26 अगस्त की सुबह 8:37 बजे हिमालय में कुछ ऐसा टूटा, जिसकी गूंज सैकड़ों किलोमीटर दूर तक सुनाई दी
KKN ब्यूरो। 8:37 बजे सुबह। नेपाल के लांगटांग क्षेत्र में, लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर हिमनद का एक विशाल हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिरा। वह करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में आकर गिरा। उसके साथ बर्फ ही नहीं, चट्टान और मलबे का भारी जखीरा भी नीचे आया। उस क्षण किसी गांव में सायरन नहीं बजा था। किसी नदी किनारे खड़े आदमी को यह अंदाजा नहीं था कि पहाड़ का एक हिस्सा अभी-अभी अपनी जगह छोड़ चुका है। लेकिन अगले कुछ मिनटों में वही टूटी हुई बर्फ, चट्टान और मलबा एक ऐसी जल-प्रलय में बदलने वाला था, जिसे भागकर भी पार पाना मुश्किल था।
8:37 बजे: पहाड़ टूटा, मगर नीचे रहने वालों को खबर नहीं हुई
प्रत्यक्ष और उपग्रह आधारित विश्लेषण के मुताबिक घटना की शुरुआत लांगटांग राष्ट्रीय उद्यान के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में हुई। हिमनद का निचला हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। वैज्ञानिकों के अनुसार इस गिरावट ने बर्फ, चट्टान और तलछट को एक साथ घाटी में धकेल दिया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बाद में जो भूकंपीय संकेत दर्ज किया, उसे अलग भूकंप नहीं बल्कि हिमनद और चट्टान के टूटने से पैदा हुई ऊर्जा माना। इसकी तीव्रता लगभग 5.2 के बराबर आंकी गई। यानी जिस आवाज और कंपन को शुरू में भूकंप समझा गया, उसके पीछे असल में पहाड़ का टूटना था।
अगले कुछ मिनट: बर्फ से मलबा, मलबे से नदी
हिमनद का टूटा हिस्सा घाटी में गिरते ही एक तेज रफ्तार बर्फ-चट्टान मलबा प्रवाह बना। यह प्रवाह ल्हेन्दे खोला की ओर बढ़ा। चीनी भूवैज्ञानिक के हवाले से रॉयटर्स ने इसकी गति करीब 50 मीटर प्रति सेकंड बताई है—यानी लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटा। यह मलबा प्रवाह 20 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक पहुंचा। इतनी गति में आने वाली चीज को देखकर कोई व्यक्ति सामान्य अर्थ में दौड़कर उससे बच नहीं सकता। यह पानी नहीं था। यह पानी में घुला हुआ पहाड़ था। बर्फ + चट्टान + मिट्टी + पानी + बोल्डर। इसीलिए वैज्ञानिकों ने बाद में इसे सामान्य बाढ़ से अलग घटना माना।
करीब 9:00 बजे: नदी ने अपना स्वभाव बदल दिया
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक सुबह करीब 9:00 बजे भोटेकोशी नदी तंत्र में जलस्तर तेजी से बढ़ना शुरू हुआ। ल्हेन्दे खोला से आया भारी मलबा और पानी भोटेकोशी में उतरा और वहां से त्रिशूली नदी तंत्र की ओर बढ़ा। यहां से आपदा ने पहाड़ से निकलकर आबादी का रूप लेना शुरू कर दिया। नदी किनारे बसे गांव। सड़कें। पुल। बाजार। जलविद्युत परियोजनाएं। सीमा चौकियां। सब उसकी राह में थे।
कुछ ही मिनट: पानी 9 मीटर ऊपर
त्रिशूली नदी के गालछी क्षेत्र में जलस्तर लगभग 30 मिनट के भीतर 9 मीटर तक बढ़ गया। मालेखू में भी लगभग इसी अवधि में जलस्तर करीब 7 मीटर बढ़ा। यह आंकड़ा इस आपदा की रफ्तार समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। सामान्य बाढ़ में नदी का पानी धीरे-धीरे बढ़ता है। यहां लोगों को तैयारी का अवसर ही नहीं मिला। आधा घंटा। इतने कम समय में नदी ने अपना आकार कई मीटर बढ़ा लिया। उसके साथ सिर्फ पानी नहीं था। वह अपने साथ पहाड़ का मलबा लेकर आ रही थी।
सीमा पर तबाही: जब कैमरे ने कैद किया मौत का सैलाब
नेपाल-चीन सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट के कैमरों ने इस आपदा का भयावह दृश्य रिकॉर्ड किया। अचानक पहाड़ी घाटी से भूरे रंग का मलबा और पानी का विशाल प्रवाह नीचे आता दिखाई देता है। लोग भागते हैं। वाहन रास्ते में छूट जाते हैं। देखते ही देखते सीमा चौकी और आसपास की संरचनाएं उस मलबे में समा जाती हैं। रॉयटर्स के उपग्रह विश्लेषण के मुताबिक सीमा क्षेत्र की लगभग पूरी इमारतें मलबा प्रवाह की चपेट में आईं। यह वह क्षण था जब हिमालय की ऊंचाई पर शुरू हुई घटना सीधे इंसानी जिंदगी पर टूट पड़ी।
