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भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में चौकाने वाला खुलाशा, क्या हर गांव में था स्कूल?

आज भी उपलब्ध है थॉमस मुनरो और विलियम एडम की रिपोर्ट

KKN ब्यूरो। ब्रिटिश शासन ने भारत पर राजनीतिक कब्जा तो कर लिया था, लेकिन उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में उसे एक और सवाल परेशान कर रहा था—आखिर इस देश की शिक्षा व्यवस्था कैसी है? क्या भारतीय समाज पूरी तरह अशिक्षित था, जैसा बाद के औपनिवेशिक विमर्श में प्रचारित किया गया? या फिर यहां पहले से ही एक संगठित स्थानीय शिक्षा तंत्र मौजूद था? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने व्यापक सर्वेक्षण कराए। मद्रास प्रेसीडेंसी में गवर्नर सर थॉमस मुनरो के निर्देश पर 1822-25 के बीच जिला कलेक्टरों से गांव-गांव की शिक्षा व्यवस्था का विवरण जुटाया गया। इसके लगभग एक दशक बाद, गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने स्कॉटिश मिशनरी और विद्वान विलियम एडम को बंगाल और बिहार की स्वदेशी शिक्षा प्रणाली का अध्ययन सौंपा। एडम ने 1835, 1836 और 1838 में तीन विस्तृत रिपोर्टें प्रस्तुत कीं। आज भी ये रिपोर्टें भारतीय शिक्षा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में गिनी जाती हैं।

थॉमस मुनरो का सर्वे: गांव-गांव तक पहुंची सरकारी पड़ताल

25 जून 1822 को मद्रास के गवर्नर सर थॉमस मुनरो ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिले का कलेक्टर अपने क्षेत्र के स्कूलों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और पाठ्यक्रम का विस्तृत ब्यौरा तैयार करे। यह सर्वेक्षण 1822 से 1825 तक चला और मद्रास प्रेसीडेंसी के अधिकांश जिलों को कवर किया गया। बाद में इसके अंश ब्रिटिश संसद के दस्तावेजों में भी प्रकाशित हुए। सर्वेक्षण में स्थानीय पाठशालाओं, संस्कृत विद्यालयों, फारसी और अरबी शिक्षण संस्थानों का विवरण संकलित किया गया। रिपोर्टों में यह उल्लेख मिलता है कि शिक्षा का ढांचा मुख्यतः स्थानीय समाज और समुदाय के सहयोग से संचालित होता था। कई स्थानों पर शिक्षक को नगद शुल्क, अनाज या सामुदायिक सहयोग के माध्यम से पारिश्रमिक दिया जाता था। हालांकि, मुनरो स्वयं यह भी मानते थे कि इस शिक्षा प्रणाली में कई सीमाएं थीं।

क्या हर हजार लोगों पर एक स्कूल था?

मद्रास सर्वेक्षण के आधार पर तैयार सरकारी सारांश में अनुमान लगाया गया कि लगभग प्रत्येक एक हजार लोगों पर एक विद्यालय मौजूद था। साथ ही यह भी दर्ज किया गया कि विद्यालय जाने योग्य आयु के लगभग एक-चौथाई लड़के किसी न किसी विद्यालय में पढ़ रहे थे। यह आंकड़ा पूरे भारत का नहीं, बल्कि उस समय के मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वेक्षण का निष्कर्ष था। इसे पूरे देश पर लागू करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं माना जाता।

विलियम एडम की रिपोर्ट: बंगाल और बिहार का आईना

1835 में विलियम एडम को बंगाल और बिहार की स्थानीय शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन करने का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने तीन रिपोर्टें तैयार कीं, जिनमें गांवों की पाठशालाओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों, पाठ्यक्रम, फीस और संचालन व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया गया। एडम ने पाया कि अधिकांश विद्यालय स्थानीय भाषा में शिक्षा देते थे। शिक्षा का वित्तीय आधार समुदाय था। विद्यार्थियों से मामूली शुल्क लिया जाता था और कई शिक्षक कृषि या अन्य कार्यों के साथ अध्यापन भी करते थे। रिपोर्टों में संस्कृत टोल, फारसी मदरसे और स्थानीय पाठशालाओं का अलग-अलग विवरण मिलता है।

क्या सभी जातियों के बच्चे पढ़ते थे?

