Home Economy क्या पेट्रोलियम संकट की तरफ बढ़ रहा है भारत?

क्या पेट्रोलियम संकट की तरफ बढ़ रहा है भारत?

मिडिल ईस्ट की आग, अमेरिका की शांति वार्ता और भारत पर मंडराता खतरा

KKN ब्यूरो। तेल… सिर्फ एक ईंधन नहीं। यह आधुनिक दुनिया की नसों में दौड़ता हुआ खून है और आज… वही खून जमने की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, ईरान–अमेरिका टकराव, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर मंडराता संकट और तेल बाजार में बढ़ती बेचैनी… ये सब मिलकर दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर चुके हैं, जहां एक छोटी सी चिंगारी वैश्विक आर्थिक विस्फोट में बदल सकती है। सबसे बड़ा सवाल है— क्या भारत एक बड़े पेट्रोलियम संकट की तरफ बढ़ रहा है? क्या अमेरिका की शांति वार्ता वास्तव में शांति ला पाएगी या यह सिर्फ युद्धविराम का भ्रम है, जिसके बाद और बड़ा विस्फोट होना तय है?

मिडिल ईस्ट: दुनिया का तेल टैंक और बारूद का ढेर

मिडिल ईस्ट केवल धार्मिक या राजनीतिक संघर्षों का क्षेत्र नहीं है। यह दुनिया के ऊर्जा संतुलन का केंद्र बन गया है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरता है। यही वह रास्ता है, जहां से खाड़ी देशों का तेल एशिया, यूरोप और भारत तक पहुंचता है। लेकिन अब यही रास्ता सबसे बड़े खतरे में है। विश्लेषकों के मुताबिक ईरान और अमेरिका-इजरायल संघर्ष के कारण होर्मुज़ क्षेत्र में सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। कई रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित हुआ तो वैश्विक तेल बाजार में “ऐतिहासिक संकट” पैदा हो सकता है।

भारत कितना फंसा हुआ है इस जाल में?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 89 प्रतिशत तेल आयात करता है और इसमें से करीब 55 प्रतिशत तेल सीधे मिडिल ईस्ट से आता है। यानी यदि खाड़ी क्षेत्र में युद्ध बढ़ता है, तो भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में होगा। विशेषज्ञों के अनुसार भारत की LNG और LPG जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी खाड़ी देशों पर निर्भर है। इसका सीधा मतलब है—

  • पेट्रोल महंगा होगा
  • डीजल महंगा होगा
  • गैस सिलेंडर महंगा होगा
  • ट्रांसपोर्ट महंगा होगा
  • खाद्य पदार्थ महंगे होंगे
  • और अंततः आम आदमी की जिंदगी महंगी हो जाएगी

क्या भारत के पास संकट से निपटने की तैयारी है?

सरकार दावा कर रही है कि भारत ने तेल स्रोतों में विविधता लाई है और पर्याप्त भंडार मौजूद हैं। लेकिन दूसरी तरफ रिपोर्टें कहती हैं कि भारत के पास सीमित रणनीतिक भंडारण क्षमता है और लंबा संकट देश को भारी दबाव में ला सकता है। कुछ विश्लेषकों का दावा है कि भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 74 दिनों का स्टॉक है, लेकिन सक्रिय रिफाइनरी भंडार 20–25 दिनों तक ही पर्याप्त हो सकते हैं। यानी अगर युद्ध लंबा चला… तो भारत की आर्थिक धड़कनें तेज हो सकती हैं।

अमेरिका की शांति वार्ता — समाधान या रणनीति?

अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की वार्ताएं हुई हैं। ओमान, पाकिस्तान और कुछ खाड़ी देशों ने मध्यस्थता की कोशिश भी की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल में दावा किया कि ईरान संकट को लेकर “प्रगति” हुई है और सकारात्मक नतीजों की उम्मीद है। लेकिन सवाल यह है— क्या यह वास्तविक शांति है या केवल युद्ध को रोकने की अस्थायी कूटनीति? क्योंकि जमीन पर तस्वीर अलग दिख रही है।

  • लेबनान में हमले जारी हैं
  • होर्मुज़ क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं
  • ईरान और इजरायल के बीच अविश्वास चरम पर है
  • खाड़ी देश खुद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यानी वार्ता चल रही है… लेकिन बारूद भी तैयार रखा गया है।

सबसे बड़ा डर: होर्मुज़ बंद हुआ तो क्या होगा?

