Home Economy मीनापुर में भूमि सर्वेक्षण: जमीन आपकी, लेकिन रिकॉर्ड में किसका नाम?

मीनापुर में भूमि सर्वेक्षण: जमीन आपकी, लेकिन रिकॉर्ड में किसका नाम?

पुराने खतियान, बदली हुई चौहद्दी और अधूरे उत्तराधिकार के बीच रैयतों के सामने नई परीक्षा; सरकारी रिकॉर्ड खुद बता रहे हैं कि सर्वेक्षण में आपत्ति और सुधार के कई दरवाजे खुले हैं।

एक खेत, दो दावे और तीसरा सरकारी रिकॉर्ड

KKN ब्यूरो। जमीन का विवाद अक्सर खेत की मेड़ से शुरू होता है। लेकिन उसका अंत अदालत की चौखट पर होता है। मीनापुर में चल रहा विशेष भूमि सर्वेक्षण इसी पुराने विवाद को एक नए मुकाम पर ले जा रहा है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जमीन पर कौन खेती कर रहा है। सवाल यह भी है कि सरकारी रिकॉर्ड में जमीन किसके नाम है, नक्शे में उसकी सीमा कहां है और दस्तावेज उस दावे की कितनी तस्दीक करते हैं। मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन के मुताबिक जिले में कुल 1,827 राजस्व गांव हैं। इनमें 106 नगर निकाय क्षेत्र के गांवों को छोड़कर 1,721 राजस्व गांवों में विशेष सर्वेक्षण की घोषणा की जा चुकी है। सभी 16 अंचलों में विशेष सर्वेक्षण के लिए शिविर कार्यालय भी स्थापित किए गए हैं। मीनापुर भी इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। जिला प्रशासन ने मीनापुर के लिए विशेष सर्वेक्षण शिविर पदाधिकारी के रूप में विनीता कुमारी का नाम और संपर्क संख्या प्रकाशित की है। यानी यह कोई प्रस्तावित योजना नहीं है। सर्वेक्षण की प्रक्रिया जमीन पर चल रही है और इसके साथ रैयतों के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा है— जो जमीन पीढ़ियों से आपकी है, क्या उसका सरकारी रिकॉर्ड भी उतना ही साफ है?

सरकार ने खुद रैयतों को क्यों चेताया?

इस कहानी का सबसे अहम दस्तावेज कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की आधिकारिक गाइडलाइन है। प्रशासन रैयतों से कहता है कि वे अपनी जमीन की मेड़ ठीक कर लें। भूमि की चौहद्दी स्वयं देख लें। स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों को यथासंभव अद्यतन कर लें और खेसरा संख्या के साथ जानकारी जमा करें। शावली भी निर्धारित प्रपत्र में देने को कहा गया है। अब सवाल उठता है— अगर सब कुछ पहले से साफ है तो प्रशासन को इतनी सावधानियां बताने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब भूमि रिकॉर्ड की प्रकृति में छिपा है। जमीन स्थिर रहती है, लेकिन उसके मालिक बदलते रहते हैं। दादा से पिता। पिता से बेटे। बंटवारे से अलग-अलग हिस्से। खरीद-बिक्री से नए मालिक। मृत्यु के बाद उत्तराधिकार। कभी-कभी बिना अद्यतन जमाबंदी के वर्षों तक चलता कब्जा। इस पूरी प्रक्रिया में जमीन की वास्तविक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड के बीच अंतर पैदा होना असंभव नहीं है। विशेष सर्वेक्षण उसी अंतर को पकड़ने की कोशिश है।

खतियान पुराना, मालिक नया—सबसे बड़ा पेच यहीं

मान लीजिए किसी गांव में जमीन के पुराने खतियान में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज है। वह व्यक्ति अब जीवित नहीं है। उसके बेटे-बेटियों ने जमीन बांट ली। फिर अगली पीढ़ी ने भी हिस्सा बांट लिया। किसी ने जमीन बेच दी। किसी ने कब्जा बनाए रखा। लेकिन रिकॉर्ड में आज भी वही पुराना नाम दिखाई देता है। अब विशेष सर्वेक्षण के दौरान प्रशासन को केवल जमीन की भौतिक स्थिति नहीं देखनी है। उसे यह भी समझना है कि वर्तमान अधिकार किस आधार पर खड़ा है। इसीलिए प्रशासन रैयतों से स्वामित्व संबंधी दस्तावेज और वंशावली मांग रहा है। यहां एक छोटी-सी चूक भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वंशावली में किसी उत्तराधिकारी का नाम छूट गया। बंटवारे का दस्तावेज सामने नहीं आया। पुरानी बिक्री का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं हुआ या जमीन की वास्तविक चौहद्दी और नक्शे में अंतर रह गया। आज की छोटी विसंगति कल का बड़ा मुकदमा बन सकती है।

