सम्राट सरकार को समर्थन से बिहार में बदलेगा सियासी समीकरण?
बिहार विधान परिषद के चुनाव में जिन दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने एनडीए के घटक दल जदयू को शिकस्त दी थी, चुनाव परिणाम के महज तीन दिन बाद उनका राजनीतिक रुख चर्चा का विषय बन गया है। तिरहुत स्नातक से बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक सीट से डॉ. राहुल राज अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के समर्थन में खड़े हैं। दोनों ने शनिवार, 31 अक्टूबर को पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में पार्टी के विधानमंडल दल की बैठक में हिस्सा लिया।
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भाजपा कार्यालय में क्या हुआ, कैसे बदला रुख?
शनिवार को बिहार भाजपा के नए प्रभारी हरीश द्विवेदी के पटना आगमन पर प्रदेश कार्यालय में संगठनात्मक बैठक हुई। इसमें प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी सहित पार्टी के वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी मौजूद थे। इसी बैठक में निर्दलीय विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज भी पहुंचे।
इसके बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में भाजपा विधानमंडल दल की बैठक हुई। दोनों निर्दलीय एमएलसी ने इसमें भी हिस्सा लिया और सदन के भीतर भाजपा तथा सरकार का समर्थन करने की बात कही। राहुल राज ने इससे पहले मुख्यमंत्री के आवास पर उनसे मुलाकात की थी। इस मुलाकात में सारण के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी भी मौजूद थे। बंशीधर ब्रजवासी भी चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री से मुलाकात कर चुके थे।
बंशीधर ब्रजवासी अब भाजपा के साथ
बंशीधर ब्रजवासी की राजनीतिक पहचान शिक्षक आंदोलन और स्थानीय मुद्दों से जुड़ी रही है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में उन्होंने 2023 के उपचुनाव में जदयू के अभिषेक झा को हराकर विधान परिषद में प्रवेश किया था। 2026 के चुनाव में भी मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच रहा और बंशीधर ब्रजवासी ने अपनी सीट बरकरार रखी। इस जीत के बाद उनका भाजपा के साथ खड़ा होना महत्वपूर्ण है। चुनाव में उन्होंने जदयू प्रत्याशी को हराया, लेकिन अब सदन में सम्राट सरकार का समर्थन कर रहे हैं।
राहुल राज अब सरकार के समर्थन में
राहुल राज का मामला और भी दिलचस्प है। वे भाजपा के प्रदेश स्तर के पदाधिकारी रह चुके हैं। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसके बाद भाजपा ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। चुनाव में उन्होंने एनडीए समर्थित जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर को हराया।
अब वही राहुल राज भाजपा कार्यालय की बैठक में शामिल हुए और सम्राट सरकार को समर्थन देने की घोषणा की। यह भाजपा के लिए संगठनात्मक दृष्टि से भी अहम है, क्योंकि पार्टी से निष्कासित एक पूर्व पदाधिकारी चुनाव जीतकर फिर उसके राजनीतिक खेमे के करीब आया है।
भाजपा को क्या फायदा, जदयू के लिए क्या संदेश?
बिहार विधान परिषद में कुल 75 सदस्य हैं। हालिया चुनाव में भाजपा ने 8 सीटों में से 3 पर जीत दर्ज की, जबकि जदयू को केवल 1 सीट मिली। ऐसे में दो निर्दलीय सदस्यों का सरकार के समर्थन में आना भाजपा और एनडीए के लिए सदन में अतिरिक्त राजनीतिक सहारा है। सरकार को विधायी कामकाज, प्रस्तावों और सदन के भीतर बहस के दौरान इसका लाभ मिल सकता है।
जदयू के भीतर असहजता
तिरहुत स्नातक चुनाव में अभिषेक झा की हार के बाद जदयू के कुछ नेताओं ने भाजपा कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए थे। सीतामढ़ी के जदयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने भी चुनावी नतीजे को लेकर भाजपा नेताओं पर निशाना साधा था। उनके बयान को एनडीए के भीतर असंतोष के संकेत के रूप में देखा गया।
अब दोनों निर्दलीय एमएलसी का भाजपा और सरकार के समर्थन में आना इस असहजता को बढ़ा सकता है। हालांकि, यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि इससे भाजपा और जदयू के बीच कोई औपचारिक टकराव पैदा हो गया है।
क्या यह केवल समर्थन है या नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत?
इस घटनाक्रम को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, भाजपा को विधान परिषद में दो अतिरिक्त समर्थक मिले हैं। दूसरा, राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने चुनावी पहचान को बरकरार रखते हुए सरकार के साथ काम करने का रास्ता चुना है। तीसरा, जदयू के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है।
बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम चुनावी जीत और सत्ता के समीकरणों के बीच के अंतर को उजागर करता है। बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने जदयू उम्मीदवारों को हराकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई और अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के समर्थन में खड़े हैं। भाजपा के लिए यह सदन में अतिरिक्त सहारा है, जबकि जदयू के लिए सहयोगी राजनीति की एक नई चुनौती।
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