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क्या एक विधायक पांच साल में अपने क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है?

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KKN ब्यूरो। विधायक के पास अपने विधानसभा क्षेत्र के लिए 5 वर्षों में 20 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं की अनुशंसा करने का अवसर होता है। 20 करोड़ रुपये कोई छोटी रकम नहीं है। लेकिन अब दूसरा सवाल— क्या 20 करोड़ रुपये से एक पूरा विधानसभा क्षेत्र बदल सकता है? जवाब है—अकेले इस राशि से नहीं। यहीं बिहार के विधायक की असली कहानी शुरू होती है। क्योंकि आम धारणा यह है कि विधायक के पास एक बड़ी रकम आती है और वह अपने इलाके में सड़क, नाला, भवन, चबूतरा, पुलिया जैसी चीजें बनवा सकता है। हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है। विधायक के पास केवल पैसा नहीं होता। उसके पास विधानसभा की आवाज, सवाल पूछने का अधिकार, सरकार को जवाबदेह बनाने का अवसर, विभागों तक पहुंच और अपने क्षेत्र की जरूरतों को राज्य की बड़ी योजनाओं से जोड़ने की राजनीतिक क्षमता भी होती है। यानी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि— “विधायक ने कितने करोड़ खर्च किए?” बल्कि सवाल होना चाहिए— “विधायक ने उपलब्ध संसाधनों से अपने क्षेत्र के लिए कितनी बड़ी विकास-व्यवस्था खड़ी की?”

विधायक निधि वास्तव में है क्या?

बिहार में इसे मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना कहा जाता है। यह विधायक को व्यक्तिगत रूप से मिलने वाला पैसा नहीं है। विधायक उस राशि का मालिक नहीं होता और न ही वह उसे अपने बैंक खाते में ले सकता है। व्यवस्था यह है कि विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों की अनुशंसा करता है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत संबंधित विभागीय तंत्र उन योजनाओं को स्वीकृत और क्रियान्वित करता है। योजना का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संतुलित विकास तथा आधारभूत संरचना का निर्माण है। वित्तीय वर्ष 2023-24 से प्रति विधानमंडल सदस्य सालाना अनुशंसा की सीमा 3 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 4 करोड़ रुपये की गई थी। 2025-26 के बिहार बजट दस्तावेज में भी मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत पूर्व अवधि की अनुशंसा और व्यय का उल्लेख मिलता है। इसका सीधा हिसाब है— 4 करोड़ × 5 वर्ष = 20 करोड़ रुपये। लेकिन यह तभी है जब पूरे पांच वर्षों में सालाना 4 करोड़ रुपये की वर्तमान सीमा बनी रहे और पूरी राशि की योजनाएं अनुशंसित एवं क्रियान्वित हो सकें। 2026 में बिहार विधानसभा में इस राशि को बढ़ाकर 5 करोड़ और 8 करोड़ रुपये करने की मांग भी उठी, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक और समकालीन स्रोतों के आधार पर वर्तमान सीमा 4 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष ही है।

इस 4 करोड़ से विधायक क्या कर सकता है?

यहां सबसे बड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है। विधायक अपनी मर्जी से कोई भी काम इस राशि से नहीं करा सकता। योजना की मार्गदर्शिका और विभागीय नियम यह निर्धारित करते हैं कि किन प्रकार के विकास कार्यों को लिया जा सकता है। व्यवहार में मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत सड़क, नाला, घाट, चबूतरा, विद्यालय कक्ष, सामुदायिक भवन, सामुदायिक शौचालय जैसी आधारभूत सुविधाओं के उदाहरण सामने आते हैं। हाल के उदाहरणों में सड़क, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट और यात्री शेड जैसी योजनाओं की अनुशंसा भी हुई है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सीमा भी है। हर छोटी समस्या का समाधान विधायक निधि से नहीं हो सकता। मसलन, किसी बड़े राजकीय अस्पताल की स्थापना, बड़े राज्य पथ का निर्माण, बड़ी सिंचाई परियोजना, विश्वविद्यालय या बड़े पुल का निर्माण केवल विधायक निधि से नहीं किया जा सकता। ऐसे कामों के लिए संबंधित विभाग के बजट, राज्य योजना, केंद्र प्रायोजित योजना या अन्य वित्तीय स्रोतों की आवश्यकता होती है। यहीं से अच्छे और साधारण विधायक के काम में फर्क पैदा होता है।

