क्या बाढ़ आने के बाद नाव भेज देना, राहत शिविर खोल देना और कुछ दिनों का राशन बांट देना ही बाढ़ से लड़ने की नीति है? क्या जिस किसान की महीनों की मेहनत पानी में डूब गई, उसके हाथ में कुछ हजार रुपये पहुंच जाने से उसकी अगली फसल लौट आती है? क्या जिस परिवार का घर हर साल पानी में घिरता है, उसके बच्चों की पढ़ाई, पशुओं का चारा, रोजी-रोटी और भविष्य भी किसी राहत पैकेट में बांधा जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल—अगर बिहार को मालूम है कि बाढ़ हर साल आएगी, तो फिर हर साल वही तबाही क्यों आती है?
बाढ़, राहत और बिहार की वह पीड़ा जो हर साल लौटती है
KKN ब्यूरो। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण कर रहे हैं। सरकार राहत और बचाव अभियान में जुटी है। नदियां उफान पर हैं, नावें चल रही हैं, राहत शिविर बनाए जा रहे हैं और प्रशासन को लगातार सतर्क रहने के निर्देश दिए जा रहे हैं। मौजूदा संकट में यह सब जरूरी है। लेकिन असली कहानी इन तस्वीरों के पीछे छिपी है—उन लोगों की, जिनके लिए बाढ़ कोई आपदा नहीं, बल्कि जिंदगी का सालाना कैलेंडर बन चुका है। जब घर में पानी आता है तो सिर्फ घर नहीं डूबता। भागलपुर के मदरौनी गांव की तस्वीर इस सवाल को और गहरा कर देती है। रिपोर्टों के मुताबिक, कोसी की बाढ़ में यहां करीब 1,500 घर पानी में डूब गए। कई परिवारों को घर की छतों और रेलवे ट्रैक के आसपास शरण लेनी पड़ी। सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि स्थानीय लोगों के मुताबिक, जिस रिंग बांध के टूटने से यह इलाका लंबे समय से संकट झेल रहा है, उसकी स्थायी मरम्मत अब तक नहीं हो सकी। कल्पना कीजिए उस घर की, जिसकी दीवारों पर बच्चों की ऊंचाई नापने के निशान हैं। जिस आंगन में सुबह चूल्हा जलता था, वहीं अब पानी है। जिस कमरे में अनाज रखा था, वहां गंदला पानी है। जिस खलिहान में पशुओं के लिए भूसा था, वहां नाव बांधनी पड़ रही है और जिस किसान को कुछ दिन पहले तक अपनी फसल के दाम की चिंता थी, अब उसे इस बात की चिंता है कि उसका पशु जिंदा रहेगा या नहीं। बाढ़ सिर्फ मकान नहीं डुबोती। वह परिवार की आर्थिक रीढ़ को डुबो देती है।
राहत पहुंचती है, लेकिन जिंदगी कहां लौटती है?
सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने से पहले यह स्वीकार करना जरूरी है कि संकट के समय राहत और बचाव अभियान जीवन बचाने का सबसे पहला जरिया है। इस समय बिहार में NDRF और SDRF की 33 टीमें तैनात हैं और करीब 700 सरकारी नावों के जरिए लोगों की आवाजाही और निकासी का काम किया जा रहा है। कई जगह राहत शिविर और सामुदायिक रसोई भी चल रही हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल फिर भी खड़ा रहता है— राहत कितने दिन की होती है और बाढ़ का असर कितने महीने का? एक नाव किसी परिवार को डूबते घर से निकाल सकती है। एक राहत पैकेट दो दिन का भोजन दे सकता है। एक आर्थिक सहायता तत्काल नुकसान का कुछ हिस्सा संभाल सकती है। लेकिन— डूबी हुई फसल कौन लौटाएगा? मरी हुई गाय-भैंस का नुकसान कौन भरेगा? टूटे हुए घर की मरम्मत कौन कराएगा? बच्चों की छूटी हुई पढ़ाई कौन लौटाएगा? महीनों तक बंद रहने वाले छोटे कारोबार का नुकसान कौन भरेगा और सबसे महत्वपूर्ण—अगले साल उसी परिवार को फिर उसी पानी में खड़े होने से कौन बचाएगा? यहीं राहत और नीति के बीच की दूरी दिखाई देती है।
क्या नीति का लक्ष्य बाढ़ को रोकना है?
यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि बिहार के पास बाढ़ प्रबंधन की कोई नीति नहीं है। राज्य में Irrigation, Flood Management and Drainage Rules, 2003 हैं, जिन्हें बाद के वर्षों में संशोधित किया गया। आपदा प्रबंधन विभाग के पास बाढ़ से पहले, दौरान और बाद की कार्रवाई के लिए SOP भी मौजूद हैं। बिहार के पास बाढ़ जोखिम का आकलन करने के लिए Flood Hazard Atlas भी है। समस्या शायद नीति के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उसकी दिशा और क्रियान्वयन की है। दशकों से बिहार की बाढ़ नीति का बड़ा हिस्सा तटबंध, बैराज, जलनिकासी और दूसरे संरचनात्मक उपायों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। शोध में भी यह बात सामने आई है कि राज्य का बाढ़ प्रबंधन मुख्यतः structural measures पर निर्भर रहा है। लेकिन नदी को सिर्फ तटबंध से नहीं समझा जा सकता। नदी का अपना रास्ता है। उसका अपना sediment है। उसका अपना floodplain है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र से आने वाली नदियों का अपना विशाल catchment है। बिहार उस पानी के अंतिम हिस्से में खड़ा राज्य है। यानी बिहार की बाढ़ को सिर्फ बिहार के भीतर बैठकर नियंत्रित करने की कोशिश शायद पर्याप्त नहीं हो सकती।
हवाई सर्वेक्षण जरूरी है, लेकिन जमीन की आंखें ज्यादा जरूरी हैं
मुख्यमंत्री का हवाई सर्वेक्षण प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ऊपर से देखने पर यह समझ आता है कि पानी कहां फैला है, कौन-सा इलाका कट गया है और किस क्षेत्र में तत्काल राहत की जरूरत है। लेकिन हेलीकॉप्टर से दिखाई देने वाला बिहार और नाव पर बैठकर दिखाई देने वाला बिहार अलग-अलग है। ऊपर से खेत पानी का एक बड़ा विस्तार दिखाई देता है। नीचे से वही खेत किसी किसान की पूरी साल की कमाई होता है। ऊपर से एक गांव जलमग्न दिखाई देता है। नीचे उसी गांव में कोई मां अपने बच्चों को लेकर छत पर बैठी होती है। ऊपर से नदी की चौड़ाई दिखाई देती है। नीचे किसी पशुपालक की जिंदगी का आखिरी चारा पानी में तैर रहा होता है। इसलिए बिहार को एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें हवाई सर्वेक्षण के साथ-साथ गांव-स्तर का सामाजिक नुकसान सर्वेक्षण भी अनिवार्य हो। कितने घर? कितने पशु? कितनी फसल? कितने स्कूल? कितने बच्चे? कितने दिन रोजगार बंद? कितने परिवार विस्थापित? कितने लोग हर साल बाढ़ के कारण अपना गांव छोड़कर बाहर जाते हैं? जब तक इन सवालों के आंकड़े नहीं होंगे, तब तक बाढ़ का वास्तविक नुकसान सरकारी फाइलों में अधूरा ही रहेगा।
बाढ़ से लड़ना है तो राहत से आगे बढ़ना होगा
बिहार को अब ऐसी दीर्घकालिक नीति की जरूरत है जिसमें पांच चीजें एक साथ हों। पहली—नदी के पूरे basin का प्रबंधन। सिर्फ राज्य की सीमा के भीतर पानी आने के बाद प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि नेपाल और पड़ोसी राज्यों के साथ वास्तविक-time जल और वर्षा सूचना साझा करने की मजबूत व्यवस्था। दूसरी—तटबंधों का वैज्ञानिक ऑडिट। सिर्फ निर्माण नहीं, बल्कि हर वर्ष उनकी structural health, seepage, erosion और vulnerability की स्वतंत्र जांच। तीसरी—फ्लडप्लेन की वैज्ञानिक योजना। जहां बार-बार पानी आता है, वहां उसी तरह के आवास, सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य ढांचे की योजना बनाई जाए। चौथी—बाढ़ से प्रभावित परिवारों को सिर्फ राहत नहीं, resilience दी जाए। ऊंचे प्लेटफॉर्म, सुरक्षित पशु आश्रय, नाव आधारित स्वास्थ्य सेवाएं, बाढ़रोधी स्कूल और सुरक्षित पेयजल जैसी सुविधाएं स्थायी रूप से विकसित हों। पांचवीं—राहत के बाद की जिंदगी पर ध्यान। फसल, पशुधन, मकान, रोजगार और बच्चों की शिक्षा के नुकसान का अलग-अलग आकलन हो और पुनर्वास को राहत से अलग नीति माना जाए।
आखिर बाढ़ कब तक लोगों की नियति रहेगी?
पानी उतर जाएगा। नावें वापस चली जाएंगी। राहत शिविर धीरे-धीरे खाली होंगे। सड़कें फिर दिखाई देने लगेंगी। बाजार खुल जाएंगे और कुछ सप्ताह बाद बाढ़ की तस्वीरें अखबारों के पुराने पन्नों में चली जाएंगी। लेकिन मदरौनी जैसे गांवों में शायद कहानी वहीं खत्म नहीं होगी। जिस घर की दीवार पानी ने कमजोर की है, वह अगली बारिश तक शायद खड़ी रहे। जिस किसान की फसल गई है, उसे अगली फसल के लिए फिर कर्ज लेना पड़ेगा। जिस बच्चे की पढ़ाई छूटी है, उसका पाठ्यक्रम शायद आगे बढ़ जाएगा, लेकिन उसकी जिंदगी पीछे रह जाएगी और जिस परिवार ने इस साल पानी को अपनी चौखट पर देखा है, वह अगले साल फिर आसमान की तरफ देखेगा। तब सवाल यह नहीं होगा कि सरकार ने कितनी नावें भेजीं। सवाल यह होगा— क्या बिहार ने पिछले एक साल में ऐसा कुछ बनाया था, जिससे इस परिवार को फिर नाव पर चढ़ने की जरूरत न पड़े? यही असली परीक्षा है। क्योंकि बाढ़ से बचा लेना राहत है, लेकिन बाढ़ के डर से मुक्त कर देना नीति और बिहार को अब हर साल राहत पाने वाला राज्य नहीं, हर साल बाढ़ के बावजूद सुरक्षित रहने वाला राज्य बनने की जरूरत है।
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