KKN ब्यूरो। क्या आपने कभी सोचा है कि मिडिल ईस्ट की हर जंग का कारण हमेशा तेल, धर्म और सरहद ही क्यों बताया जाता है? क्यों दुनिया की बड़ी ताकतें—अमेरिका, रूस और चीन—इस इलाके से कभी पूरी तरह दूर नहीं जातीं? सबसे बड़ा सवाल… अगर कल मिडिल ईस्ट के समुद्र में बिछी कुछ केबलें कट जाएं तो क्या दुनिया की अर्थव्यवस्था कुछ ही घंटों में ठप हो जायेगी? यह सवाल अजीब लग सकता है। लेकिन गहराई से देखें तो मिडिल ईस्ट की जंग सिर्फ जमीन और आसमान में नहीं… समुद्र के नीचे भी लड़ी जा रही है। एक ऐसा युद्ध… जिसे दुनिया अभी तक समझ ही नहीं पाई है।
दुनिया की असली लाइफलाइन: समुद्र के नीचे बिछा इंटरनेट
दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट से चलता है। लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है। दुनिया का लगभग 95 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों से होकर गुजरता है। ये केबलें हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं और महाद्वीपों को जोड़ती हैं। यानी जब आप ईमेल भेजते हैं, बैंक ट्रांसफर करते हैं, यूट्यूब वीडियो देखते हैं या अंतरराष्ट्रीय ट्रेड करते हैं तो आपका डेटा अक्सर समुद्र के नीचे से होकर गुजरता है। इन केबलों का सबसे संवेदनशील इलाका है— मिडिल ईस्ट का…।
दुनिया के डिजिटल चोक पॉइंट
रणनीतिक विशेषज्ञ दुनिया में कुछ जगहों को Digital Chokepoints कहते हैं। ये वे स्थान हैं जहां से बड़ी संख्या में इंटरनेट केबल गुजरती हैं। मिडिल ईस्ट के आसपास तीन ऐसे चोक पॉइंट मौजूद हैं। इसमें पहला है रेड सी… यूरोप और एशिया को जोड़ने वाली कई केबल यहां से होकर गुजरती हैं। दूसरा है स्वैज कैनाल… यह दुनिया का डिजिटल और व्यापारिक शॉर्टकट है और तीसरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है। यहां से सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि डेटा का भी बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर इन तीन जगहों पर संकट आया तो असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरी दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
2008 की रहस्यमयी घटना
फरवरी 2008 में एक अजीब घटना हुई थी। मेडिटेरेनियन सागर में अचानक तीन बड़े इंटरनेट केबल टूट गए थे। इसके बाद जो हुआ वह चौंकाने वाला था। भारत का इंटरनेट ट्रैफिक बुरी तरह प्रभावित हुआ। खाड़ी देशों की बैंकिंग सेवाएं बाधित हो गईं। कहतें है मध्य पूर्व के कई देशों में इंटरनेट सेवा लगभग बंद हो गया था। आधिकारिक तौर पर इसका कारण बताया गया— जहाज का एंकर…। लेकिन कई विशेषज्ञों ने बाद में सवाल उठाया कि इतनी बड़ी घटना, सिर्फ दुर्घटना नहीं हो सकती।
टेक कंपनियां क्यों बिछा रही हैं अपनी केबलें
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां समुद्री केबल नेटवर्क में भारी निवेश कर रही हैं। जैसे Google, Meta और Amazon…। इन कंपनियों ने अपने खुद के केबल प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। इसका मतलब क्या है? सिर्फ इंटरनेट तेज करना नहीं…। असल मकसद है— डेटा रूट पर नियंत्रण करना…।
चीन की डिजिटल सिल्क रोड
चीन ने अपने Digital Silk Road प्रोजेक्ट के तहत नई इंटरनेट केबल लाइनों का निर्माण शुरू किया है। इसका लक्ष्य है- एशिया, अफ्रीका और यूरोप को चीन के डेटा नेटवर्क से जोड़ना। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी परियोजना नहीं है। बल्कि, यह भू-राजनीतिक रणनीति है।
युद्ध का नया हथियार: इंटरनेट ब्लैकआउट
आधुनिक युद्ध अब सिर्फ टैंक और मिसाइल तक सीमित नहीं रहा। अब युद्ध के नए हथियार बन गये हैं- साइबर अटैक, सैटेलाइट जामिंग, इंटरनेट ब्लैकआउट और डेटा केबल को नुकसान पहुंचाना। अगर किसी देश ने समुद्र के नीचे बिछी केबल को निशाना बनाया तो अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम रुक सकता है। स्टॉक मार्केट ठप हो सकते हैं और एयर ट्रैफिक कंट्रोल प्रभावित हो सकता है। यानी दुनिया की पूरी अर्थव्यवस्था हिल सकती है।
भारत के लिए खतरा
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लेकिन भारत का अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट नेटवर्क अभी भी समुद्री केबलों पर काफी निर्भर है। मुंबई, चेन्नई और कोच्चि से निकलने वाली कई केबलें मिडिल ईस्ट के रास्ते यूरोप तक जाती हैं। अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध बढ़ता है तो भारत का इंटरनेट ट्रैफिक प्रभावित हो सकता है! फिनटेक सेक्टर प्रभावित हो सकता है और डेटा ट्रांसफर धीमा हो सकता है।
भारत को क्या करना चाहिए
रणनीतिक विशेषज्ञ तीन बड़े कदम सुझाते हैं। 1. वैकल्पिक डेटा रूट- भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र के जरिए नए केबल नेटवर्क विकसित करने चाहिए। 2. सैटेलाइट इंटरनेट- भारत को स्वदेशी सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सिस्टम मजबूत करना होगा। 3. समुद्री सुरक्षा- भारतीय नौसेना को समुद्र के नीचे बिछी डिजिटल संरचनाओं की सुरक्षा पर ध्यान देना होगा।
क्या अगली विश्व युद्ध डिजिटल होगा
इतिहास गवाह है कि हर युग में युद्ध के कारण बदलते रहे हैं। कभी जमीन के लिए युद्ध हुए, कभी सोने के लिए और कभी तेल के लिए। लेकिन 21वीं सदी का सबसे बड़ा संसाधन है— डेटा…। अगर डेटा दुनिया की नई ताकत है तो मिडिल ईस्ट उसकी सबसे बड़ी रणभूमि बन सकता है।
तेल और राजनीति से आगे क्या
क्या मिडिल ईस्ट की जंग वास्तव में तेल और राजनीति से आगे बढ़कर दुनिया की डिजिटल नसों पर कब्ज़े की लड़ाई बन चुकी है? अगर ऐसा है… तो क्या अगली बड़ी वैश्विक जंग समुद्र के नीचे बिछी उन अदृश्य केबलों के लिए होगी जिन्हें दुनिया अभी तक नजरअंदाज कर रही है?
