सम्राट चौधरी सरकार ने युवाओं के लिए रोजगार, कौशल, शिक्षा, इंटर्नशिप और परीक्षा सुधार की कई पहलें शुरू की हैं, लेकिन असली सवाल योजनाओं की संख्या नहीं, उनके नतीजों का है
KKN ब्यूरो। बिहार की सड़कों पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते लाखों चेहरे दिखाई देते हैं। किसी के हाथ में किताब है, किसी की आंखों में सरकारी नौकरी का सपना और किसी के कंधे पर उस परिवार की उम्मीद, जिसने खेत गिरवी रखकर, जमीन बेचकर या कर्ज लेकर बेटे-बेटी को शहर भेजा है। यह बिहार की युवा पीढ़ी की एक तस्वीर है। लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एक दूसरी युवा पीढ़ी मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया देख रही है। वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कारोबार, ऑनलाइन काम, नए उद्यम और वैश्विक रोजगार के अवसरों से परिचित हो रही है। वह यह भी देख रही है कि दुनिया में काम करने के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। वह अपने आसपास देखती है। सीमित उद्योग। कम निजी नौकरियां। परीक्षाओं की लंबी प्रक्रिया। भर्ती में देरी। कभी प्रश्नपत्र विवाद, कभी परीक्षा स्थगित। उच्च शिक्षा के सीमित अवसर और अंततः दूसरे राज्यों की ओर पलायन। यहीं बिहार की जेन-जी का सबसे बड़ा द्वंद्व पैदा होता है। उसकी आकांक्षा वैश्विक है, लेकिन अवसर अभी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था की पुरानी सीमाओं में कैद हैं। यही वह मोड़ है, जहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार की असली परीक्षा शुरू होती है। सवाल केवल यह नहीं कि सरकार युवाओं के लिए कितनी योजनाएं चला रही है। सवाल यह है कि— क्या बिहार की सरकार ऐसी व्यवस्था बना रही है, जिसमें युवा नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला भी बन सके? उससे भी बड़ा सवाल— क्या बिहार अपनी युवा आबादी को अपनी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत में बदल पाएगा?
बिहार की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है
बिहार की आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। पंद्रह से उनतीस वर्ष के आयु वर्ग को देखें तो राज्य की आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी युवा दायरे में आता है। यानी बिहार के पास वह मानवीय पूंजी है, जिसकी तलाश दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं कर रही हैं। लेकिन केवल युवा आबादी आर्थिक शक्ति नहीं बनती। युवा आबादी तभी ताकत बनती है, जब उसके पास— शिक्षा हो, कौशल हो, स्वास्थ्य हो, रोजगार हो, पूंजी तक पहुंच हो और आगे बढ़ने का भरोसा हो। यहीं बिहार की तस्वीर कुछ बेचैन करने वाली है। नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में पंद्रह से उनतीस वर्ष आयु वर्ग की बेरोजगारी दर करीब बारह प्रतिशत रही। शहरी क्षेत्र में युवा बेरोजगारी की तस्वीर इससे कहीं अधिक गंभीर दिखाई देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि बिहार का हर आठवां युवा बेरोजगार है। बेरोजगारी दर की गणना श्रम बाजार में सक्रिय आबादी के आधार पर होती है। लेकिन आंकड़ा एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है— शहरों में शिक्षा पूरी करके रोजगार बाजार में प्रवेश करने वाले युवाओं के लिए अवसरों की कमी गंभीर है और यही वह जगह है जहां बिहार की युवा नीति को केवल सरकारी नौकरी की तैयारी से आगे जाना होगा।
सम्राट चौधरी सरकार ने क्या बदला?
