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विधानसभा में उठेगा ग्रामीण पत्रकारों की सुरक्षा और पेंशन का मुद्दा, पारू व लालगंज विधायकों ने दिया भरोसा

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मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी के ‘हमारी आवाज’ कार्यक्रम में पत्रकारों ने सर्वसम्मति से पारित किया मांग-पत्र, ग्रामीण पत्रकारों की मान्यता से लेकर आकस्मिक सहायता कोष की मांग

पत्रकार दूसरों की समस्याओं को खबर बनाकर सत्ता और समाज तक पहुंचाते हैं, लेकिन जब सवाल उनकी अपनी सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक भविष्य का हो तो उनकी आवाज अक्सर बिखरी हुई दिखाई देती है। सरैया में आयोजित ‘हमारी आवाज’ कार्यक्रम में इसी बिखरी आवाज को एक साझा मांग-पत्र में बदलने की कोशिश हुई। मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों से पहुंचे पत्रकारों ने पत्रकार हित से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। चर्चा के बाद तैयार मांग-पत्र को पत्रकारों ने ध्वनि मत से पारित किया। पारू के विधायक शंकर प्रसाद यादव और लालगंज के विधायक संजय कुमार सिंह ने पत्रकारों की मांगों को संबंधित स्तर पर उठाने की पहल का भरोसा दिया।

प्रखंड का पत्रकार सूचना तंत्र की पहली कड़ी है

सरैया के आमंत्रण रिसॉर्ट में आयोजित कार्यक्रम में मुजफ्फरपुर के साथ वैशाली, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी और शिवहर समेत विभिन्न क्षेत्रों से पत्रकार शामिल हुए। कार्यक्रम में यह मुद्दा प्रमुखता से सामने आया कि पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी समाचार-संग्रह का केंद्र मुख्य रूप से जिला और अनुमंडल मुख्यालय हुआ करता था। अब प्रखंड और पंचायत स्तर तक पत्रकारिता का विस्तार हो चुका है। गांव में सड़क टूटी हो, विद्यालय में शिक्षक नहीं हों, अस्पताल में दवा की कमी हो, बाढ़ का पानी घरों में घुसा हो या किसी सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा हो, इन घटनाओं की पहली सूचना अक्सर प्रखंड स्तर का पत्रकार ही सामने लाता है। पारू विधायक शंकर प्रसाद यादव ने इसी भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रखंड स्तर के पत्रकार सूचना तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा और पेंशन से जुड़े मुद्दों को सरकार के समक्ष रखने तथा विधानसभा में भी उठाने की पहल का भरोसा दिया।

पत्रकार सुरक्षा पर आयोग बनाने की मांग

पत्रकारों ने बिहार पत्रकार संरक्षण आयोग गठित करने की मांग की। मांग-पत्र में कहा गया कि पत्रकारों को उनके काम के दौरान सुरक्षा उपलब्ध कराने के साथ उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। यह मांग केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। पत्रकारों ने यह भी सवाल उठाया कि ग्रामीण और प्रखंड स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों को मान्यता की प्रक्रिया में वह स्थान क्यों नहीं मिलना चाहिए, जो जिला और अनुमंडल स्तर के पत्रकारों को मिलता है। ग्रामीण पत्रकारों की मान्यता के लिए मांग-पत्र में मान्यता आवेदन में प्रखंड का अलग कॉलम जोड़ने और वर्तमान कोटा व्यवस्था समाप्त करने की मांग की गई है। बिहार सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की वेबसाइट पर फिलहाल जिला मुख्यालय और अनुमंडल मुख्यालय के प्रेस प्रतिनिधियों की मान्यता के आवेदन प्रपत्र उपलब्ध हैं। इसी के साथ वेब मीडिया के लिए भी अलग नियमावली और सूचीबद्धता संबंधी प्रपत्र मौजूद हैं।

