Home Bihar मामुली बारिश… और अंधेरे में डूब जाता है बिहार का गांव

मामुली बारिश… और अंधेरे में डूब जाता है बिहार का गांव

ट्री कटिंग पर हर साल करोड़ों के टेंडर, फिर भी पेड़ की टहनी से क्यों हार जाती है बिजली व्यवस्था?

KKN ब्यूरो। बिहार के गांवों में यह अब एक सामान्य अनुभव बन चुका है। बादल घिरते हैं, हल्की बारिश होती है, हवा चलती है और बिजली गायब हो जाती है। कुछ घंटे बाद बिजली विभाग की ओर से एक परिचित जवाब मिलता है—”पेड़ की टहनी बिजली के तार पर गिर गई थी, इसलिए आपूर्ति बाधित हुई।” लेकिन हर बार यही कारण सामने आने के बाद अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यदि बिजली विभाग हर वर्ष बिजली लाइनों के रखरखाव और ट्री कटिंग पर भारी राशि खर्च करता है, तो पहली ही बारिश में पेड़ों की टहनियां तारों तक कैसे पहुंच जाती हैं?

क्या सचमुच केवल पेड़ जिम्मेदार हैं?

बिजली वितरण व्यवस्था में “ट्री कटिंग” केवल पेड़ काटने का काम नहीं है। इसका उद्देश्य बिजली लाइनों के आसपास की शाखाओं की वैज्ञानिक छंटाई करना होता है, ताकि वे तारों के संपर्क में न आएं। यह कार्य मानसून शुरू होने से पहले पूरा किया जाना चाहिए। यदि यह कार्य समय पर और गुणवत्ता के साथ हो जाए, तो सामान्य बारिश में बिजली बाधित होने की संभावना काफी कम हो जाती है।

ट्री कटिंग पर कितना खर्च होता है?

यहीं से कहानी रोचक हो जाती है। जांच में पता चला कि बिहार की दोनों बिजली वितरण कंपनियां—NBPDCL और SBPDCL—हर वर्ष रखरखाव कार्यों के लिए अनेक टेंडर जारी करती हैं। इनमें लाइन मेंटेनेंस, रिपेयर, रिकंडक्टरिंग, उपकरणों के रखरखाव और कई स्थानों पर वनस्पति प्रबंधन (Vegetation Management/Tree Cutting) जैसे कार्य शामिल रहते हैं। हाल के वर्षों में बिजली अवसंरचना और रखरखाव से जुड़े कई टेंडरों की लागत करोड़ों रुपये रही है। उदाहरण के तौर पर SBPDCL ने वर्ष 2026 में लगभग 32.20 करोड़ रुपये मूल्य का एक बड़ा परियोजना टेंडर जारी किया, जबकि NBPDCL ने भी विभिन्न O&M परियोजनाओं और नई लाइनों के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर निकाले। हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बिहार सरकार या बिजली कंपनियां ट्री कटिंग पर हर वर्ष कुल कितना खर्च हुआ, इसका अलग से सार्वजनिक विवरण उपलब्ध नहीं करातीं। यह खर्च आमतौर पर Operation & Maintenance (O&M) या Repair & Maintenance (R&M) मद में समाहित रहता है। इसलिए आम नागरिक यह जान ही नहीं पाते कि उनके जिले में ट्री कटिंग पर कितना पैसा खर्च हुआ और उसका परिणाम क्या निकला।

यही सबसे बड़ा सवाल है

यदि हर वर्ष रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो— पहली बारिश में बिजली क्यों चली जाती है? हर बार पेड़ की टहनी ही कारण क्यों बनती है? क्या संवेदनशील इलाकों की पहले से पहचान नहीं की जाती? क्या ट्री कटिंग केवल मुख्य सड़कों तक सीमित रह जाती है? क्या कार्य पूरा होने के बाद किसी स्वतंत्र एजेंसी से उसका सत्यापन कराया जाता है? इन सवालों का जवाब विभाग को देना होगा।

नियम क्या कहते हैं?

बिहार विद्युत विनियामक आयोग (BERC) के सेवा मानकों के अनुसार वितरण कंपनियों की जिम्मेदारी केवल बिजली देना नहीं, बल्कि वितरण नेटवर्क का सुरक्षित संचालन और समय पर रखरखाव करना भी है। लाइन फॉल्ट होने पर निर्धारित समय में बिजली बहाल करना और नेटवर्क को सुरक्षित रखना वितरण कंपनी की जिम्मेदारी है।

क्या केवल पेड़ दोषी हैं?

ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली बाधित होने के पीछे कई कारण होते हैं— पुराने और जर्जर तार, झुके हुए पोल, समय पर रखरखाव का अभाव, ओवरलोडेड फीडर, खराब इंसुलेशन, कमजोर अर्थिंग और लाइन पेट्रोलिंग में लापरवाही! ऐसे में हर बार केवल “पेड़ की टहनी” को कारण बताना पूरी तस्वीर नहीं हो सकता।

पारदर्शिता की सबसे बड़ी कमी

यदि सरकार वास्तव में जवाबदेही चाहती है, तो प्रत्येक जिले के लिए निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए— ट्री कटिंग पर स्वीकृत राशि, किस एजेंसी को ठेका मिला, कितने किलोमीटर लाइन की छंटाई हुई, किस अधिकारी ने कार्य का सत्यापन किया और भुगतान से पहले निरीक्षण रिपोर्ट क्या थी! जब तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी, तब तक यह पता लगाना मुश्किल रहेगा कि खर्च का लाभ वास्तव में उपभोक्ताओं तक पहुंचा या नहीं।

तेज आंधी या तूफान का असर

बिजली विभाग का यह तर्क सही हो सकता है कि तेज आंधी या तूफान में पेड़ गिरने से बिजली व्यवस्था प्रभावित होती है। लेकिन जब सामान्य बारिश और हल्की हवा में भी गांव अंधेरे में डूब जाएं, तो सवाल मौसम पर नहीं, व्यवस्था की तैयारी पर उठना स्वाभाविक है। यदि हर वर्ष रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो पहली बारिश में ही बिजली व्यवस्था का बार-बार फेल होना केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि जवाबदेही का विषय भी है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल बिजली उत्पादन और आपूर्ति के आंकड़े न बताए, बल्कि यह भी सार्वजनिक करे कि ट्री कटिंग और रखरखाव पर खर्च हुए प्रत्येक रुपये से आखिर बिजली व्यवस्था कितनी मजबूत हुई।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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