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बिहार में वोटर लिस्ट पर सियासी संग्राम: तेजस्वी यादव ने कहा ‘वोटबंदी’,

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बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान को लेकर सियासी घमासान शुरू हो गया है। जहां एक ओर चुनाव आयोग (ECI) ने वोटर लिस्ट को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू की है, वहीं विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इसे दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक वोटरों को निशाना बनाने की साजिश बताया है।

तेजस्वी यादव, आरजेडी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री, ने इसे ‘वोटबंदी’ करार दिया है और आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसका उद्देश्य वंचित वर्गों के वोट काटना और फर्जी वोट जोड़ना है।

 क्या है मामला?

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision – SSR 2025) की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता को 11 विशेष दस्तावेजों में से कोई एक प्रस्तुत कर अपना नाम मतदाता सूची में सुरक्षित कराना होगा।

इसका उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना है। लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि यह प्रक्रिया पारदर्शिता से दूर है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है।

 तेजस्वी यादव का तीखा हमला: ‘यह वोटबंदी है’

तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर तीखे शब्दों में लिखा:

“बिहार में वोटबंदी की गहरी साजिश चल रही है। दलित-पिछड़ा-अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यकों के वोट काटने और फर्जी वोट जोड़ने का खेल शुरू हो गया है। मोदी-नीतीश संविधान और लोकतंत्र को कुचलने पर आमादा हैं। जब मतदाता का मत ही खत्म कर देंगे तो लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाएगा?”

तेजस्वी का कहना है कि राज्य से बाहर काम करने वाले मजदूरों और छात्रों को पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा, जिससे वे मतदाता सूची में अपना नाम पुनः दर्ज न करवा सकें।

 RJD पहुंची सुप्रीम कोर्ट

वोटर लिस्ट की प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग करते हुए राज्यसभा सांसद मनोज झा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी है। आरजेडी की याचिका में कहा गया है कि:

  • बिहार के लाखों लोग दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए रहते हैं।

  • उन्हें सिर्फ 18 दिनों में दस्तावेज जमा कराने को कहा जा रहा है, जो अव्यवहारिक है।

  • आयोग आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेजों को स्वीकार नहीं कर रहा, जिससे आम जनता को मुश्किल हो रही है।

  • यह संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लंघन है, जो वोट देने के अधिकार की गारंटी देता है।

साथ ही, आरजेडी का आरोप है कि चुनाव आयोग एकतरफा और भेदभावपूर्ण कार्रवाई कर रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

11 दस्तावेजों पर विवाद क्यों?

चुनाव आयोग ने केवल 11 विशेष प्रकार के दस्तावेजों को मान्यता दी है। इसमें कुछ जटिल और आम नागरिक के लिए कठिन प्रमाणपत्र भी शामिल हैं, जैसे:

  • जन्म प्रमाण पत्र

  • पासपोर्ट

  • राज्य सरकार द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाण पत्र

  • कर्मचारी पहचान पत्र

  • भूमि आवंटन प्रमाण पत्र

तेजस्वी यादव और विपक्षी दलों का कहना है कि आधार कार्ड, जो देश का सबसे बड़ा पहचान पत्र है, को स्वीकार न करना राजनीतिक चाल है।

 क्या कहता है संविधान?

संविधान का अनुच्छेद 326 कहता है कि सभी नागरिक, जिन्होंने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली है और जिन पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है, उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त है। तेजस्वी का आरोप है कि चुनाव आयोग इस मूल अधिकार को कागजी बाधाओं के माध्यम से सीमित कर रहा है।

उन्होंने कहा,

“आयोग को ये अधिकार किसने दिया कि वो केवल 11 दस्तावेज ही मान्य माने? क्या मताधिकार के लिए अब नागरिक को सरकारी प्रक्रियाओं के चक्कर काटने होंगे?”

 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

सरकार समर्थक दलों ने आरजेडी के आरोपों को बेबुनियाद और भ्रामक करार दिया है। भाजपा प्रवक्ता का कहना है:

“वोटर लिस्ट अपडेट करना एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका पालन पूरे देश में हो रहा है। आरजेडी मुद्दे को भटकाकर राजनीतिक फायदा लेना चाहती है।”

वहीं, सोशल मीडिया पर #Votebandi, #BiharVoterList और #JusticeForVoters जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

 अंतिम तारीख और आगामी चुनावों पर प्रभाव

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि:

  • 25 जुलाई 2025 तक मतदाता अपने दस्तावेज जमा कर सकते हैं।

  • 1 अगस्त 2025 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित की जाएगी।

  • बिहार में विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 के बीच संभावित हैं।

यदि वोटर लिस्ट अपडेट प्रक्रिया में भ्रांतियां या विसंगतियां सामने आती हैं, तो यह आने वाले चुनावों को प्रभावित कर सकती है।

बिहार में वोटर लिस्ट अपडेट को लेकर मचा विवाद सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि यह लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा मसला है। यदि सही नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाते हैं, तो इसका असर न केवल चुनाव परिणामों पर बल्कि जनता के विश्वास पर भी पड़ेगा।

सरकार और चुनाव आयोग दोनों की जिम्मेदारी है कि इस प्रक्रिया को साफ, पारदर्शी और समावेशी बनाएं। मतदाता की आवाज़ को दबाने की किसी भी कोशिश को संविधान के खिलाफ माना जाना चाहिए।

 KKNLive.com पर पढ़ते रहें बिहार की चुनावी राजनीति, मतदाता सूची अपडेट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस की हर अहम खबर — बिना एजेंडा, सिर्फ सच्चाई के साथ।

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