नक्शे में कुछ फीट का फर्क, विवाद में कई साल

भूमि सर्वेक्षण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ खतियान नहीं है। नक्शा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिला प्रशासन रैयतों को स्पष्ट निर्देश देता है कि प्रपत्र-7 यानी खानापूरी पर्चा और LPM यानी Land Parcel Map मिलने के बाद उसकी बारीकी से जांच करें। गलती मिलने पर प्रपत्र-8 में आपत्ति दर्ज की जा सकती है। यह व्यवस्था मामूली नहीं है। क्योंकि जमीन की पहचान केवल उसके नाम से नहीं होती। उसकी पहचान उसके खेसरा, रकबा, चौहद्दी और नक्शे से भी होती है। मान लीजिए रिकॉर्ड में एक एकड़ जमीन दर्ज है। लेकिन नक्शे में सीमा दूसरी जगह चली गई या पड़ोसी की जमीन के साथ सीमा बदल गई या वास्तविक कब्जे और सर्वेक्षण मानचित्र में अंतर आ गया। तब विवाद सिर्फ कागज का नहीं रहेगा। वह जमीन पर दिखाई देने लगेगा।

भूमि सर्वेक्षण में ‘आपत्ति’ कोई कमजोरी नहीं, सुरक्षा कवच है

विशेष सर्वेक्षण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने रैयत को रिकॉर्ड देखने और आपत्ति करने का अधिकार दिया है। बिहार के भू-अभिलेख एवं परिमाप निदेशालय की ऑनलाइन सेवाओं में भी विशेष सर्वेक्षण की स्थिति देखने, खानापूरी पर्चा और खेसरावार मानचित्र देखने तथा खानापूरी पर्चा के खिलाफ दावा-आपत्ति देने की व्यवस्था उपलब्ध है। प्रारूप अधिकार अभिलेख के खिलाफ भी आपत्ति दर्ज करने की सुविधा दी गई है। मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन के अनुसार— प्रपत्र-7/LPM में गलती → प्रपत्र-8 प्रारूप अधिकार अभिलेख में आपत्ति → प्रपत्र-14 अंतिम अधिकार अभिलेख यानी प्रपत्र-20 से असहमति → प्रपत्र-21 के जरिए आपत्ति की व्यवस्था है। इसलिए रैयत के लिए सबसे बड़ा खतरा सर्वेक्षण नहीं है। सबसे बड़ा खतरा है—सर्वेक्षण के दौरान अपने रिकॉर्ड को देखे बिना चुप रह जाना।

क्या सर्वेक्षण से भूमाफिया को मौका मिल सकता है?

यह सवाल सबसे संवेदनशील है। बिहार में जमीन का बाजार हमेशा सिर्फ कृषि और आवास की जरूरत तक सीमित नहीं रहा। जमीन की कीमत बढ़ने के साथ विवादों का आर्थिक महत्व भी बढ़ता है। ऐसे में विशेष सर्वेक्षण के दौरान जिन जमीनों के रिकॉर्ड पुराने हैं, जिनकी जमाबंदी अद्यतन नहीं है या जिनके उत्तराधिकार स्पष्ट नहीं हैं, वे स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील हो सकती हैं। किसी रिकॉर्ड में विसंगति मिलना भूमाफिया की मौजूदगी का प्रमाण नहीं है। भूमाफिया का आरोप तभी लगाया जाना चाहिए, जब दस्तावेजी फर्जीवाड़े, अवैध कब्जे, दबाव, आपराधिक मामले, प्रशासनिक जांच या न्यायिक रिकॉर्ड से उसका आधार मिले। यह देखना होगा कि— कितने मामले विवादित हैं? कितने दावे आपत्ति में पहुंचे? कितने रिकॉर्ड में संशोधन हुआ और— क्या किसी मामले में संगठित तरीके से जमीन हड़पने या रिकॉर्ड प्रभावित करने का प्रमाण मिला?