यहां तथ्यों और राजनीतिक दावों के बीच अंतर करना जरूरी है। सम्राट चौधरी ने अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद संभाला। इसलिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, कुशल युवा कार्यक्रम और स्वयं सहायता जैसी पहले से चल रही योजनाओं का पूरा श्रेय वर्तमान सरकार को देना सही नहीं होगा। लेकिन अब इन योजनाओं के भविष्य की जिम्मेदारी सम्राट चौधरी सरकार की है। इस सरकार ने युवाओं के सवाल को एक अलग प्रशासनिक ढांचे में देखने की कोशिश जरूर की है। सबसे महत्वपूर्ण कदम है— युवा, रोजगार एवं कौशल विकास विभाग का गठन। इस विभाग का उद्देश्य युवाओं के लिए रोजगार पंजीकरण, मार्गदर्शन, रोजगार मेले, निजी क्षेत्र से संपर्क, प्रशिक्षण, औद्योगिक प्रशिक्षण और कौशल विकास जैसी गतिविधियों को एक व्यापक ढांचे में जोड़ना है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में लंबे समय से युवा संबंधी योजनाएं अलग-अलग विभागों में बंटी हुई थीं। शिक्षा अलग। कौशल विकास अलग। रोजगार अलग। औद्योगिक प्रशिक्षण अलग। उद्यमिता अलग। युवा कल्याण अलग। लेकिन युवा एक ही है। उसे रोजगार चाहिए तो उसे पांच दफ्तरों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें? यदि नया विभाग वास्तव में इन सभी प्रयासों को एक साथ जोड़ पाता है तो यह बिहार की युवा नीति में संरचनात्मक बदलाव साबित हो सकता है। लेकिन फिलहाल इसे सफलता का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। यह एक नई व्यवस्था की शुरुआत है। अब उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि कितने युवाओं को वास्तविक रोजगार मिला।
कुशल युवा कार्यक्रम: प्रशिक्षण से आगे बढ़ने का वक्त
बिहार सरकार ने कुशल युवा कार्यक्रम को अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखने का फैसला किया है। वर्ष 2026-27 के लिए इसके लिए लगभग 430 करोड़ रुपये के अनुमानित खर्च को मंजूरी दी गई है। यह महत्वपूर्ण निवेश है। लेकिन सवाल यह है कि प्रशिक्षण के बाद युवा करेगा क्या? यही वह सवाल है जिसे बिहार की कौशल नीति के केंद्र में रखना होगा। क्योंकि आज के रोजगार बाजार में केवल प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है। नियोक्ता पूछता है— क्या आप आंकड़ों को समझ सकते हैं? क्या आप डिजिटल उपकरण चला सकते हैं? क्या आप कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों के साथ काम कर सकते हैं? क्या आप किसी समस्या का समाधान खोज सकते हैं? क्या आप ग्राहक से संवाद कर सकते हैं? क्या आप किसी उत्पाद को बाजार तक पहुंचा सकते हैं? क्या आप बदलती तकनीक के साथ खुद को बदल सकते हैं? अगर प्रशिक्षण इन सवालों का जवाब नहीं देता तो वह प्रशिक्षण कागज पर उपलब्धि और जमीन पर निराशा बन जाता है। इसलिए बिहार को अब कौशल विकास की अगली सीढ़ी पर जाना होगा। प्रशिक्षण से रोजगार। रोजगार से आय। आय से आर्थिक स्वतंत्रता। यही पूरी श्रृंखला बनानी होगी।
इंटर्नशिप से नौकरी तक का सफर कितना लंबा है?