असली शक्ति 4 करोड़ रुपये नहीं, विधानसभा का मंच होता है

एक विधायक की सबसे बड़ी संवैधानिक भूमिका सिर्फ सड़क बनवाना नहीं है। वह विधानसभा में अपने क्षेत्र की समस्याओं को सरकारी जवाबदेही के प्रश्न में बदल सकता है। बिहार विधानसभा में तारांकित प्रश्न, अल्पसूचित प्रश्न और ध्यानाकर्षण जैसे संसदीय माध्यम उपलब्ध हैं। 2026 में भी विधानसभा की कार्यसूची में इन माध्यमों के जरिए सदस्यों के प्रश्न दर्ज हैं। इसके अलावा विधानसभा की विभिन्न समितियां भी हैं—लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति, प्रश्न एवं ध्यानाकर्षण समिति, याचिका समिति आदि। इसका अर्थ समझिए। यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में वर्षों से पुल नहीं बन रहा है, तो विधायक के पास सिर्फ विधायक निधि का विकल्प नहीं है। वह पूछ सकता है— योजना स्वीकृत क्यों नहीं हुई? पैसा कब जारी होगा? काम की समय सीमा क्या है? ठेकेदार ने काम क्यों रोका? विभागीय अधिकारी की जवाबदेही क्या है? क्या यह योजना राज्य बजट में शामिल की जा सकती है? यानी विधायक पैसा बांटने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राज्य की विकास मशीनरी को अपने क्षेत्र की ओर मोड़ने वाला जनप्रतिनिधि भी हो सकता है।

विधायक इसके अलावा क्या कर सकता है?

यही वह हिस्सा है जिसे जनता अक्सर नजरअंदाज कर देती है। एक विधायक अपने क्षेत्र के लिए— 1. बड़ी परियोजनाओं की अनुशंसा और पैरवी कर सकता है- सड़क, पुल, अस्पताल, महाविद्यालय, सिंचाई, बिजली, औद्योगिक क्षेत्र जैसी बड़ी योजनाओं को संबंधित विभागों के सामने लगातार उठा सकता है। 2. केंद्र और राज्य की योजनाओं को क्षेत्र तक पहुंचा सकता है- प्रधानमंत्री आवास, सड़क, सिंचाई, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, महिला समूह, पेयजल जैसी योजनाओं में क्षेत्र की वास्तविक जरूरतों के अनुसार प्रशासन से समन्वय कर सकता है। 3. विभागीय बाधाओं को विधानसभा में उठा सकता है- किसी योजना का पैसा अटका है, जमीन नहीं मिली, निविदा नहीं हुई, निर्माण रुक गया—इन सवालों को सदन में ले जाया जा सकता है। 4. विकास की प्राथमिकताएं तय कर सकता है- यदि विधायक अपने क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्याओं की सूची ही नहीं बनाएगा, तो 4 करोड़ रुपये छोटे-छोटे कार्यों में बिखर सकते हैं। 5. निगरानी कर सकता है- सिर्फ शिलान्यास नहीं। काम की गुणवत्ता, समय सीमा और उपयोगिता पर नजर रखना भी जनप्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ग्रामीण कार्य विभाग स्वयं सड़क निर्माण में गुणवत्ता, निरीक्षण, परीक्षण, माप और रखरखाव की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

आदर्श विधायक का पहला काम क्या होना चाहिए?

निधि बांटना नहीं—अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास का मानचित्र बनाना होगा। मान लीजिए किसी विधायक ने चुनाव जीतने के बाद पहले 100 दिनों में पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया। हर पंचायत। हर वार्ड। हर गांव। हर टोला। हर विद्यालय। हर स्वास्थ्य केंद्र। हर सड़क। हर नाला। हर पुलिया। हर जलस्रोत। हर बिजली संबंधी समस्या। हर बड़े बाजार। हर सिंचाई क्षेत्र और फिर इन समस्याओं को आंकड़ों में दर्ज किया। तो उसके पास पांच साल के लिए एक वास्तविक विकास खाका तैयार हो सकता है।

पांच साल का आदर्श विकास खाका कैसा हो?

