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असम, बंगाल और पूर्वांचल में जनसंख्या परिवर्तन गंभीर चिंता का विषय

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तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने देश के कुछ क्षेत्रों में हो रहे population shift को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में तेजी से हो रहा जनसंख्या परिवर्तन भविष्य में गंभीर internal unrest का कारण बन सकता है। यह मुद्दा सिर्फ आंकड़ों का नहीं बल्कि राष्ट्रीय अखंडता का प्रश्न है, जिस पर अभी से विचार किया जाना चाहिए।

गुजरात के गांधीनगर स्थित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में छात्रों और फैकल्टी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यह बदलाव एक “टाइम बम” की तरह है, जिसे समय रहते डिफ्यूज करना ज़रूरी है। उन्होंने सवाल किया कि क्या किसी ने बीते 30-40 वर्षों में इन इलाकों में हुई जनसंख्या की प्रवृत्तियों पर ध्यान दिया है? और क्या हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अगले 50 वर्षों में यह परिवर्तन देश के लिए क्या परिणाम ला सकता है?

विचारधारा के नाम पर हुआ था विभाजन, अब फिर से खड़ी हो रही वैसी ही स्थिति

राज्यपाल ने भारत के विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की याद दिलाई और कहा कि 1947 का बंटवारा किसी बाहरी ताकत से नहीं, बल्कि आंतरिक असंतोष और विचारधारा की टकराव के चलते हुआ था। कुछ लोगों ने यह मान लिया था कि वे दूसरों के साथ नहीं रह सकते और इस मानसिकता ने देश को दो हिस्सों में बांट दिया।

उन्होंने कहा कि भारत ने सदियों तक बाहरी आक्रमणों का सामना किया है, लेकिन देश तब सबसे अधिक कमजोर हुआ है जब अंदर से विघटन हुआ है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि हम इतिहास से सीख नहीं लेंगे, तो आने वाले वर्षों में हालात और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

असम, बंगाल और पूर्वांचल में तेज़ी से बदल रही जनसांख्यिकी

गवर्नर रवि ने खासतौर पर Assam, West Bengal और Purvanchal (उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्से) का उल्लेख करते हुए कहा कि इन इलाकों में हो रहे जनसंख्या के बदलाव को लेकर गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन प्रवृत्तियों को नजरअंदाज़ किया गया, तो ये भविष्य में national integrity के लिए खतरा बन सकती हैं।

उनके अनुसार यह बदलाव केवल सांख्यिकीय नहीं है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संरचना को भी प्रभावित करता है। इस कारण से यह परिवर्तन सामाजिक असंतुलन और संघर्ष का कारण बन सकता है।

केवल सैन्य शक्ति से नहीं सुलझतीं आंतरिक चुनौतियां

पूर्व IPS अधिकारी रहे रवि ने कहा कि किसी देश की military strength तब तक पर्याप्त नहीं होती जब तक वह अपने भीतर की समस्याओं का समाधान न कर सके। उन्होंने Soviet Union का उदाहरण देते हुए कहा कि वह भी 1991 में आंतरिक असंतोष के कारण टूट गया, जबकि उसकी सैन्य शक्ति विश्व में अग्रणी थी।

उनका कहना था कि देश की रक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों से नहीं होती, बल्कि आंतरिक स्थिरता, सांस्कृतिक संतुलन और वैचारिक एकता से होती है। उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार, समाज और शिक्षा संस्थान इस बदलाव पर शोध करें और नीति निर्माण की दिशा में कदम उठाएं।

भाषा को लेकर कटुता भारत की संस्कृति नहीं

राज्यपाल रवि ने language dispute के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भाषा के नाम पर टकराव होना भारत की परंपरा नहीं है। आजादी के बाद देश में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो linguistic identity के नाम पर विभाजन की कोशिशें हुईं, जिसे कुछ लोगों ने linguistic nationalism का नाम दिया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत सरकार का रुख हमेशा सभी भाषाओं को समान सम्मान देने का रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने कई मौकों पर यह कहा है कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं और उन्हें एक जैसा सम्मान मिलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यही विचार रखा है।

आबादी और पहचान की राजनीति बन सकती है विघटन का कारण

राज्यपाल ने यह भी कहा कि जब population change और identity politics एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो वे भविष्य में संकट पैदा कर सकते हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे इन परिवर्तनों की पहचान कर रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। इसके लिए proactive governance और inclusive policy-making की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि आज की चुनौतियां केवल सीमा पार से नहीं आतीं, कई बार वे अंदर से ही पनपती हैं। देश को टूटने के लिए किसी बाहरी ताकत की जरूरत नहीं होती, बल्कि आंतरिक असंतुलन ही सबसे बड़ा खतरा बनता है।

समाधान की दिशा में होनी चाहिए नीति और शोध

राज्यपाल रवि ने छात्रों और शिक्षाविदों से अपील की कि वे इन मुद्दों को गहराई से समझें और अपने शोध कार्य में शामिल करें। National Defence University जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समाज के सामने मौजूद चुनौतियों पर अध्ययन करें और policy intervention का मार्ग प्रशस्त करें।

उन्होंने कहा कि आज अगर हम चुप रहे, तो भविष्य में यह चुप्पी बहुत भारी पड़ सकती है। देश को हर क्षेत्र में संतुलन की आवश्यकता है—चाहे वह भाषा हो, जनसंख्या हो या पहचान।

राज्यपाल आरएन रवि की यह चेतावनी किसी सतही विवाद का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता को उजागर करती है। उनका मानना है कि देश की एकता केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता और समरसता से सुनिश्चित होती है।

असम, बंगाल और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में हो रहे जनसंख्या परिवर्तन को केवल जनगणना का विषय मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। यह वह समय है जब नीति निर्माता, शिक्षाविद और समाज के जागरूक नागरिक मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करें।

देश को यदि आने वाले 50 वर्षों तक मजबूत बनाए रखना है, तो आज ही ऐसे मुद्दों पर संवाद, शोध और समाधान की आवश्यकता है।

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