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बरसात के बाद घरों की सफाई, दीपों का प्रकाश और कीट-पतंगों का संसार

क्या हमारे पूर्वजों ने पर्व के बहाने स्वास्थ्य सुरक्षा का सूत्र दिया था?

कल्पना कीजिए, वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी है। घरों की दीवारों में नमी है। गलियों में जगह-जगह पानी जमा है। छतों, नालियों और घरों के आसपास कचरा इकट्ठा है। मच्छरों और दूसरे कीटों की सक्रियता बढ़ रही है। मौसम में बदलाव के साथ संक्रमण का खतरा भी मौजूद है। ऐसे समय में भारतीय समाज एक ऐसा पर्व मनाता है, जिसकी तैयारी घरों की व्यापक सफाई से शुरू होती है और जिसकी पहचान अंधेरी रात में जलते असंख्य दीपों से होती है। यह पर्व है दीपावली…।

सवाल यह है कि क्या दीपावली केवल धार्मिक आस्था और पौराणिक मान्यताओं का उत्सव है? अथवा इसके पीछे मौसम, पर्यावरण, स्वच्छता और मानव स्वास्थ्य से जुड़ी कोई व्यावहारिक समझ भी काम कर रही है? इस सवाल की पड़ताल दिलचस्प है। क्योंकि दीपावली की कुछ परंपराएं आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी उपयोगी दिखाई देती हैं। हालांकि, कुछ प्रचलित वैज्ञानिक दावों का कोई ठोस ऐतिहासिक या शोधपरक प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए आस्था और विज्ञान के बीच अंतर समझना जरूरी है।

सफाई के पीछे छिपा स्वास्थ्य विज्ञान

भारत में दीपावली सामान्यतः अक्टूबर और नवंबर के बीच आती है। इसकी तारीख हिंदू चंद्र कैलेंडर के कार्तिक अमावस्या के अनुसार निर्धारित होती है। इस समय देश के बड़े हिस्से में मानसून की वापसी हो चुकी होती है। हालांकि, क्षेत्रीय मौसम में अंतर बना रहता है।

बरसात का मौसम अपने साथ कई स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लेकर आता है। घरों की दीवारों में नमी, बंद नालियों में गंदगी, छतों पर जमा पानी और आसपास बिखरे कचरे से मच्छरों तथा दूसरे कीटों को अनुकूल वातावरण मिलता है। कई जगहों पर फफूंद और सीलन भी घरों की समस्या बन जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, रुका हुआ पानी मच्छरों के प्रजनन का महत्वपूर्ण माध्यम है। भारत का राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम भी मानसून और मानसून के बाद मच्छरों की सक्रियता बढ़ने की पुष्टि करता है। यहीं दीपावली की पारंपरिक सफाई का व्यावहारिक महत्व सामने आता है। घर के कोने-कोने की सफाई, पुराने अनुपयोगी सामान को हटाना, दीवारों की मरम्मत, नालियों की सफाई और आसपास के कचरे का निस्तारण स्वच्छ वातावरण बनाने में मदद करते हैं।

इससे धूल, गंदगी और कुछ कीटों के छिपने के स्थान कम हो सकते हैं। नमी और फफूंद की समस्या पहचानने तथा उसका उपचार करने का अवसर भी मिलता है। इसलिए दीपावली की सफाई को केवल धार्मिक परंपरा मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। हालांकि, यह दावा करना भी वैज्ञानिक नहीं होगा कि प्राचीन समाज ने बाकायदा संक्रमण नियंत्रण की आधुनिक अवधारणा के तहत दीपावली की सफाई शुरू की थी।

क्या सचमुच रोशनी से कीटों का सफाया होता है?