इसे पांच चरणों में समझिए। पहला वर्ष—इलाके का एक्स-रे करना चाहिए। मतलब पहले वर्ष में पैसा खर्च करने की जल्दबाजी से अधिक जरूरी है समस्या की पहचान करना। जैसे कहां सड़क चाहिए? कहां जल निकासी? कहां विद्यालय भवन? कहां स्वास्थ्य सुविधा? कहां सिंचाई? कहां बाजार? कहां बाढ़? कहां रोजगार? कहां पलायन? यानी आधारभूत सर्वेक्षण होना चाहिए। दूसरा वर्ष—बुनियादी ढांचे पर प्रहार करना होगा। मतलब दूसरे वर्ष का केंद्र होना चाहिए— सड़क + जल निकासी + पेयजल + बिजली + सिंचाई। लेकिन सड़क केवल सड़क नहीं होती। अच्छी सड़क बाजार तक पहुंचती है। बाजार किसान की उपज तक पहुंचता है। उपज आय में बदलती है। आय शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंचती है। यानी एक सड़क कई आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ बन सकती है। तीसरा वर्ष—मानव विकास केन्द्रित होना चाहिए। मतलब तीसरे वर्ष में ध्यान केवल ईंट-पत्थर से हटकर इंसान पर होना चाहिए। विद्यालयों की स्थिति। पुस्तकालय। खेल मैदान। कौशल प्रशिक्षण। स्वास्थ्य केंद्र। महिला समूह। युवा रोजगार। बच्चों की पोषण स्थिति। यहां विधायक निधि से अधिक महत्वपूर्ण होगा—संबंधित विभागों के बजट को अपने क्षेत्र तक खींचना। चौथा वर्ष—स्थानीय अर्थव्यवस्था का हो। अब सवाल होना चाहिए— “इस क्षेत्र में रोजगार कहां से पैदा होगा?” कृषि आधारित उद्योग। दुग्ध उत्पादन। मछली पालन। मखाना। फल-सब्जी प्रसंस्करण। हस्तशिल्प। छोटे उद्योग। स्थानीय बाजार। पर्यटन। यदि विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक विशिष्ट नक्शा तैयार हो जाए तो विधायक राज्य सरकार के उद्योग, कृषि और ग्रामीण विकास विभागों के सामने अधिक ठोस प्रस्ताव रख सकता है। पांचवां वर्ष—परिणाम की परीक्षा होगी। पांचवें वर्ष में विधायक को खुद अपने क्षेत्र के सामने एक रिपोर्ट रखनी चाहिए— 5 वर्षों में क्या तय हुआ? क्या पूरा हुआ? कितना पैसा आया? कितना खर्च हुआ? कितनी योजनाएं अधूरी हैं? कौन-सी बड़ी परियोजनाएं अभी बाकी हैं? अगले 5 वर्षों की सबसे बड़ी जरूरत क्या है? यही वास्तविक जवाबदेही होगी।

बीस करोड़ रुपये को कैसे खर्च किया जाए?

इसका कोई एक सार्वभौमिक प्रतिशत तय करना उचित नहीं होगा, क्योंकि हर विधानसभा क्षेत्र की जरूरत अलग होती है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में जल निकासी और तट संरक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है। शहरी क्षेत्र में नाला और यातायात। कृषि क्षेत्र में सिंचाई और ग्रामीण संपर्क। सीमावर्ती क्षेत्र में सड़क और बाजार संपर्क। औद्योगिक क्षेत्र में आधारभूत संरचना। इसलिए एक ही ढांचा सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों पर थोपना उचित नहीं होगा। लेकिन एक सिद्धांत जरूर होना चाहिए— हर योजना का चयन स्थानीय आंकड़ों, उपयोगिता, जनसंख्या और दीर्घकालिक प्रभाव के आधार पर हो।

छोटी-छोटी योजनाओं का जाल

यदि 20 करोड़ रुपये पांच वर्षों में ऐसे कार्यों में बिखर जाएं जिनका व्यापक प्रभाव नहीं है, तो पांच साल बाद बहुत सारे उद्घाटन दिखाई दे सकते हैं, लेकिन क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन नहीं होगा। दूसरी ओर यदि वही राशि उन परियोजनाओं में लगाई जाए जो शिक्षा, संपर्क, जल निकासी, सामुदायिक सुविधा या स्थानीय अर्थव्यवस्था की किसी बड़ी कमी को भरती हों, तो प्रभाव अलग हो सकता है। यही कारण है कि विधायक निधि को विकास का पूरा बजट समझना मूल रूप से भूल माना जायेगा। यह तो एक औजार है। असल कुशलता इस बात में है कि विधायक इस औजार को राज्य और केंद्र की बड़ी योजनाओं के साथ कैसे जोड़ता है।