फिर आया त्रिशूली का कहर
मलबा और पानी भोटेकोशी से होते हुए त्रिशूली नदी में पहुंचा। इसके बाद यह लहर नीचे की ओर बढ़ती गई। रास्ते में उसने नदी किनारे बसे इलाकों को अपनी चपेट में लिया। एक पुल के बह जाने के दृश्य सामने आए। बहुमंजिला मकानों के निचले हिस्से पानी और कीचड़ में डूब गए। सड़कों का नामोनिशान मिट गया। कई जगह नदी ने अपना पुराना रास्ता तक बदल दिया। रॉयटर्स के उपग्रह विश्लेषण के मुताबिक बाढ़ के बाद नदी चैनलों में बदलाव 100 किलोमीटर से अधिक नीचे, भारतीय सीमा के निकट तक देखा गया। ऊंचाई में यह प्रवाह हिमालय से नीचे उतरते हुए 4,500 मीटर से अधिक की गिरावट तय करता है।
एक घर में जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक हाथ का फासला
इस आपदा की असली तस्वीर आंकड़ों में नहीं, बचे हुए लोगों की आंखों में दिखाई देती है। 68 वर्षीय केशव प्रसाद बराल उस वक्त अपने घर में थे। उन्होंने देखा कि मिट्टी और पानी का एक विशाल प्रवाह उनकी ओर आ रहा है। उन्होंने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और छत की ओर भागने की कोशिश की। लेकिन उनकी पत्नी उनके हाथ से छूट गईं। मलबा उन्हें अपने साथ ले गया। कई घंटे बाद हेलीकॉप्टर से उनको तो बचा लिया गया। उनकी पत्नी का अब तक पता नहीं चला है। यह महज एक बाढ़ की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जो बच गया—लेकिन जिसके बच जाने का अर्थ उसके लिए शायद जिंदगी भर का इंतजार है।
एक आम का पेड़ और जिंदगी की आखिरी उम्मीद
बिदुर में काम कर रहे नेपाली मजदूर विवेक कुमार को जब लोगों ने खतरे की सूचना दी तो वह भागने लगे। लेकिन उनके पीछे पानी नहीं, मलबे की दीवार आ रही थी। वह बहते हुए एक आम के पेड़ तक पहुंचे और किसी तरह उससे चिपक गए। वह पेड़ उनकी जिंदगी और मौत के बीच दीवार बन गया। उनका कहना था कि अगर वह पेड़ नहीं मिला होता तो वह भी बह गए होते। एक तरफ पहाड़ टूटकर नदी बन गया था। दूसरी तरफ एक मामूली-सा आम का पेड़ किसी आदमी के लिए जिंदगी बन गया।
और फिर शुरू हुआ दूसरा खतरा
26 अगस्त की तबाही के बाद भी खतरा समाप्त नहीं हुआ। भारी मलबे ने नदी के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से रोक दिया था। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई कि इससे अस्थायी झील या प्राकृतिक बांध बन सकता है। अगर यह अवरोध अचानक टूटता तो दूसरी बाढ़ पैदा हो सकती थी। यानी जिस पहाड़ ने पहली बार पानी को नीचे भेजा था, उसके गिराए हुए मलबे ने दूसरी तबाही की जमीन तैयार कर दी थी। यही हिमालयी आपदा का सबसे भयावह चरित्र है— एक आपदा खत्म होने से पहले दूसरी आपदा जन्म ले सकती है।
26 अगस्त की सुबह का निष्कर्ष
अगर उस सुबह की पूरी घटना को सिर्फ कुछ पंक्तियों में समेटें तो क्रम कुछ ऐसा बनता है— 8:37 बजे: करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर हिमनद का बड़ा हिस्सा टूटा। इसके बाद: बर्फ, चट्टान और मलबा लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा और तेज रफ्तार मलबा प्रवाह बना। करीब 9:00 बजे: भोटेकोशी नदी तंत्र में जलस्तर तेजी से बढ़ना शुरू हुआ। अगले मिनटों में: मलबा और पानी भोटे कोशी से त्रिशूली की ओर बढ़ा। करीब 30 मिनट के भीतर: गालछी में नदी का जलस्तर करीब 9 मीटर तक ऊपर चला गया। इसके बाद: सीमा क्षेत्र, गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और बाजार तबाही की चपेट में आते गए। फिर शुरू हुआ— लापता लोगों की तलाश का सबसे लंबा दिन।
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