पेंशन पर बहस: 60 साल नहीं, 58 साल की मांग

पत्रकारों की दूसरी बड़ी मांग वरीय पत्रकारों की पेंशन से जुड़ी है। मांग-पत्र में 58 वर्ष की आयु पार कर चुके वरीय पत्रकारों को पत्रकार पेंशन योजना में शामिल करने की मांग रखी गई है। यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब बिहार में पत्रकार सम्मान पेंशन योजना पहले से लागू है। राज्य सरकार की वेबसाइट पर बिहार पत्रकार सम्मान पेंशन नियमावली-2019 के तहत लाभुकों से संबंधित दस्तावेज और पेंशन योजना का आवेदन प्रपत्र उपलब्ध है। वहीं 2026 में संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने विधानसभा में पत्रकार पेंशन की पात्रता से जुड़े सवाल पर कहा था कि 20 वर्ष की सेवा की शर्त लागू है। 2025 में बिहार सरकार ने पत्रकार सम्मान पेंशन की राशि बढ़ाकर ₹15,000 प्रतिमाह करने की घोषणा की थी। साथ ही पात्र पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद उनके आश्रित जीवनसाथी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह की पेंशन का प्रावधान घोषित किया गया था। अब बहस सिर्फ पेंशन की राशि की नहीं है। बहस यह है कि लंबे समय तक पत्रकारिता करने वाले किन पत्रकारों को इस सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए और पात्रता की प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक हो।

प्रेस क्लब सिर्फ भवन नहीं, संवाद का केंद्र बने

पत्रकारों ने मांग की कि सरकारी लोक कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी पत्रकारों तक पहुंचाने के लिए प्रेस क्लबों का नियमित संचालन सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही प्रत्येक जिले के प्रेस क्लब में जिला प्रशासन की ओर से मासिक पत्रकार गोष्ठी आयोजित करने की मांग रखी गई। इसका उद्देश्य पत्रकार और प्रशासन के बीच नियमित संवाद स्थापित करना है। अगर किसी जिले में प्रशासन की योजनाओं, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि या रोजगार कार्यक्रमों से संबंधित नियमित ब्रीफिंग हो, तो उसका लाभ सिर्फ पत्रकारों को नहीं बल्कि आम जनता को भी मिल सकता है। प्रेस क्लब को केवल पत्रकारों के बैठने की जगह के बजाय सूचना और जनसंवाद के संस्थान के रूप में विकसित करने की मांग सामने आई है।

अचानक संकट में आये पत्रकारों के लिए सहायता कोष की मांग

पत्रकारों ने आकस्मिक परिस्थितियों में आर्थिक सहायता के लिए पत्रकार आकस्मिक सहायता कोष गठित करने की मांग भी की। यह मांग पत्रकारों के सामाजिक सुरक्षा से जुड़े उस पहलू को सामने लाती है, जिसमें बीमारी, दुर्घटना या अन्य आकस्मिक परिस्थितियों में तत्काल आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ सकती है। कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि ग्रामीण पत्रकारों की आर्थिक स्थिति, संस्थागत सुरक्षा और मान्यता को अलग-अलग मुद्दों की तरह देखने के बजाय एक व्यापक पत्रकार कल्याण नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

लालगंज विधायक ने भी पहल का भरोसा दिया

लालगंज विधायक संजय कुमार सिंह ने पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर आवश्यक पहल का भरोसा दिया। कार्यक्रम में जन प्रतिनिधियों के समक्ष पत्रकारों ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण पत्रकारिता में काम करने वाले लोगों के सामने चुनौतियां अलग प्रकृति की हैं। उन्हें एक तरफ सीमित संसाधनों में खबर जुटानी होती है, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली समूहों और प्रशासनिक तंत्र के बीच काम करना पड़ता है। ऐसे में सुरक्षा और संस्थागत पहचान का सवाल केवल पत्रकार का व्यक्तिगत सवाल नहीं रह जाता। यह स्थानीय लोकतंत्र में सूचना की स्वतंत्रता से भी जुड़ जाता है।

मांग-पत्र में क्या-क्या शामिल है?