सरकार के पास इसका जवाब खोजने का डिजिटल रास्ता मौजूद है

यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है। बिहार के विशेष सर्वेक्षण पोर्टल पर गांववार सर्वेक्षण की स्थिति देखने की व्यवस्था है। इसमें उद्घोषणा, स्वघोषणा/वंशावली, खतियानी विवरणी, खेसरा पंजी, खानापूरी पर्चा वितरण, LPM वितरण, प्राप्त दावा-आपत्ति, प्रारूप प्रकाशन और अंतिम प्रकाशन जैसे चरण दर्ज किए जाते हैं। अर्थात अब सवाल सिर्फ अनुमान का नहीं है। डेटा उपलब्ध कराया गया है। जरूरत सिर्फ उसे गांववार पढ़ने की है।

मीनापुर के लिए अब जरूरी है ‘गांववार एक्स-रे’

मीनापुर में कितने राजस्व गांव सर्वेक्षण की प्रक्रिया में हैं? किस गांव में स्वघोषणा पूरी हुई? कहां खानापूरी पर्चा बांटा गया? कहां LPM तैयार हुआ? कहां सबसे ज्यादा आपत्तियां आईं? कहां प्रारूप प्रकाशन हो चुका है और सबसे अहम— किन गांवों में रिकॉर्ड अंतिम प्रकाशन तक पहुंच चुका है? इन सवालों का जवाब सिर्फ एक सामान्य खबर है। यदि गांववार आंकड़े निकाले जाएं, तो मीनापुर की भूमि व्यवस्था का एक अद्भुत डेटा-मैप तैयार हो सकता है। तब पता चलेगा कि विवाद बिखरे हुए हैं या किसी खास इलाके में केंद्रित हैं।

मीनापुर में जमीन के रिकॉर्ड पर प्रशासन की नजर भी है

मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की वेबसाइट पर मीनापुर के लिए जमीन की खरीद-बिक्री से संबंधित प्रतिबंध सूची भी उपलब्ध है। जिला प्रशासन की भूमि निबंधन व्यवस्था में मीनापुर को अलग अंचल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसका मतलब यह है कि भूमि संबंधी प्रशासनिक निगरानी केवल सर्वेक्षण तक सीमित नहीं है। भूमि निबंधन। राजस्व रिकॉर्ड। विशेष सर्वेक्षण। नक्शा। दावा-आपत्ति। इन सभी को जोड़कर ही किसी इलाके की जमीन की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

सबसे बड़ा खतरा अशिक्षा नहीं, रिकॉर्ड से दूरी है

मीनापुर के ग्रामीण समाज में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं है। यह परिवार की सामाजिक हैसियत है। आर्थिक सुरक्षा है। अगली पीढ़ी का सहारा है। कई परिवारों के लिए जमीन ही उनकी पूरी पूंजी है। इसलिए भूमि सर्वेक्षण में एक गलती का असर किसी सरकारी फाइल तक सीमित नहीं रहेगा। वह परिवार के भविष्य तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि प्रशासन स्वयं रैयतों को कह रहा है कि वे अपनी जमीन की भौतिक स्थिति देखें, चौहद्दी की जानकारी रखें, दस्तावेज अपडेट करें और खानापूरी पर्चा तथा LPM को ध्यान से जांचें।

पड़ताल: असली सवाल अब शुरू होता है

मीनापुर में भूमि सर्वेक्षण को लेकर अभी सबसे जिम्मेदार निष्कर्ष यही है कि सरकार ने प्रक्रिया के लिए विस्तृत व्यवस्था बनाई है और रैयतों को कई स्तर पर अपने रिकॉर्ड की जांच तथा आपत्ति का अधिकार दिया है। लेकिन व्यवस्था होना और उसका जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन—दो अलग बातें हैं। सवाल है— “मीनापुर में भूमि सर्वेक्षण के दौरान कितनी आपत्तियां आईं और कितने रिकॉर्ड बदले?” इसके लिए गांववार सर्वेक्षण स्थिति, दावा-आपत्ति के आंकड़े, अंतिम प्रकाशन, भूमि निबंधन रिकॉर्ड और जहां जरूरत हो वहां न्यायालयीन मामलों को मिलाना होगा।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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