युवाओं को पढ़ाई और नौकरी के बीच व्यावहारिक अनुभव देने के लिए मुख्यमंत्री प्रतिज्ञा योजना शुरू की गई है। इसमें 18 से 28 वर्ष के युवाओं को तीन से बारह महीने तक प्रशिक्षण अथवा इंटर्नशिप का अवसर और अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता के आधार पर मासिक सहायता देने का प्रावधान है। योजना की अवधारणा अच्छी है। क्योंकि एक बड़ी समस्या यह है कि कॉलेज से निकलने वाले युवा के पास डिग्री तो होती है, लेकिन काम का अनुभव नहीं होता। नियोक्ता कहता है— अनुभव चाहिए। युवा कहता है— पहली नौकरी मिलेगी तभी अनुभव आएगा। यह दुष्चक्र इंटर्नशिप तोड़ सकती है। लेकिन यहां भी सरकार के सामने असली परीक्षा है। इंटर्नशिप पूरी करने के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली? कितनों की आय बढ़ी? कितने छह महीने बाद भी उसी रोजगार में टिके हैं? कितने वापस बेरोजगार हो गए? यही आंकड़े प्रतिज्ञा योजना की असली सफलता बताएंगे। अगर इंटर्नशिप केवल कुछ महीनों की आर्थिक सहायता बनकर रह गई तो इसका असर सीमित होगा। लेकिन अगर उद्योगों के साथ मजबूत समझौते किए जाएं और इंटर्नशिप पूरी करने वाले युवाओं को प्राथमिकता से रोजगार मिले तो यह योजना बिहार के रोजगार ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
युवा की मेहनत और व्यवस्था के बीच भरोसे का सवाल
बिहार की युवा राजनीति को समझना है तो प्रतियोगी परीक्षा के सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक युवा दो साल, तीन साल, कभी-कभी पांच साल तक परीक्षा की तैयारी करता है। उसकी उम्र बढ़ती है। परिवार का खर्च बढ़ता है और परीक्षा प्रक्रिया कभी प्रश्नपत्र, कभी परिणाम, कभी भर्ती प्रक्रिया और कभी न्यायिक विवाद में उलझ जाती है। इसलिए सम्राट चौधरी सरकार द्वारा परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए राज्य स्तरीय समिति बनाने और तकनीक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर जोर देना महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन परीक्षा सुधार का मतलब केवल नई तकनीक नहीं होना चाहिए। परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए पांच चीजें अनिवार्य हैं— प्रश्नपत्र की अभेद्य सुरक्षा। परीक्षा केंद्रों की निगरानी। परिणाम की पारदर्शिता। समयबद्ध भर्ती। शिकायतों का त्वरित समाधान। युवा को सबसे ज्यादा चोट तब लगती है, जब वह महसूस करता है कि उसकी मेहनत से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवस्था की कमजोरी हो गई है। इसलिए परीक्षा सुधार असल में केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है। यह सरकार और युवा के बीच टूटते भरोसे की मरम्मत का काम है।
क्या बिहार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देगा?
सरकार ने राज्य में मॉडल स्कूलों की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। कंप्यूटर शिक्षा, अंग्रेजी, तकनीकी शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर जोर देने की बात भी सामने आई है। यह अच्छी दिशा है। लेकिन बिहार के शिक्षा तंत्र की समस्या केवल भवनों की संख्या नहीं है। असल सवाल है— कक्षा में शिक्षक कितने हैं? शिक्षक की उपस्थिति कैसी है? विद्यार्थियों का सीखने का स्तर क्या है? प्रयोगशाला कितनी सक्रिय है? पुस्तकालय में किताबें हैं? कंप्यूटर प्रयोगशाला वास्तव में चलती है? विद्यालय से निकलने वाले विद्यार्थी आगे किस दिशा में जाते हैं? अगर मॉडल स्कूल केवल बेहतर भवन, रंगी हुई दीवार और कंप्यूटर की कुछ मशीनों तक सीमित रह गए तो मॉडल स्कूल शब्द का अर्थ खो जाएगा। मॉडल स्कूल को परिणाम का मॉडल बनाना होगा।
पैसा बिहार से बाहर जा रहा है, प्रतिभा भी