यह प्रश्न सबसे अधिक विवाद का विषय रहा है। इतिहासकार धर्मपाल ने 1983 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Beautiful Tree में मद्रास सर्वेक्षण के मूल अभिलेखों को सामने लाते हुए दावा किया कि विद्यालयों में केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य जातियों के विद्यार्थी भी पर्याप्त संख्या में पढ़ते थे। उन्होंने जिला-वार आंकड़ों के आधार पर यह तर्क दिया कि भारतीय शिक्षा अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक रूप से व्यापक थी। लेकिन आधुनिक इतिहासकार इस विषय पर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं। हाल के अकादमिक शोध बताते हैं कि विभिन्न जिलों में विद्यार्थियों की सामाजिक संरचना अलग-अलग थी। कई क्षेत्रों में गैर-ब्राह्मण समुदायों की उल्लेखनीय भागीदारी थी।

क्या अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा को नष्ट कर दिया?

यही वह प्रश्न है, जिस पर सबसे अधिक वैचारिक बहस होती है। धर्मपाल का निष्कर्ष है कि ब्रिटिश राजस्व नीतियों, स्थानीय दान व्यवस्थाओं के कमजोर पड़ने और अंग्रेजी शिक्षा नीति के विस्तार ने पारंपरिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया। उन्होंने मुनरो, एडम और अन्य सरकारी अभिलेखों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत किया। दूसरी ओर अनेक आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था का पतन केवल ब्रिटिश नीतियों से नहीं हुआ। आर्थिक बदलाव, सामाजिक परिवर्तन, नगरीकरण, नई प्रशासनिक आवश्यकताओं और अंग्रेजी शिक्षा से मिलने वाले रोजगार के अवसरों ने भी पारंपरिक विद्यालयों को कमजोर किया। इसलिए अधिकांश समकालीन शोध इसे बहु-कारक प्रक्रिया मानते हैं।

आज इन रिपोर्टों का महत्व क्यों है?

थॉमस मुनरो और विलियम एडम की रिपोर्टें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये प्रत्यक्ष सरकारी सर्वेक्षण पर आधारित दस्तावेज हैं। इनमें गांवों के विद्यालय, शिक्षक, विद्यार्थियों की संख्या, भाषा, फीस और पाठ्यक्रम का विस्तृत विवरण मिलता है। इतिहासकार इन्हें भारतीय शिक्षा इतिहास के प्राथमिक स्रोत (Primary Sources) के रूप में स्वीकार करते हैं। हालांकि, इन रिपोर्टों की व्याख्या को लेकर मतभेद बने हुए हैं। कुछ विद्वान इन्हें भारतीय शिक्षा की समृद्ध परंपरा का प्रमाण मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें सीमित भौगोलिक क्षेत्रों के सर्वेक्षण के रूप में देखते हैं।

इतिहास की चुनौती तथ्य और विचारधारा

इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती तथ्यों को विचारधारा से अलग करके देखना है। थॉमस मुनरो और विलियम एडम की रिपोर्टें इस बात का प्रमाण अवश्य देती हैं कि उन्नीसवीं सदी के आरंभिक भारत में स्थानीय स्तर पर एक विकसित स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था मौजूद थी। यह भी स्पष्ट होता है कि शिक्षा का बड़ा हिस्सा समाज के सहयोग से चलता था, केवल सरकार के भरोसे नहीं। इतिहास हमें एक अधिक संतुलित तस्वीर दिखाता है—जहां भारत की स्वदेशी शिक्षा प्रणाली मजबूत भी थी, विविध भी थी और समय के साथ अनेक राजनीतिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक कारणों से उसमें व्यापक परिवर्तन भी आया। यही संतुलित निष्कर्ष इन दोनों ऐतिहासिक सर्वेक्षणों का सबसे बड़ा संदेश है।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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