सीमा से बाहर की असली लड़ाई

एक विधायक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल होना चाहिए— “मेरे क्षेत्र में सरकार का कुल कितना पैसा खर्च हो रहा है?” न कि केवल— “मेरी विधायक निधि से कितना खर्च हुआ?” यदि विधायक अपने क्षेत्र में सड़क के लिए ग्रामीण कार्य विभाग, सिंचाई के लिए जल संसाधन विभाग, विद्यालय के लिए शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य केंद्र के लिए स्वास्थ्य विभाग, उद्योग के लिए उद्योग विभाग और कृषि के लिए कृषि विभाग से योजनाएं खिंचवा सके, तो उसके क्षेत्र में आने वाला कुल विकास निवेश विधायक निधि से कई गुना हो सकता है। बिहार सरकार स्वयं दीर्घकालिक विकास के लिए साक्ष्य-आधारित नीति, योजनाओं की निगरानी और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता रेखांकित कर रही है। यही वह जगह है जहां एक विधायक की राजनीतिक क्षमता विकास की वास्तविक पूंजी बन सकती है।

विधायक का मूल्यांकन कैसे करना चाहिए?

शायद यह सबसे अहम सवाल है। केवल यह मत पूछिए— “कितनी सड़कें बनीं?” पूछिए— क्षेत्र की सबसे बड़ी 10 समस्याएं कौन-सी हैं? उनका कोई लिखित विकास खाका है या नहीं? पांच साल में कितनी बड़ी योजनाएं विभागीय बजट में आईं? विधायक ने विधानसभा में क्षेत्र के कितने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए? कितनी योजनाएं पूरी हुईं? कितनी अधूरी हैं? गुणवत्ता की निगरानी कैसे हुई? विधायक निधि का कितना हिस्सा किस प्रकार की परिसंपत्तियों पर गया? क्या योजनाओं का सार्वजनिक विवरण उपलब्ध है? क्या पांच साल बाद क्षेत्र की मूल समस्या पहले से कम हुई? यही सवाल विधायक की वास्तविक भूमिका को समझने का रास्ता खोलते हैं।

विधायक के पास ज्यादा बड़ी चीज क्या होती है

बिहार में वर्तमान व्यवस्था के अनुसार 4 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष की सीमा पर पांच साल का गणित 20 करोड़ रुपये बैठता है। लेकिन किसी विधानसभा क्षेत्र के विकास की असली कहानी 20 करोड़ रुपये से कहीं बड़ी है। विधायक निधि से सड़क बन सकती है। लेकिन सड़क के साथ रोजगार लाने के लिए विभागीय योजना चाहिए। निधि से भवन बन सकता है। लेकिन उसमें शिक्षक, चिकित्सक या सेवा पहुंचाने के लिए सरकार की दूसरी व्यवस्था चाहिए। निधि से नाला बन सकता है। लेकिन पूरे क्षेत्र की जल निकासी के लिए व्यापक जल-प्रबंधन योजना चाहिए। यानी विधायक की असली ताकत उसके पास रखे धन में नहीं, बल्कि धन, नीति, प्रशासन और जनता—इन चारों को एक दिशा में जोड़ने की क्षमता में है। एक आदर्श विधायक के लिए पांच साल का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज शायद उसकी विकास निधि की सूची नहीं, बल्कि अपने विधानसभा क्षेत्र का सार्वजनिक विकास खाका होना चाहिए। जिसमें लिखा हो— समस्या क्या है? समाधान क्या है? पैसा कहां से आएगा? जिम्मेदार विभाग कौन है? समय सीमा क्या है और पांच साल बाद परिणाम कैसे मापा जाएगा? तभी विधायक केवल निर्माण कराने वाला जनप्रतिनिधि नहीं रहेगा। वह अपने विधानसभा क्षेत्र का विकास-समन्वयक और जवाबदेही का प्रहरी बन सकता है और शायद बिहार की राजनीति में असली बदलाव भी यहीं से शुरू होगा— विधायक निधि की राजनीति से निकलकर विकास की राजनीति की ओर बढ़ना होगा।

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