बिहार का स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड उच्च शिक्षा के लिए चार लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस योजना से हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता मिली है। लेकिन मुख्यमंत्री ने स्वयं इस बात की ओर संकेत किया है कि इस योजना के माध्यम से उपलब्ध कराई जाने वाली बड़ी धनराशि का इस्तेमाल दूसरे राज्यों में शिक्षा के लिए हो रहा है। यह समस्या नहीं, लेकिन एक संकेत जरूर है। अगर बिहार का विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए लगातार बाहर जा रहा है तो सवाल विद्यार्थी से नहीं, बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए। क्यों वह दिल्ली जाएगा? क्यों उसे राजस्थान जाना पड़ेगा? क्यों उसे महाराष्ट्र या कर्नाटक जाना पड़ेगा? बाहर जाने की स्वतंत्रता छीनना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि बिहार में ऐसे संस्थान बनें जिनकी गुणवत्ता विद्यार्थियों को यहां रोक सके। शिक्षा के लिए बाहर जाना विकल्प हो, मजबूरी नहीं।
लक्ष्य बड़ा है, इसलिए हिसाब भी बड़ा होना चाहिए
बिहार सरकार ने अगले पांच वर्षों में एक करोड़ युवाओं को नौकरी और रोजगार देने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य जितना बड़ा है, उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन बड़े लक्ष्य के साथ पारदर्शिता भी बड़ी होनी चाहिए। सरकार को हर वर्ष सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए— कितने सरकारी रोजगार दिए गए? कितने निजी रोजगार पैदा हुए? कितने स्वरोजगार शुरू हुए? कितने नए उद्यम खड़े हुए? कितने उद्यम बंद हो गए? औसत आय कितनी रही? कितने युवाओं को न्यूनतम सम्मानजनक आय मिली? सबसे महत्वपूर्ण— इनमें से कितने रोजगार वास्तव में बिहार के भीतर पैदा हुए? क्योंकि अगर बिहार का युवा दिल्ली, मुंबई, सूरत या बेंगलुरु जाकर काम करता है तो उसे रोजगार जरूर मिला, लेकिन बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए तस्वीर अलग होगी। इसलिए बिहार को केवल रोजगार की संख्या नहीं, रोजगार का भौगोलिक हिसाब भी रखना होगा।
बिहार को सरकारी नौकरी से आगे की अर्थव्यवस्था बनानी होगी
बिहार में सरकारी नौकरी की चाह को केवल युवा मानसिकता कहकर खारिज करना आसान है। लेकिन ऐसा करना समस्या को गलत समझना होगा। सरकारी नौकरी इसलिए आकर्षक है क्योंकि उसमें स्थिरता है, सामाजिक प्रतिष्ठा है और भविष्य की सुरक्षा का भरोसा है। अगर निजी क्षेत्र में समान सुरक्षा, बेहतर आय और विकास की संभावना पैदा हो जाए तो युवा विकल्प बदलने में देर नहीं करेगा। इसलिए सरकार को निजी रोजगार की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। बिहार में जिलेवार आर्थिक क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं। मुजफ्फरपुर में लीची, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योग। भागलपुर में वस्त्र उद्योग। मिथिला क्षेत्र में मखाना, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक पर्यटन। गया में पर्यटन और आतिथ्य। पटना में सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय सेवाएं। सीमांचल में कृषि प्रसंस्करण। दक्षिण बिहार में निर्माण और खनिज आधारित उद्योग। यानी हर जिले की अपनी रोजगार पहचान विकसित करनी होगी।
जेन-जी को नौकरी नहीं, विकल्प चाहिए
बिहार की नई पीढ़ी को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि सरकार नौकरी देगी। उसे विकल्प चाहिए। सरकारी नौकरी। निजी नौकरी। उद्यमिता। स्वरोजगार। डिजिटल काम। कृषि आधारित कारोबार। तकनीकी सेवाएं। रचनात्मक उद्योग। पर्यटन। हस्तशिल्प। निर्यात। अगर युवा के सामने केवल एक रास्ता होगा तो प्रतियोगिता असामान्य रूप से बढ़ेगी। लेकिन अगर दस रास्ते होंगे तो अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी और युवा का दबाव भी कम होगा। यही वह जगह है जहां बिहार की युवा नीति को एक नई दिशा मिल सकती है।