यदि ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पूरी तरह बाधित करता है, तो दुनिया में तेल की कीमतें विस्फोटक स्तर तक जा सकती हैं। कुछ रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि ब्रेंट क्रूड 130–140 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। भारत के लिए इसका मतलब होगा—

  • रिकॉर्ड महंगाई
  • रुपये पर दबाव
  • शेयर बाजार में गिरावट
  • एयरलाइन सेक्टर पर संकट
  • कृषि लागत में बढ़ोतरी
  • और सरकार के राजकोषीय संतुलन पर भारी दबाव

MUFG की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है तो भारतीय रुपया गंभीर दबाव में आ सकता है।

क्या रूस भारत को बचा सकता है?

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी तेल खरीद में तेजी लाई थी। अब फिर से रूस भारत के लिए राहत का रास्ता बन सकता है। लेकिन यहां भी खतरा है। यदि पश्चिमी दबाव बढ़ा… या समुद्री बीमा और शिपिंग पर प्रतिबंध कड़े हुए… तो रूस से आने वाला तेल भी महंगा और जोखिमपूर्ण हो सकता है।

चीन, अमेरिका और खाड़ी की नई राजनीति

मिडिल ईस्ट का तनाव अब केवल तेल का सवाल नहीं रह गया है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन की नई लड़ाई बन चुका है। अमेरिका ईरान को रोकना चाहता है। चीन खाड़ी में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। रूस पश्चिमी दबाव तोड़ना चाहता है और खाड़ी देश खुद को युद्ध से बचाना चाहते हैं। भारत इस पूरे खेल में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सबसे कठिन स्थिति भारत की ही है— क्योंकि भारत को तेल भी चाहिए… अमेरिका से रिश्ते भी चाहिए… रूस से रक्षा सहयोग भी चाहिए… और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी चाहिए।

क्या भारत में पेट्रोल 150 रुपये तक जा सकता है?

यह सवाल अब केवल टीवी डिबेट का हिस्सा नहीं रहा। यदि, होर्मुज़ लंबे समय तक प्रभावित रहा, ईरान–अमेरिका वार्ता विफल हुई, खाड़ी देशों में प्रत्यक्ष युद्ध भड़का और वैश्विक सप्लाई चेन टूटी तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें ऐतिहासिक स्तर को छू सकती हैं। हालांकि सरकार टैक्स कटौती और सब्सिडी जैसे कदम उठा सकती है, लेकिन लंबे संकट की स्थिति में राहत सीमित हो सकती है।

भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल

क्या भारत ऊर्जा सुरक्षा के नए युग में प्रवेश कर चुका है? अब सवाल सिर्फ तेल खरीदने का नहीं है। सवाल यह है कि— क्या भारत अपनी ऊर्जा निर्भरता घटा पाएगा? क्या इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर्याप्त तेजी से बढ़ पाएगी? क्या भारत रणनीतिक तेल भंडारण बढ़ाएगा? क्या भारत वैकल्पिक ऊर्जा में युद्धस्तर पर निवेश करेगा? क्योंकि आने वाला समय केवल युद्ध का नहीं… ऊर्जा युद्ध का हो सकता है।

दुनिया युद्ध के मुहाने पर या नई शांति के दौर में?

अमेरिका शांति की बात कर रहा है। ईरान समझौते की भाषा बोल रहा है। खाड़ी देश मध्यस्थता कर रहे हैं। लेकिन इतिहास कहता है— मिडिल ईस्ट में शांति अक्सर युद्ध के बीच मिलने वाला छोटा विराम होती है और यदि यह विराम टूटा… तो सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ेगा जो तेल पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं। भारत उन्हीं में से एक है। अब सवाल केवल इतना नहीं कि मिडिल ईस्ट में क्या होगा। असल सवाल यह है— क्या भारत आने वाले ऊर्जा तूफान के लिए सचमुच तैयार है?

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

KKN Public Correspondent Initiative


Discover more from

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version