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ध्वनि प्रदूषण: जुलूस आगे बढ़ता रहा… लेकिन, कानों में पड़ने वाला शोर वहीं रह गया

डीजे की धुन पर नाचते बच्चों को देखकर भीड़ तालियां बजाती है। किसी को यह अंदाजा नहीं होता कि उसी वक्त उनके कानों के भीतर मौजूद बेहद नाजुक श्रवण कोशिकाएं कितनी बड़ी परीक्षा से गुजर रही हैं। सवाल सिर्फ कानों का नहीं—नींद, तनाव, रक्तचाप, एकाग्रता और लंबे समय में हृदय स्वास्थ्य तक का है। कानून मौजूद है, फिर भी शोर क्यों नहीं रुकता?

KKN ब्यूरो। जुलूस आगे बढ़ रहा था। सड़क के दोनों ओर लोग खड़े थे। डीजे के स्पीकर से निकलती आवाज इतनी तेज थी कि बातचीत करना मुश्किल था। बच्चे सबसे आगे थे। कोई नाच रहा था, कोई स्पीकर के पास जाकर उछल रहा था। किसी के चेहरे पर उत्साह था, किसी के हाथ में मोबाइल। फिर अचानक संगीत बदला। बेस और तेज हुआ। बच्चों ने कान बंद नहीं किए। वे और करीब चले गए। भीड़ ने इसे उत्सव समझा। लेकिन मानव शरीर के भीतर उस समय उत्सव नहीं, एक जैविक संघर्ष चल रहा था। क्योंकि कान आवाज को केवल सुनता नहीं है। उसके भीतर मौजूद अत्यंत महीन संरचनाएं ध्वनि की ऊर्जा को विद्युत संकेतों में बदलती हैं। बहुत तेज आवाज या लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहने से इन संरचनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। और कुछ मामलों में यह क्षति स्थायी हो सकती है। अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के अनुसार अत्यधिक शोर से होने वाली श्रवण क्षति स्थायी हो सकती है। तो सवाल है— जिसे हम उत्सव की आवाज समझ रहे हैं, क्या वह किसी बच्चे के भविष्य की सुनने की क्षमता पर हमला तो नहीं?

शोर सिर्फ कान को नहीं, पूरे शरीर को प्रभावित करता है

ध्वनि प्रदूषण की सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि इसका असर केवल कान पर होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अत्यधिक पर्यावरणीय शोर नींद में बाधा, संज्ञानात्मक प्रभाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, हृदय एवं चयापचय संबंधी प्रभावों तथा श्रवण क्षमता पर प्रतिकूल असर से जुड़ा है। यानी लगातार तेज आवाज के बीच रहने वाला व्यक्ति केवल परेशान नहीं हो रहा। उसका शरीर लगातार उस शोर को एक तनावकारी उत्तेजना के रूप में ग्रहण कर रहा है। नींद टूटती है। शरीर को पर्याप्त विश्राम नहीं मिलता है। चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। एकाग्रता प्रभावित हो सकती है और लंबे समय तक अत्यधिक पर्यावरणीय शोर हृदय संबंधी जोखिमों को भी जन्म दे सकता है। इसलिए ध्वनि प्रदूषण को केवल “कान का मामला” समझना बड़ी भूल है।

डीजे के सामने खड़ा बच्चा सबसे बड़ा सवाल क्यों है?

बच्चों के मामले में खतरा और गंभीर हो जाता है। सीडीसी के अनुसार बच्चों में श्रवण क्षमता प्रभावित होने से संवाद, भाषा सीखने और सामाजिक विकास पर असर पड़ सकता है। कल्पना कीजिए— एक बच्चा धार्मिक जुलूस में डीजे के बिल्कुल सामने नाच रहा है। आवाज कुछ मिनट की है। फिर अगला जुलूस। फिर शादी। फिर दूसरा आयोजन। फिर मोबाइल या ईयरफोन पर तेज संगीत। यानी समस्या किसी एक दिन की नहीं, कुल ध्वनि-प्रदर्शन की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आवाज की तीव्रता, सुनने की अवधि और कितनी बार तेज आवाज के संपर्क में आया गया—तीनों महत्वपूर्ण हैं। उसके अनुसार 80 डेसीबल पर सप्ताह में 40 घंटे तक सुनना सुरक्षित सीमा के भीतर माना जाता है, जबकि 90 डेसीबल पर यह अवधि घटकर लगभग 4 घंटे रह जाती है।  इसका सीधा अर्थ है— आवाज जितनी तेज होगी, सुरक्षित समय उतना ही कम होगा। डीजे के स्पीकर के ठीक सामने खड़े बच्चे को यह पता भी नहीं होता कि वह कितनी ध्वनि के संपर्क में है।

नुकसान हमेशा उसी वक्त दिखाई नहीं देता

शोर से होने वाली श्रवण क्षति हमेशा तत्काल दर्द या बेहोशी के रूप में सामने नहीं आती। कभी कान में घंटी बजने लगती है। कभी आवाज कुछ देर के लिए दबे-दबे जैसी लगती है। कभी बातचीत सुनने में परेशानी होती है और कई बार व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। सीडीसी के अनुसार अत्यधिक तेज आवाज से एक बार के बहुत तेज संपर्क से भी श्रवण क्षति हो सकती है और लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क से भी स्थायी नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि “बच्चा तो सिर्फ कुछ देर नाच रहा था” यह कहना बचाव नहीं है। जोखिम आवाज की वास्तविक तीव्रता और संपर्क की अवधि पर निर्भर करता है।