हर जिले का युवा रोजगार लेखा-जोखा
सरकार यदि वास्तव में जेन-जी को केंद्र में रखना चाहती है तो हर जिले के लिए सार्वजनिक युवा रोजगार आंकड़ा तैयार किया जाना चाहिए। इसमें लिखा हो— कितने युवा हैं। कितने पढ़ रहे हैं। कितने कौशल प्रशिक्षण में हैं। कितने प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं। कितने रोजगार में हैं। कितने स्वरोजगार कर रहे हैं। कितने बाहर काम कर रहे हैं। कितने वापस बिहार लौटे। कितने उद्यम शुरू हुए। कितनों को बैंक से ऋण मिला और कितनों की मासिक आय कितनी है। तब पहली बार बिहार की युवा नीति नारों से निकलकर आंकड़ों की जमीन पर खड़ी होगी। यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो कहा जा सकता है- सम्राट चौधरी सरकार जेन-जी के लिए सजग है। उपलब्ध सरकारी फैसलों और कार्यक्रमों को देखें तो जवाब है— सरकार की नीति में सजगता दिखाई देती है। युवा, रोजगार एवं कौशल विकास के लिए अलग विभाग बनाया गया है। कुशल युवा कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया है। प्रतिज्ञा योजना के माध्यम से इंटर्नशिप का रास्ता खोला गया है। परीक्षा सुधार के लिए तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर जोर दिया गया है। मॉडल स्कूलों की संख्या बढ़ाने की योजना है। विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए विद्यार्थी सहयोग पोर्टल शुरू किया गया है। उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता की व्यवस्था जारी है और अगले पांच वर्षों में एक करोड़ रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। नीति बनना शुरुआत है। परिणाम आना सफलता है। सम्राट चौधरी सरकार के पास अब पर्याप्त घोषणाएं हैं। अब बिहार का युवा परिणाम चाहता है।
रोजगार की संख्या नहीं, रोजगार की गुणवत्ता
बिहार की जेन-जी को केवल नौकरी चाहिए—यह आधा सच है। उसे चाहिए— सम्मानजनक आय। स्थिर भविष्य। काम करने की स्वतंत्रता। अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर। अपने राज्य में रहने का विकल्प। और सबसे बढ़कर— यह भरोसा कि मेहनत का परिणाम मिलेगा। सम्राट चौधरी सरकार ने युवाओं के लिए कई मोर्चों पर पहल शुरू की है। अब उसे इन पहलों को एक-दूसरे से जोड़ना होगा। कौशल प्रशिक्षण को उद्योग से जोड़ना होगा। इंटर्नशिप को नौकरी से जोड़ना होगा। शिक्षा को बाजार की जरूरत से जोड़ना होगा। विश्वविद्यालयों को उद्योगों से जोड़ना होगा। स्टार्टअप को पूंजी और बाजार से जोड़ना होगा और परीक्षा को समयबद्ध भर्ती से जोड़ना होगा। तभी तस्वीर बदलेगी। वरना एक और योजना आएगी। एक और पोर्टल खुलेगा। एक और घोषणा होगी। एक और लक्ष्य तय होगा और युवा फिर उसी जगह खड़ा मिलेगा— हाथ में प्रमाणपत्र, आंखों में उम्मीद और सामने रोजगार की लंबी कतार। बिहार के सामने असली चुनौती यह नहीं कि उसके पास युवा हैं या नहीं। चुनौती यह है कि— क्या वह अपने युवाओं की ऊर्जा को अर्थव्यवस्था की शक्ति में बदल सकता है? अगर जवाब हां है तो बिहार की जेन-जी राज्य की सबसे बड़ी समस्या नहीं, सबसे बड़ा समाधान बन सकती है और अगर जवाब नहीं है तो यही युवा शक्ति आने वाले वर्षों में बिहार के सबसे बड़े सामाजिक और आर्थिक दबाव में बदल सकती है। सम्राट चौधरी सरकार के पास अब दिशा तय करने का अवसर है। क्योंकि बिहार का युवा इंतजार कर रहा है। घोषणा का नहीं—परिणाम का। वायदे का नहीं—विकल्प का। नौकरी का नहीं—एक बेहतर भविष्य का।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
