Home KKN Special ईरान पर अमेरिकी हमला या चीन को घेरने की रणनीति?

ईरान पर अमेरिकी हमला या चीन को घेरने की रणनीति?

KKN ब्यूरो। क्या मिडिल ईस्ट में उठती हर जंग की आग के पीछे कोई बड़ी भू-राजनीतिक चाल छिपी होती है? क्या सचमुच अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम से डर गया है… या फिर यह लड़ाई किसी और के खिलाफ है? सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि दुनिया में एक देश ऐसा भी है जो खुलेआम परमाणु बम बना चुका है — उत्तर कोरिया। लेकिन उस पर अमेरिका ने कभी वैसा हमला नहीं किया जैसा ईरान को लेकर बार-बार चर्चा में आता है। तो फिर सवाल सीधा है — अमेरिका का निशाना उत्तर कोरिया नहीं… बल्कि ईरान ही क्यों? क्या इस पूरी कहानी के पीछे एक तीसरा खिलाड़ी भी है — चीन?

ईरान का परमाणु कार्यक्रम: असली खतरा या बहाना

ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में शुरू हुआ था, जब अमेरिका ही उसके परमाणु कार्यक्रम का समर्थक था। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हालात बदल गए। अब पश्चिमी देशों को डर यह नहीं था कि ईरान परमाणु ऊर्जा बनाएगा, बल्कि यह था कि वह परमाणु हथियार बना सकता है।

मुख्य विवाद तीन मुद्दों पर रहा

यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) परमाणु हथियार बनाने की संभावित क्षमता और IAEA निरीक्षण को लेकर विवाद। दरअसल, 2015 में JCPOA (Iran Nuclear Deal) हुआ, जिसमें ईरान ने परमाणु कार्यक्रम सीमित करने का वादा किया। लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया। इसके बाद से तनाव लगातार बढ़ता गया। लेकिन असली सवाल अभी भी वही है—  क्या यह सिर्फ परमाणु हथियार का मामला है?

अगर परमाणु हथियार ही मुद्दा है… तो उत्तर कोरिया क्यों सुरक्षित है

उत्तर कोरिया की स्थिति ईरान से बिल्कुल अलग है। उत्तर कोरिया पहले ही परमाणु बम बना चुका है! उसने कई परमाणु परीक्षण किए है। उसके पास ICBM मिसाइलें हैं जो अमेरिका तक पहुंच सकती हैं! फिर भी अमेरिका ने उस पर सीधा हमला नहीं किया। इसके पीछे तीन बड़े कारण माने जाते हैं:

  1. परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) उत्तर कोरिया के पास वास्तविक परमाणु हथियार हैं। हमले की स्थिति में वह जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिकी बेस पर हमला कर सकता है।
  2. चीन की सुरक्षा छतरी: उत्तर कोरिया को चीन का अप्रत्यक्ष संरक्षण प्राप्त है। अमेरिका का हमला सीधे चीन से टकराव पैदा कर सकता है।
  3. युद्ध का भारी जोखिम: उत्तर कोरिया के पास विशाल पारंपरिक सेना भी है जो सियोल जैसे शहरों को मिनटों में निशाना बना सकती है। इसलिए अमेरिका के लिए उत्तर कोरिया पर हमला आत्मघाती युद्ध बन सकता है। लेकिन ईरान की स्थिति अलग है।

ईरान क्यों आसान लक्ष्य माना जाता है

ईरान के पास अभी परमाणु हथियार नहीं हैं और यही वह रणनीतिक खिड़की है जहां अमेरिका दबाव बना सकता है। दूसरे कारण है- मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे…। ईरान के आसपास अमेरिकी नौसैनिक मौजूद है। क्षेत्र में इजराइल और अरब देशों का समर्थन प्राप्त है। यानी रणनीतिक रूप से अमेरिका के लिए ईरान पर दबाव बनाना आसान है। लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अभी बाकी है।

चीन का तेल और ईरान: असली खेल यहीं है

आज दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा भूख किस देश को है? चीन को…। चीन की ऊर्जा सुरक्षा तीन क्षेत्रों पर टिकी है। रूस, ईरान और वेनेजुएला…। विशेषज्ञों के अनुसार चीन के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण तेल स्रोत रहा है। विशेष रूप से तब, जब अमेरिका ने ईरान पर कठोर प्रतिबंध लगाए। लेकिन चीन गुप्त या वैकल्पिक रास्तों से तेल खरीदता रहा। रिपोर्टों के अनुसार- चीन के आयातित तेल का बड़ा हिस्सा प्रतिबंधित या सस्ती सप्लाई से आता है। ईरान और वेनेजुएला दोनों चीन को भारी छूट पर तेल देते हैं। यानी ईरान पर दबाव का एक असर यह भी हो सकता है— कि चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ाया जाये।

क्या यह चीन को घेरने की रणनीति है

कई भू-राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि दुनिया का असली संघर्ष अब अमेरिका बनाम चीन है। यह टकराव सिर्फ व्यापार युद्ध तक सीमित नहीं है। रणनीति के स्तर पर अमेरिका चीन को तीन मोर्चों पर घेरने की कोशिश करता दिखाई देता है। टेक्नोलॉजी युद्ध, सेमीकंडक्टर प्रतिबंध और Huawei पर कार्रवाई…। अगर इन तीनों देशों की ऊर्जा सप्लाई सीमित होती है, तो इसका असर सीधे चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

खतरा सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं

अगर ईरान और अमेरिका का टकराव बढ़ता है तो इसका असर तीन जगह सबसे ज्यादा पड़ेगा। 1. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। 2. वैश्विक तेल कीमतें। युद्ध की स्थिति में तेल कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। 3. एशिया की अर्थव्यवस्था। चीन, भारत और जापान जैसे देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

परमाणु मुद्दा या भू-राजनीतिक युद्ध

मिडिल ईस्ट की राजनीति को समझना आसान नहीं। क्योंकि यहां हर युद्ध के पीछे कई परतें होती हैं। ऊपरी परत कहती है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम एक खतरा है। लेकिन गहरी परत शायद यह भी कहती है— कि यह अमेरिका बनाम ईरान का संघर्ष नहीं है। बल्कि, यह अमेरिका बनाम चीन का रणनीतिक मुकाबला है। ईरान शायद उस शतरंज का एक मोहरा है। सबसे बड़ा सवाल- अगर अमेरिका का असली लक्ष्य परमाणु हथियार है… तो उत्तर कोरिया सुरक्षित क्यों है? अगर असली खेल ऊर्जा और भू-राजनीति का है… तो क्या मिडिल ईस्ट में उठती यह जंग दरअसल चीन की आर्थिक कमर तोड़ने की शुरुआत मानी जायेगी।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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