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दल-बदल की राजनीति पर लगाम कब?

लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल: विचारधारा बड़ी या सत्ता?

कौशलेन्द्र झा

KKN ब्यूरो। भारतीय राजनीति में एक ऐसा दौर चल रहा है, जहां चुनाव से पहले और चुनाव के बाद नेताओं के दल बदलने की खबरें आम हो चुकी हैं। कभी कोई नेता टिकट के लिए पार्टी बदलता है, कभी मंत्री पद के लिए और कभी सत्ता के समीकरण बदलते ही उसकी राजनीतिक निष्ठा भी बदल जाती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह गया है? क्या विचारधारा, सिद्धांत और जनता के विश्वास का अब कोई महत्व नहीं रह गया? आज आवश्यकता इस बात की है कि दल-बदल को पूरी तरह रोकने के बजाय उसके लिए ऐसा प्रभावी और कठोर नियम बनाया जाए, जो राजनीतिक अवसरवाद पर अंकुश लगा सके और लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत कर सके।

क्यों जरूरी है नया नियम?

वर्तमान में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) मौजूद है। लेकिन यह कानून मुख्य रूप से विधानसभा और संसद में वोटिंग के दौरान पार्टी लाइन से अलग जाने पर लागू होता है। जबकि वास्तविक समस्या यह है कि नेता चुनाव जीतने के बाद या चुनाव से ठीक पहले अपनी सुविधा के अनुसार पार्टी बदल लेते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है। मतदाता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ी विचारधारा, पार्टी के एजेंडे और वादों को भी ध्यान में रखकर वोट देता है। जब वही नेता अचानक दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो मतदाता खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।

छह साल की राजनीतिक तपस्या का प्रस्ताव

कल्पना कीजिए कि यदि कोई नेता पार्टी बदलता है, तो उसे नई पार्टी में कम-से-कम छह वर्षों तक केवल प्राथमिक सदस्य के रूप में रहना अनिवार्य कर दिया जाये- तो…। इस दौरान— उसे कोई मंत्री पद नहीं मिले। उसे संगठन में कोई बड़ा पद नहीं मिले। उसे चुनाव लड़ने का टिकट न दिया जाए और उसे केवल कार्यकर्ता की तरह पार्टी के लिए काम करना पड़े। छह वर्षों की इस अवधि में उसके काम, समर्पण, अनुशासन और पार्टी के प्रति निष्ठा का मूल्यांकन किया जाए। उसके बाद ही उसे किसी प्रकार की जिम्मेदारी या चुनावी अवसर मिले।

इससे क्या बदलेगा?

  1. अवसरवादी राजनीति पर लगेगी रोक- आज कई नेता केवल सत्ता और पद के लिए पार्टी बदलते हैं। यदि छह वर्षों तक किसी पद या टिकट की संभावना नहीं होगी, तो केवल वही लोग दल बदलेंगे जो वास्तव में विचारधारा के कारण पार्टी बदलना चाहते हैं।
  2. कार्यकर्ताओं का सम्मान बढ़ेगा- किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले कार्यकर्ता पीछे रह जाते हैं और दूसरी पार्टी से आए नेता सीधे मंत्री या सांसद बन जाते हैं। छह साल के नियम से कार्यकर्ताओं के साथ होने वाला यह अन्याय काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
  3. राजनीतिक स्थिरता आएगी- भारत के कई राज्यों में सरकारें दल-बदल के कारण गिरी हैं। कई बार जनता द्वारा चुनी गई सरकारें कुछ नेताओं के पाला बदलने से बदल गईं। यदि दल-बदल करने वाले नेताओं के लिए लंबी प्रतीक्षा अवधि तय हो जाए, तो राजनीतिक अस्थिरता भी कम होगी।
  4. विचारधारा की वापसी होगी- एक समय था जब राजनीतिक दल विचारधाराओं के आधार पर पहचाने जाते थे। आज कई बार ऐसा लगता है कि विचारधारा केवल भाषणों तक सीमित रह गई है। छह वर्ष की अनिवार्य सदस्यता यह साबित करने का अवसर देगी कि नेता वास्तव में विचारधारा के कारण आया है या केवल सत्ता की लालसा में।

दुनिया के लोकतंत्र क्या कहते हैं?

कई लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन और सदस्यता को लेकर कड़े नियम हैं। वहां पार्टी के शीर्ष पदों तक पहुंचने के लिए वर्षों तक संगठनात्मक कार्य करना पड़ता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भी राजनीतिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए ऐसे मॉडल पर गंभीर बहस की आवश्यकता है।

क्या यह नियम लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होगा?

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि किसी व्यक्ति को पार्टी बदलने से रोकना उसके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होगा। लेकिन यहां बात पार्टी बदलने पर रोक लगाने की नहीं है। कोई भी नेता अपनी पसंद की पार्टी में जा सकता है। प्रस्ताव केवल इतना है कि दल बदलने के तुरंत बाद उसे सत्ता, टिकट या संगठनात्मक लाभ न मिले। उसे पहले यह साबित करना होगा कि उसका निर्णय व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास के कारण था।

जनता के विश्वास की रक्षा जरूरी

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र जनता के विश्वास पर टिका होता है। जब नेता बार-बार अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलते हैं, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। आज देश में राजनीति के प्रति बढ़ती निराशा का एक बड़ा कारण यही है कि मतदाता को लगता है कि चुनाव के समय किए गए वादे और दिखाई गई विचारधारा सत्ता के समीकरण बदलते ही बदल जाती है।

राजनीति में तपस्या की वापसी का समय

भारतीय राजनीति को आज ऐसे सुधारों की आवश्यकता है जो नेताओं को नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करें। दल-बदल पर छह वर्षों की अनिवार्य प्राथमिक सदस्यता और इस दौरान किसी भी पद या टिकट पर रोक का नियम राजनीति में तपस्या, निष्ठा और जवाबदेही की संस्कृति को वापस ला सकता है। सवाल यह नहीं है कि कोई नेता पार्टी क्यों बदलता है। असली सवाल यह है कि क्या पार्टी बदलते ही उसे सत्ता या पद का पुरस्कार मिलना चाहिए? यदि लोकतंत्र को अवसरवाद से बचाना है, तो शायद समय आ गया है कि राजनीति में भी तपस्या की एक न्यूनतम अवधि तय की जाए। क्योंकि, लोकतंत्र की ताकत नेता नहीं, जनता का विश्वास होता है।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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