पत्रकारों की ओर से पारित मांग-पत्र में प्रमुख रूप से ये मांगें शामिल हैं— बिहार पत्रकार संरक्षण आयोग का गठन। ग्रामीण और प्रखंड स्तर के पत्रकारों को मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा। मान्यता आवेदन में प्रखंड का अलग कॉलम। मान्यता की कोटा व्यवस्था समाप्त करना। 58 वर्ष से अधिक आयु के वरीय पत्रकारों को पत्रकार पेंशन योजना के दायरे में लाना। प्रेस क्लबों का नियमित संचालन। प्रत्येक जिले में मासिक पत्रकार गोष्ठी और पत्रकार आकस्मिक सहायता कोष का गठन।

मांग-पत्र से विधानसभा तक रास्ता कितना लंबा है?

सरैया का यह कार्यक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां पत्रकारों की अलग-अलग समस्याओं को एक साझा मांग-पत्र में रखने की कोशिश हुई है। लेकिन किसी भी मांग-पत्र की असली परीक्षा उसके पारित होने में नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होती है। क्या ग्रामीण पत्रकारों की मान्यता के नियम में बदलाव होगा? क्या सुरक्षा के लिए कोई संस्थागत तंत्र बनेगा? क्या पेंशन की पात्रता को लेकर 58 वर्ष की मांग पर सरकार विचार करेगी? क्या प्रेस क्लब नियमित संवाद के केंद्र बनेंगे और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पत्रकारों के लिए आकस्मिक सहायता की कोई स्थायी व्यवस्था बनेगी? इन सवालों के जवाब अब जन प्रतिनिधियों और सरकार की अगली कार्रवाई से मिलेंगे। मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी के कार्यक्रम ने कम-से-कम एक बात स्पष्ट कर दी है—ग्रामीण पत्रकार अब अपनी समस्याओं को अलग-अलग आवाजों में नहीं, साझा मांग के रूप में विधानसभा तक पहुंचाना चाहते हैं।

कौन-कौन रहे मौजूद

कार्यक्रम की अध्यक्षता मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी के मुजफ्फरपुर जिला अध्यक्ष रंजन कुमार ने की। संचालन वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र तिवारी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन कृत्यानंद सिंह ने किया। कार्यक्रम में जिला पार्षद विपिन शाही, मुखिया प्रतिनिधि चिदानंद द्विवेदी, जिला पार्षद प्रतिनिधि मुन्ना राइन, कार्यालय प्रभारी सुमित कुमार, वैशाली जिला अध्यक्ष प्रभात कुमार, मोतिहारी जिला अध्यक्ष नरेंद्र कुमार सिंह समेत अन्य जन प्रतिनिधि मौजूद रहे।

इसके अतिरिक्त मीडिया की ओर से नवेंदु कुमार, पप्पू कुमार सिंह, राजा कुमार शाह, सितेश कुमार, शैलेंद्र कुमार, नवीन कुमार, समरजीत कुमार, ललन सिंह, रामकिंकर मिश्रा, अजीत कुमार, रोहन तिवारी, मुकेश कुमार सिंह, सत्येंद्र कुमार सिंह, विश्वनाथ चौधरी, राहुल कुमार, विनोद कुमार, सुनील कुमार मुस्लिम, निखिल, नियाज आलम, शिवेश झा, मृत्युंजय पांडे, पंकज, राकेश, मनोज कुमार राय, शशि भूषण सिंह, मुन्ना कुमार, राजेश कुमार, शिवनाथ कुमार साहनी, रजनीश कुमार, बृजेश कुमार, जाहिर वारसी, प्रशांत कुमार क्रांतिकारी, मोहन कुमार, सुधांशु, अनिरुद्ध राजा, कृति, आनंद कुमार, नवनीत कुमार, महुआ से मुन्ना कुमार, बालेंद्र शाह, राकेश कुमार, रोहित रंजन, संतोष कुमार, नागमणि, नीलमणि और संतोष कुमार सहित बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित रहे।

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