डीजे कितना तेज है—यह कान नहीं, मीटर बताएगा

यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य समझना जरूरी है। ध्वनि की तीव्रता डेसीबल में मापी जाती है और डेसीबल पैमाना रैखिक नहीं, लघुगणकीय होता है। इसलिए 10 डेसीबल की बढ़ोतरी को केवल “थोड़ी ज्यादा आवाज” समझना गलत है। व्यावसायिक शोर सुरक्षा के लिए अमेरिकी राष्ट्रीय व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संस्थान 85 डेसीबल के आसपास के स्तर पर दैनिक संपर्क को सीमित करने की सलाह देता है और ध्वनि बढ़ने के साथ सुरक्षित संपर्क समय घटाने की सिफारिश करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मनोरंजन स्थलों और आयोजनों के लिए सुरक्षित श्रवण मानक में 100 डेसीबल का अधिकतम औसत ध्वनि स्तर, लाइव निगरानी और ध्वनि स्तर की रिकॉर्डिंग जैसी व्यवस्थाओं की सिफारिश की है। इसलिए किसी जुलूस या आयोजन में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि— “डीजे अच्छा बज रहा है या नहीं?” सवाल होना चाहिए— “डीजे कितने डेसीबल पर बज रहा है?”

भारत में कानून क्या कहता है?

भारत में ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 लागू हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की अधिकतम अनुमेय सीमा तय की गई है।

क्षेत्र

दिन रात
औद्योगिक 75 डेसीबल 70 डेसीबल
वाणिज्यिक 65 डेसीबल 55 डेसीबल
आवासीय 55 डेसीबल 45 डेसीबल
शांत क्षेत्र 50 डेसीबल 40 डेसीबल

रात का समय सामान्यतः 10 बजे से सुबह 6 बजे तक माना गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों में इन सीमाओं के पालन और प्रवर्तन की जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरणों पर रखी गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात— लाउडस्पीकर या सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली चलाने के लिए लिखित अनुमति आवश्यक है। नियमों के अनुसार रात में 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर या सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली के इस्तेमाल पर सामान्य प्रतिबंध है, हालांकि बंद परिसर में आंतरिक संचार जैसी सीमित परिस्थितियां अलग हैं। राज्य सरकारें सांस्कृतिक या धार्मिक अवसरों पर सीमित अवधि के लिए रात में 10 बजे से 12 बजे तक छूट दे सकती हैं, लेकिन यह छूट स्वतः मिलने वाला अधिकार नहीं है। नियम इसमें अधिकतम 15 दिनों की सीमा का प्रावधान करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है—शांति से जीना अधिकार है

2005 में सुप्रीम कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण से जुड़े मामले में स्पष्ट रूप से रात के समय शोर पर गंभीर चिंता जताई थी। अदालत ने माना कि लोगों को रात में शांतिपूर्ण नींद और जीवन का अधिकार है तथा ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले नियमों का पालन आवश्यक है। अर्थात किसी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक आयोजन का अधिकार दूसरे नागरिकों के स्वास्थ्य और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। यही लोकतांत्रिक संतुलन है। धर्म की स्वतंत्रता है। उत्सव का अधिकार है। लेकिन दूसरे की नींद छीनने या स्वास्थ्य को खतरे में डालने की स्वतंत्रता नहीं है।

फिर कानून होने के बावजूद डीजे क्यों नहीं रुकता?

कानून मौजूद है। सीमा मौजूद है। अनुमति की व्यवस्था मौजूद है। रात का प्रतिबंध मौजूद है। फिर भी व्यवहार में तेज डीजे और लाउडस्पीकर अक्सर दिखाई देते हैं। इसका एक कारण प्रवर्तन की कमजोरी है। दूसरा कारण सामाजिक स्वीकृति। तीसरा कारण यह भ्रम कि धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन में ध्वनि की सीमा लागू नहीं होती। जबकि नियम किसी धर्म का नाम लेकर ध्वनि को असीमित करने की अनुमति नहीं देता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रशासन द्वारा अवैध लाउडस्पीकर और तेज डीजे के खिलाफ कार्रवाई के उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। 2026 में नागपुर में पुलिस ने बड़ी संख्या में अनधिकृत लाउडस्पीकर हटाने और डीजे उपकरण जब्त करने जैसी कार्रवाई की, जो दिखाती है कि कानून लागू किया जाए तो व्यवस्था में बदलाव संभव है।

तो क्या जुलूस में डीजे पूरी तरह बंद कर देना चाहिए?

समाधान उत्सव बंद करना नहीं, उत्सव को सुरक्षित बनाना है। डीजे की आवाज को निर्धारित सीमा में रखा जा सकता है। स्पीकर की दिशा आबादी से बाहर या नीचे की ओर रखी जा सकती है। बच्चों को स्पीकर के बिल्कुल सामने न जाने दिया जाए। आयोजक ध्वनि स्तर मापने के लिए कैलिब्रेटेड मीटर का इस्तेमाल करें। रात 10 बजे के बाद नियमों का कठोर पालन हो। सबसे महत्वपूर्ण— धार्मिक जुलूस में बच्चे डीजे के सामने नाचें नहीं। यह किसी धर्म के खिलाफ बात नहीं है। यह बच्चों के कान और मस्तिष्क की सुरक्षा का सवाल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में 1 अरब से अधिक युवा, विशेष रूप से 12 से 35 वर्ष की उम्र के लोग, असुरक्षित मनोरंजक ध्वनि के कारण श्रवण क्षमता खोने के जोखिम में हैं। यह आंकड़ा हमें चेतावनी देता है कि समस्या भविष्य की नहीं, आज की है।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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