Home Bihar बिहार का पलायन: क्या रोज़गार की तलाश में निकलती पीढ़ियां कभी लौटेंगी?

बिहार का पलायन: क्या रोज़गार की तलाश में निकलती पीढ़ियां कभी लौटेंगी?

बिहार के किसी छोटे से गांव में शाम ढलते ही अगर आप बस अड्डे, रेलवे स्टेशन या सड़क किनारे खड़े हो जाएं, तो एक कहानी बार-बार दिखाई देगी। कंधे पर बैग। हाथ में मोबाइल। जेब में कुछ पैसे। घरवालों की आंखों में उम्मीद और चिंता—दोनों। मंजिल अक्सर बिहार से बाहर है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक या किसी दूसरे शहर की तरफ जाती ट्रेन में बैठा वह युवक सिर्फ नौकरी की तलाश में नहीं निकलता। वह अपने गांव की उस अर्थव्यवस्था से बाहर निकल रहा होता है, जो उसकी मेहनत के बदले पर्याप्त आमदनी पैदा नहीं कर पा रही। यही बिहार के पलायन की असली कहानी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बिहार से लोग बाहर क्यों जाते हैं? सवाल यह है— अगर दशकों से सरकारें पलायन रोकने की कोशिश कर रही हैं, तो फिर बिहार के गांवों से रोजगार की तलाश में बाहर जाने की जरूरत खत्म क्यों नहीं हुई? और उससे भी बड़ा सवाल— क्या पलायन को वास्तव में रोका जा सकता है, या फिर यह बिहार की राजनीति का ऐसा मुद्दा बन चुका है, जिसकी चर्चा हर चुनाव में होगी लेकिन समाधान कभी पूरा नहीं होगा?

पलायन की समस्या है, लेकिन उसका पूरा वर्तमान आंकड़ा कहां है?

बिहार में पलायन की चर्चा जितनी पुरानी है, उसके बारे में अद्यतन और पूर्ण आंकड़ों की कमी उतनी ही महत्वपूर्ण समस्या है। भारत में आखिरी व्यापक प्रवासन सर्वेक्षण 2020-21 के आंकड़ों पर आधारित है। केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में बताया कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय जुलाई 2026 से जून 2027 के बीच नया प्रवासन सर्वेक्षण करने जा रहा है। इसमें ग्रामीण-शहरी और अंतरराज्यीय पलायन, उसके कारण, मौसमी पलायन, वापसी और प्रवासी श्रमिकों के रोजगार जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा। यानी आज बिहार के पलायन को समझने के लिए सबसे बड़ी कठिनाई यह भी है कि हमारे पास बदलती तस्वीर का उतना ताजा और व्यापक मानचित्र नहीं है, जितना नीति बनाने के लिए होना चाहिए। फिर भी उपलब्ध शोध एक महत्वपूर्ण बात बताता है। भारतीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार बिहार से बाहर जाने वाले श्रमिकों की संख्या और गति बढ़ने के पीछे ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार की कमी तथा दूसरे राज्यों में श्रम की मांग प्रमुख कारकों में हैं। अध्ययन यह भी बताता है कि बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक अस्थायी और असुरक्षित रोजगार में काम करते हैं। यानी समस्या सिर्फ बेरोजगारी नहीं है। समस्या स्थानीय अर्थव्यवस्था की रोजगार पैदा करने की क्षमता है।

बिहार में रोजगार है, लेकिन क्या वह पर्याप्त है?

बिहार की अर्थव्यवस्था पिछले वर्षों में तेज गति से बढ़ी है। राज्य के आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर ₹69,321 और वर्तमान कीमतों पर सकल राज्य घरेलू उत्पाद लगभग ₹9.92 लाख करोड़ रहा। लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, फिर भी रोजगार का बड़ा हिस्सा कृषि और अनौपचारिक क्षेत्र में केंद्रित है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार 2023-24 में राज्य के लगभग 53.2% श्रमिक प्राथमिक क्षेत्र में थे, जबकि द्वितीयक क्षेत्र में 23.7% और तृतीयक क्षेत्र में 23.1%। इसी रिपोर्ट के अनुसार 90.8% पुरुष और 78.8% महिला श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत थे। यहीं से पलायन की अर्थव्यवस्था समझ में आती है। अगर गांव में खेती से पूरे साल पर्याप्त आमदनी नहीं है, स्थानीय उद्योग सीमित हैं और नियमित वेतन वाली नौकरियां कम हैं, तो मजदूर के सामने विकल्प क्या है? वह बाहर जाएगा। इसलिए केवल यह कहना कि “बिहार से पलायन रोकना है”, समस्या का समाधान नहीं है। पहले यह पूछना होगा— बिहार में ऐसा क्या बनाया जाए कि बाहर जाने की आर्थिक मजबूरी कम हो?