दीपावली का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है मिट्टी का दीपक…। अमावस्या की रात घरों, मंदिरों, गलियों और सार्वजनिक स्थलों पर दीप जलाने की परंपरा रही है। सामान्य धारणा है कि दीपक की रोशनी से कीट-पतंगे आकर्षित होकर आग में जल जाते हैं। इस तरह घरों के आसपास मौजूद कीटों की संख्या कम हो जाती है। इस मान्यता में कुछ वैज्ञानिक आधार अवश्य है, लेकिन पूरी सच्चाई इससे अलग है।

जनवरी 2024 में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक शोध ने कृत्रिम रोशनी के आसपास उड़ने वाले कीटों के व्यवहार की नई व्याख्या प्रस्तुत की है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कीट हमेशा सीधे प्रकाश की ओर आकर्षित होकर नहीं उड़ते। वे प्रकाश की दिशा के अनुसार अपने शरीर का संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं। कृत्रिम प्रकाश के आसपास यह व्यवहार उनकी उड़ान को असामान्य बना सकता है। परिणामस्वरूप वे प्रकाश स्रोत के आसपास चक्कर लगाने लगते हैं और कई बार उसमें फंस जाते हैं।

इसका अर्थ है कि दीपक के आसपास कुछ कीटों का इकट्ठा होना और उनमें से कुछ का आग में गिरकर मर जाना संभव है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। कीटों का प्रकाश के आसपास इकट्ठा होना और कीट नियंत्रण होना दो अलग-अलग घटनाएं हैं। हर कीट प्रकाश की ओर आकर्षित नहीं होता। मच्छरों की कई प्रजातियां मनुष्य की गंध, शरीर की गर्मी और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे संकेतों से अपने मेजबान को पहचानती हैं।

इसलिए दीपावली के दीपक को मच्छरों या रोग फैलाने वाले कीटों के प्रभावी नियंत्रण का साधन बताना गलत होगा। इसके अलावा, कीट-पतंगे प्रकृति की खाद्य शृंखला और परागण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अंधाधुंध कृत्रिम रोशनी उनके जीवनचक्र को नुकसान पहुंचा सकती है। इस लिहाज से दीपक जलाने की परंपरा का सांस्कृतिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसे वैज्ञानिक कीट नियंत्रण का प्रमाणित तरीका नहीं माना जा सकता।

दीपावली का प्रकाश और अमावस्या का चयन

दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है। अमावस्या की रात चंद्रमा दिखाई नहीं देता। प्राकृतिक चांदनी का अभाव रहता है। ऐसे समय में मिट्टी के दीपक जलाना अंधकार के बीच प्रकाश फैलाने का सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक माध्यम बनता है।

इसका अर्थ केवल घरों को रोशन करना नहीं है। भारतीय दर्शन में प्रकाश को ज्ञान, चेतना और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दीपावली की विभिन्न धार्मिक व्याख्याएं प्रचलित हैं। हिंदू परंपरा में इसे भगवान राम की अयोध्या वापसी, भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और मां लक्ष्मी की पूजा से जोड़ा जाता है। जैन धर्म में यह भगवान महावीर के निर्वाण से संबंधित है। सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस का विशेष महत्व है।

यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है। दीपावली की तारीख चंद्रमा की गति से निर्धारित होती है। इसलिए इसका आयोजन किसी एक निश्चित अंग्रेजी तारीख पर नहीं होता। यह परंपरा भारतीय समाज के खगोलीय कैलेंडर और मौसमी चक्र से उसके ऐतिहासिक संबंध को भी दर्शाती है।

लक्ष्मी पूजा, नई शुरुआत और कृषि अर्थव्यवस्था का संबंध

दीपावली को समृद्धि का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा होती है। व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों की सफाई करते हैं और नए बही-खाते शुरू करने की परंपरा निभाते हैं। इसके पीछे भारतीय कृषि और व्यापारिक अर्थव्यवस्था का ऐतिहासिक संबंध भी दिखाई देता है।

नेशनल ज्योग्राफिक के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, भारत के शुरुआती कृषि समाजों में दीपावली का समय शीत ऋतु से पहले की फसल और आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण चरण से जुड़ा रहा है। फसल के बाद घरों में अनाज आता था। व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती थीं। नए आर्थिक चक्र की शुरुआत होती थी।

