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दरभंगा राज परिवार की विरासत : महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी और ऐतिहासिक न्यास

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देश के विकास और संकट की घड़ियों में दरभंगा राज परिवार का योगदान उल्लेखनीय रहा है। मिथिला क्षेत्र में फैला दरभंगा राज लगभग 8380 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थापित था, जिसका मुख्यालय दरभंगा शहर रहा। इसकी स्थापना सोलहवीं सदी की शुरुआत में मैथिल ब्राह्मण जमींदारों ने की थी। समय के साथ यह राज केवल प्रशासनिक शक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का भी केंद्र बना।

दरभंगा राज परिवार को करीब से जानने वाले लोगों के अनुसार 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान यह परिवार सबसे पहले राष्ट्र सेवा के लिए आगे आया। इंद्र भवन मैदान में लगभग 15 मन, यानी करीब 600 किलो सोना तौलकर देश की रक्षा के लिए दान किया गया। इसके साथ ही राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान भी सरकार को सौंप दिए, जो उस समय एक असाधारण कदम माना गया।

आधारभूत ढांचे और शिक्षा में योगदान

दरभंगा राज परिवार ने अपने निजी airport को भी राष्ट्र को समर्पित किया। करीब 90 एकड़ में फैला यह हवाई अड्डा सरकार को दान कर दिया गया, जिस पर आज दरभंगा एयरपोर्ट संचालित हो रहा है। यह निर्णय क्षेत्रीय विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

शिक्षा के क्षेत्र में भी परिवार का योगदान गहरा रहा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए 50 लाख रुपये का दान दिया गया। प्राच्य विद्या के संरक्षण के उद्देश्य से अपने आवासीय परिसर को दान कर संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना कराई गई। यह परिसर आज भी विशिष्ट माना जाता है, क्योंकि यहां एक साथ दो विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं।

विज्ञान और रेल विकास में ऐतिहासिक भूमिका

वैज्ञानिक प्रगति को बढ़ावा देते हुए दरभंगा राज ने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमण को शोध कार्य के लिए बहुमूल्य हीरा प्रदान किया था। यह सहयोग उस दौर में विज्ञान के प्रति राज परिवार की सोच को दर्शाता है।

रेल परिवहन के क्षेत्र में भी दरभंगा राज का योगदान ऐतिहासिक रहा। वर्ष 1874 में दरभंगा राज परिसर में निजी railway line बिछाई गई। वाजितपुर से नरगौना टर्मिनल तक 55 मील लंबा रेलखंड केवल 62 दिनों में तैयार किया गया, जिसने विश्व रिकॉर्ड बनाया। इसके लिए तिरहुत रेलवे कंपनी की स्थापना की गई और मोती महल को उसका मुख्यालय बनाया गया।

रेल नवाचार और ऐतिहासिक यात्राएं

यह rail line मिथिला क्षेत्र के विकास का आधार बनी। इससे व्यापार और रोजगार के अवसर बढ़े और लोगों को मजबूरी में परदेश जाने से राहत मिली। यही वह रेलमार्ग था, जहां देश में पहली बार तीसरे दर्जे के डिब्बों में शौचालय की सुविधा शुरू की गई।

रेलखंड के निर्माण की जिम्मेदारी इंग्लैंड की एक कंपनी को दी गई थी। दूरसंचार के लिए तार बिछाने का ठेका रमेश्वर सिंह, जिन्हें लंगट सिंह के नाम से भी जाना जाता था, को मिला। वर्ष 1883 में भारत के वायसराय ने पहली बार आधिकारिक rail saloon से कोलकाता से दरभंगा की यात्रा की थी। उनका सैलून नरगौना टर्मिनल तक आया, जो अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी।

1934 के भूकंप के बाद गांधी की दरभंगा यात्रा

1934 के भूकंप के बाद महात्मा गांधी की बिहार यात्रा विवादों में घिर गई थी। राज्य के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। ऐसे में दरभंगा जिला प्रशासन ने गांधी को दरभंगा आने से रोक दिया था। जब महाराजा कामेश्वर सिंह को यह जानकारी मिली, तो उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी देकर गांधी को दरभंगा आमंत्रित किया।

गांधी की सुरक्षा की जिम्मेदारी महाराजा ने अपने मैनेजर डेनबी को सौंपी और अपने छोटे भाई को उनकी देखरेख में लगाया। गांधी की ट्रेन को सीधे नरगौना टर्मिनल लाया गया, जहां व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। यही टर्मिनल बाद में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सहित कई बड़े नेताओं और विद्वानों की यात्रा का साक्षी बना।

महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी और राज परंपराएं

महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी दरभंगा राज परिवार की एक विशिष्ट पहचान थीं। परिवार की सदस्य कुमुद सिंह के अनुसार वह देश की अंतिम जीवित महिला थीं, जिन्हें महारानी अधिरानी की उपाधि प्राप्त थी। कामसुंदरी नाम उन्हें दरभंगा राज परिवार की ओर से दिया गया था, जबकि उनका मायके का नाम कल्याणी था।

राज परिवार की परंपरा के अनुसार पहली रानी को लक्ष्मी, दूसरी को प्रिया और तीसरी को कामा नाम दिया जाता था। यह परंपरा सनातन सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी थी, जिसमें चार विवाह तक मान्यता दी गई थी। महारानी कामसुंदरी देवी वर्तमान में महाराजा कामेश्वर सिंह द्वारा प्रदत्त कल्याणी निवास में रह रही थीं।

सादगी और करुणा का जीवन

कल्याणी निवास में उनके मायके पक्ष के लोग उनकी देखभाल करते थे। उनके पोते कुमार कपिलेश्वर सिंह के अनुसार महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी सादगी, सौम्यता, करुणा और गरिमा की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। अपार वैभव और royal legacy के बीच रहते हुए भी उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल और संयमित रहा।

उनका जीवन मौन साधना, त्याग और अनुशासन से परिपूर्ण रहा। उन्होंने राज परंपराओं का पालन करते हुए स्वयं को लोक जीवन से जोड़े रखा। कुमार रत्नेश्वर सिंह और कुमार राजेश्वर सिंह ने कहा कि उनके निधन से ऐसा प्रतीत होता है जैसे एक शांत लेकिन सशक्त चेतना समाज से विदा हो गई हो।

बिहार के सबसे बड़े धार्मिक ट्रस्ट की अंतिम ट्रस्टी

कुमुद सिंह ने बताया कि महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी बिहार के सबसे बड़े धार्मिक trust कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट की अंतिम जीवित ट्रस्टी थीं। वर्तमान में इस ट्रस्ट के पास लगभग एक लाख एकड़ भूमि और करीब दो हजार करोड़ रुपये मूल्य का सोना है।

इस ट्रस्ट के अधीन देश और विदेश में कुल 108 मंदिर हैं। इनमें एक मंदिर पाकिस्तान में भी स्थित है। इन मंदिरों के संचालन के लिए ट्रस्ट की ओर से भूमि दान में दी गई है। इससे पहले ट्रस्ट के दो अन्य ट्रस्टियों का निधन हो चुका है।

दरभंगा राज परिवार की संपत्ति और भविष्य

राज परिवार के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में दरभंगा राज परिवार के पास दस हजार करोड़ रुपये से अधिक की assets हैं। इसमें कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट की संपत्ति के साथ निजी संपत्ति भी शामिल है। परिवार की जमीन देश के कई हिस्सों में फैली हुई है।

महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के बाद अब ट्रस्ट की जिम्मेदारी नए ट्रस्टियों के हाथों में जाएगी, जो इस विशाल संपत्ति की देखरेख करेंगे।

सामाजिक कार्यों में अग्रणी भूमिका

महारानी कामसुंदरी देवी को सामाजिक और परोपकारी कार्यों के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। उन्होंने अपने पति महाराजा कामेश्वर सिंह की स्मृति में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कई कार्य किए गए।

इन प्रयासों से समाज के कमजोर वर्गों को सीधा लाभ मिला। उनके कार्यों में दिखावा नहीं, बल्कि सेवा की भावना प्रमुख रही।

जन्म, विवाह और पारिवारिक पृष्ठभूमि

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में पंडित हंसमणि झा के घर हुआ था। वह अपने माता पिता की चौथी पुत्री थीं। उनका विवाह 5 मई 1943 को हुआ था।

वह महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का पहले ही निधन हो चुका था।

गणमान्य व्यक्तियों ने दी श्रद्धांजलि

महारानी कामसुंदरी देवी के निधन की सूचना मिलते ही कई गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। राज्य सरकार की ओर से उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल और समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी ने शोक व्यक्त किया। जिलाधिकारी कौशल कुमार भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे।

संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर लक्ष्मी निवास पाण्डेय और कुलसचिव प्रोफेसर ब्रजेशपति त्रिपाठी ने भी उन्हें नमन किया। पूर्व कुलपति पंडित रामचन्द्र झा, पंडित शशिनाथ झा, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम डब्ल्यूआईटी के निदेशक प्रोफेसर अजयनाथ झा और पंकज ठाकुर सहित कई विद्वानों और सामाजिक हस्तियों ने उनके योगदान को याद किया।

महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी का जीवन दरभंगा राज की गौरवशाली विरासत, सेवा भावना और मानवीय मूल्यों का प्रतीक बनकर सदैव स्मरणीय रहेगा।

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