सरकारों ने कोशिश नहीं की, ऐसा भी नहीं है

यह कहना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि पलायन रोकने के लिए बिहार में कोई प्रयास नहीं हुआ। कौशल विकास, स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण रोजगार, उद्यमिता, औद्योगिक निवेश, रोजगार मेलों और स्थानीय उत्पादन आधारित योजनाओं के जरिए अलग-अलग दौर में प्रयास किए गए हैं। कोविड के दौरान जब लाखों प्रवासी श्रमिक वापस बिहार लौटे, तब समस्या अचानक पूरी दुनिया के सामने दिखाई दी। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में बिहार के मुजफ्फरपुर में लौटे प्रवासी श्रमिकों के लिए कौशल मानचित्रण और समूह आधारित रोजगार के प्रयासों का उल्लेख है। विभिन्न समूहों में तैयार परिधान, मिठाई पैकेजिंग, लहठी, मोबाइल चार्जर असेंबलिंग और पेवर ब्लॉक जैसे काम विकसित करने की कोशिश की गई थी। कुछ समूह 25-30 सदस्यों से शुरू होकर 200-300 लोगों तक रोजगार देने लगे। यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण सबक देता है। पलायन रोकने का रास्ता केवल बड़ी फैक्ट्री नहीं है। छोटे-छोटे स्थानीय उत्पादन केंद्र भी रोजगार का आधार बन सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे प्रयोग कितने बड़े पैमाने पर और कितने लंबे समय तक टिक पाए? यहीं असली परीक्षा शुरू होती है।

क्या बिहार में हर व्यक्ति को रोकना ही समाधान है?

यहां पलायन को लेकर एक बुनियादी भ्रम दूर करना जरूरी है। हर पलायन बुरा नहीं होता। अगर बिहार का कोई युवा बेहतर शिक्षा, उच्च वेतन, तकनीकी प्रशिक्षण या अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए बेंगलुरु, दिल्ली या मुंबई जाता है, तो उसे रोकना विकास का लक्ष्य नहीं हो सकता। समस्या तब है जब व्यक्ति विकल्प के कारण नहीं, मजबूरी के कारण बाहर जाए। अर्थात लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि— “कोई बिहारी बाहर न जाए।” लक्ष्य होना चाहिए— “किसी बिहारी को सिर्फ इसलिए बाहर न जाना पड़े क्योंकि उसके गांव या जिले में सम्मानजनक आजीविका का विकल्प नहीं है।” यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि सफल अर्थव्यवस्था लोगों को रोकती नहीं है। वह लोगों को चुनने की आजादी देती है।

बिहार में पलायन का असली इलाज क्या है?

नीति आयोग के हालिया विश्लेषण में बिहार को कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था वाले राज्यों में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2022-23 में बिहार में कृषि का रोजगार में हिस्सा लगभग 48.6% था। रिपोर्ट यह भी कहती है कि कृषि में अपेक्षाकृत कम उत्पादकता और स्थानीय स्तर पर रोजगार सोखने की सीमित क्षमता के कारण पलायन परिवारों के लिए आय में विविधता लाने की रणनीति बन जाता है। इसलिए समाधान को पांच परतों में देखना होगा। पहली—खेती से आय बढ़ाना। सिर्फ फसल उत्पादन नहीं, बल्कि भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन को गांव के नजदीक लाना होगा। दूसरी—छोटे और मध्यम उद्योग। बिहार की स्थानीय ताकतों—मखाना, लीची, मक्का, डेयरी, मत्स्य पालन, हस्तशिल्प, वस्त्र, चमड़ा और खाद्य प्रसंस्करण—को रोजगार की पूरी श्रृंखला में बदलना होगा। तीसरी—कौशल और बाजार का संबंध। सिर्फ प्रशिक्षण प्रमाणपत्र बांटने से रोजगार नहीं बनता। प्रशिक्षण उसी कौशल का होना चाहिए जिसकी स्थानीय या राष्ट्रीय बाजार में वास्तविक मांग हो। चौथी—जिला आधारित रोजगार नीति। हर जिले की अर्थव्यवस्था अलग है। मुजफ्फरपुर में जो मॉडल काम करेगा, वह किशनगंज या गया में उसी तरह काम करे, यह जरूरी नहीं। पांचवीं—स्थायी उद्यम। सरकारी सहायता से शुरू हुआ कोई समूह कुछ साल बाद बंद हो जाए तो वह पलायन का स्थायी समाधान नहीं है। असली कसौटी यह है कि बाजार मिलने के बाद वह व्यवसाय सरकारी मदद के बिना भी चल सके।