इसी पृष्ठभूमि में धन, अन्न और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा का सांस्कृतिक महत्व समझा जा सकता है। इस दृष्टि से घरों की सफाई, सजावट, नए वस्त्र और सामूहिक उत्सव केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं रह जाते। वे सामाजिक और आर्थिक जीवन को नई ऊर्जा देने वाली गतिविधियां भी बन जाते हैं। हालांकि, दीपावली को केवल कृषि उत्सव कहना भी उचित नहीं होगा। इसके धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप में अनेक परंपराओं का योगदान है।

जब उत्सव स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनने लगा

समय के साथ दीपावली का स्वरूप बदला है। मिट्टी के दीयों के साथ बिजली की झालरें, सजावटी रोशनियां और आतिशबाजी इसका हिस्सा बन गई हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब उत्सव का आनंद पर्यावरण और स्वास्थ्य की कीमत पर हासिल किया जाता है।

पटाखों से निकलने वाला धुआं वायुमंडल में सूक्ष्म कणों और विभिन्न प्रदूषकों की मात्रा बढ़ाता है। इससे सांस संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से श्वसन संबंधी समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए जोखिम अधिक हो सकता है। लेकिन एक कम चर्चित तथ्य पारंपरिक दीपों से भी जुड़ा है।

दिसंबर 2024 में एटमॉस्फेरिक पॉल्यूशन रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित एक भारतीय शोध में तिल के तेल से जलने वाले दीपों सहित विभिन्न पारंपरिक प्रकाश स्रोतों से निकलने वाले कार्बन कणों का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि तिल के तेल के दीपक जलने से भी ब्लैक कार्बन उत्सर्जित हो सकता है। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि दीपावली के दौरान बड़े पैमाने पर तेल के दीप जलाने से उत्सर्जन पर्यावरणीय चिंता का विषय बन सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मिट्टी के दीये जलाना बंद कर देना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि दीप जलाने की परंपरा निभाते समय भी वायु गुणवत्ता और पर्याप्त वेंटिलेशन का ध्यान रखना चाहिए। अत्यधिक धुआं देने वाली बातियों और खराब गुणवत्ता वाले ईंधन से बचना चाहिए।

क्या दीपावली की परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से फिर अपनाने की जरूरत है?

आज दीपावली की तैयारी में बाजार और उपभोग का प्रभाव बढ़ा है। महंगी सजावट, बिजली की रोशनी, उपहारों की प्रतिस्पर्धा और आतिशबाजी ने पर्व के मूल स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। ऐसे में जरूरी है कि हम परंपरा के उपयोगी पक्षों को फिर से पहचानें। घर और आसपास की नियमित सफाई करें। छतों, गमलों, टायरों और बेकार बर्तनों में पानी जमा न होने दें। नालियों और जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त रखें। सीलन और फफूंद की समस्या का समाधान करें। मिट्टी के दीये जलाएं, लेकिन सुरक्षित दूरी और वेंटिलेशन का ध्यान रखें। पटाखों और अत्यधिक धुएं से बचें। अनावश्यक बिजली और संसाधनों की बर्बादी रोकें।

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मानसून संबंधी सलाह में भी जल भंडारण के बर्तनों की नियमित सफाई, कचरे का निस्तारण और पानी जमा होने से रोकने पर जोर दिया गया है। ये उपाय केवल दीपावली के लिए नहीं, बल्कि पूरे वर्ष स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। दीपावली का वास्तविक संदेश केवल अंधकार मिटाना नहीं, जीवन को स्वच्छ बनाना भी है

नोट: इस आलेख में ऐतिहासिक मान्यताओं, वैज्ञानिक शोध और स्वास्थ्य संबंधी तथ्यों को अलग-अलग रखा गया है। विशेष रूप से दीपक से कीट नियंत्रण और प्राचीन परंपराओं के वैज्ञानिक उद्देश्य से जुड़े दावों को प्रमाण से आगे बढ़ाकर प्रस्तुत नहीं किया गया है।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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