए यह आंकड़ा 60%, जापान के लिए 58% और ऑस्ट्रेलिया के लिए 55% था और 34 देशों में 34% लोगों ने अमेरिका को एक प्रमुख खतरे के रूप में देखा। यह आंकड़ा बहुत कुछ कहता है। विश्व राजनीति में शक्ति का एक रूप है— दूसरे आपको कितना शक्तिशाली मानते हैं। लेकिन उसका दूसरा रूप है— दूसरे आपकी शक्ति को कितना स्वीकार करते हैं। दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते।

क्या अमेरिका कमजोर हो गया?

ऐसा निष्कर्ष आंकड़े समर्थन नहीं करते। अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों में है। उसकी अर्थव्यवस्था विशाल है। डॉलर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ बना हुआ है। उसकी तकनीकी कंपनियां, विश्वविद्यालय, AI, semiconductor ecosystem, entertainment industry और innovation capacity वैश्विक प्रभाव पैदा करते हैं। Brand Finance की 2026 रिपोर्ट में अमेरिका soft power में अब भी पहले स्थान पर है। इसलिए सही सवाल शायद यह नहीं है कि— “क्या अमेरिका की शक्ति खत्म हो रही है?” बल्कि सवाल यह है— क्या अमेरिका की शक्ति और उसके प्रति दुनिया का भरोसा एक-दूसरे से अलग होने लगे हैं? उपलब्ध आंकड़े इस दिशा में गंभीर संकेत जरूर देते हैं।

नुकसान शायद साख से ज्यादा विश्वसनीयता का है

अमेरिका का प्रभाव केवल इस पर निर्भर नहीं करता कि उसके पास कितने विमानवाहक पोत हैं। उसका प्रभाव इस पर भी निर्भर करता है कि— उसके सहयोगी उस पर कितना भरोसा करते हैं। दूसरे देश उसके साथ लंबे समझौते करने को कितने तैयार हैं; उसकी विदेश नीति कितनी predictable मानी जाती है; उसकी संस्थाओं को कितना विश्वसनीय समझा जाता है और दुनिया उसके नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए कितनी इच्छुक है। 2026 का Pew डेटा यहां सबसे बड़ा संकेत देता है। 36 देशों में केवल 32% लोगों ने कहा कि अमेरिका उनकी तरह के देशों के हितों को अपनी विदेश नीति में काफी या उचित मात्रा में ध्यान में रखता है। NATO देशों में यह धारणा और कमजोर थी—फ्रांस में केवल 10% और स्वीडन में 8%। यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे अहम तथ्य है।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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