पलायन पर राजनीति खत्म नहीं होगी, लेकिन उसका अर्थ बदल सकता है

पलायन बिहार की राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ नौकरी का मुद्दा नहीं है। यह परिवार का मुद्दा है। गांव में रह गई पत्नी का मुद्दा है। बुजुर्ग माता-पिता का मुद्दा है। बच्चों की पढ़ाई का मुद्दा है। गांव की सामाजिक संरचना का मुद्दा है और उस युवक की गरिमा का भी, जो हर कुछ महीने बाद दूसरे राज्य की ट्रेन पकड़ता है। इसलिए पलायन पर राजनीति होना स्वाभाविक है। लेकिन राजनीति और नीति में अंतर यहीं से पैदा होता है। अगर हर चुनाव में सिर्फ यह कहा जाए कि “हम पलायन रोक देंगे”, तो यह एक राजनीतिक वादा है। लेकिन अगर सरकार यह बताए कि अगले 5 वर्षों में किस जिले में कितने नए रोजगार पैदा होंगे, किस क्षेत्र में कितना निवेश आएगा, कितने युवाओं को कौशल मिलेगा, कितने उद्यम टिके और कितने लोगों की स्थानीय आय बढ़ी—तब यह नीति का परीक्षण बन जाता है। बिहार सरकार का नया रोजगार सेतु भी पंजीकरण, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और रोजगार को एकीकृत मंच से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। सरकारी पोर्टल पर सुरक्षित विदेश रोजगार की सुविधा भी शामिल है। लेकिन किसी भी योजना की असली सफलता पोर्टल पर पंजीकरण की संख्या नहीं होगी। सवाल होगा— कितने लोगों की आय वास्तव में बढ़ी?

क्या बिहार पलायन रोक सकता है?

हां—लेकिन पूरी तरह रोकना शायद सही लक्ष्य ही नहीं है। पलायन तब तक रहेगा, जब तक लोग बेहतर अवसर के लिए स्थान बदलना चाहते रहेंगे। लेकिन मजबूरी वाला पलायन कम किया जा सकता है। उसके लिए बिहार को बेरोजगारी के खिलाफ नहीं, बल्कि कम आय वाली अर्थव्यवस्था के खिलाफ लड़ना होगा। गांव में सिर्फ सड़क बना देने से युवा नहीं रुकेगा। स्कूल बना देने से भी नहीं। सिर्फ सरकारी नौकरी देकर भी नहीं। उसे चाहिए— काम, उचित आय, बाजार, कौशल, सुरक्षा और आगे बढ़ने की संभावना। यही वह जगह है जहां बिहार की पलायन कहानी एक नए सवाल में बदल जाती है। अगर बिहार की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है, तो उस वृद्धि का कितना हिस्सा उस मजदूर की जेब तक पहुंच रहा है, जो आज भी अपनी कमाई के लिए दूसरे राज्य की ट्रेन पकड़ता है? शायद बिहार के पलायन का सबसे बड़ा जवाब इसी सवाल में छिपा है। क्योंकि जिस दिन बिहार में रोजगार पैदा करने की मजबूरी नहीं, बल्कि रोजगार चुनने की क्षमता पैदा होगी—उस दिन पलायन की राजनीति अपने आप एक अलग अर्थ लेने लगेगी। तब सवाल यह नहीं होगा कि “बिहारी बाहर क्यों जाता है?” सवाल होगा— “बिहार ने ऐसा क्या बनाया कि बाहर जाने वाला बिहारी पहली बार लौटने के बारे में सोचने लगा?”

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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