जब सड़क टूटती है, तो केवल डगर नहीं बिखरता…
KKN ब्यूरो। बारिश की पहली फुहार पड़ती है और सड़क की काली सतह पर दरारों की महीन लकीरें उभरने लगती हैं। कुछ ही दिनों में वही दरारें गड्ढों में बदल जाती हैं। फिर शुरू होता है धूल, कीचड़, दुर्घटनाओं और सरकारी दावों का अंतहीन सिलसिला। बिहार में यह दृश्य नया नहीं है। गांव की संपर्क सड़क हो या जिला मुख्यालय को जोड़ने वाला मार्ग, कहीं न कहीं यह सवाल बार-बार सिर उठाता है—जिस सड़क के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, वह दो-तीन मानसून भी क्यों नहीं झेल पाती? यह सवाल केवल यात्रियों की असुविधा का नहीं है। यह सार्वजनिक धन, इंजीनियरिंग की गुणवत्ता, प्रशासनिक जवाबदेही और विकास मॉडल की विश्वसनीयता का प्रश्न है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले दो दशकों में बिहार ने सड़क नेटवर्क के विस्तार में उल्लेखनीय प्रगति की है। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार हुआ, ग्रामीण संपर्क मार्ग बढ़े, कई नए पुल बने और अनेक गांव पहली बार हर मौसम में सड़क से जुड़े। लेकिन दूसरी ओर, समय से पहले उखड़ती सड़कों और बार-बार होने वाली मरम्मत ने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि क्या हम टिकाऊ सड़कें बना रहे हैं, या केवल नई सड़कें? KKN Live की यह खोजी पड़ताल किसी एक सड़क या एक ठेकेदार की कहानी नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की परतें खोलने का प्रयास है, जहां डिज़ाइन, टेंडर, निर्माण, निगरानी, रखरखाव और यातायात—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
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क्या हर टूटी सड़क भ्रष्टाचार की कहानी होती है?
जनमानस में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि सड़क टूटी है, तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार हुआ होगा। लेकिन इंजीनियरिंग की दुनिया इतनी सरल नहीं है। किसी सड़क की आयु कई बातों पर निर्भर करती है— डिज़ाइन किस मानक पर तैयार हुआ? मिट्टी की जांच (Soil Investigation) कितनी वैज्ञानिक थी? सड़क पर अनुमानित और वास्तविक यातायात में कितना अंतर है? जल निकासी (Drainage) की व्यवस्था कैसी है? निर्माण सामग्री मानक के अनुरूप थी या नहीं? निर्माण के बाद समय पर रखरखाव हुआ या नहीं? यानी हर खराब सड़क भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं होती। लेकिन यदि एक ही तरह की समस्या बार-बार अलग-अलग परियोजनाओं में दिखाई दे, तो सवाल केवल तकनीकी नहीं रह जाता, बल्कि प्रशासनिक भी बन जाता है।
बिहार ने सड़कें तो बनाईं, लेकिन क्या रखरखाव उतना ही मजबूत रहा?
सड़क निर्माण को लेकर बिहार की कहानी दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक दौर वह था जब राज्य की सड़क व्यवस्था को देश की सबसे खराब व्यवस्थाओं में गिना जाता था। इसके बाद बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण हुआ। ग्रामीण संपर्क मार्गों का जाल बिछा। कई आर्थिक गतिविधियों को गति मिली। इस बदलाव से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सड़क निर्माण केवल पहला चरण है। दूसरा और अधिक कठिन चरण है—रखरखाव। विश्व बैंक और भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) लंबे समय से यह रेखांकित करते रहे हैं कि समय पर रखरखाव न होने पर सड़क की आयु तेजी से घटती है। एक छोटी दरार यदि समय पर भर दी जाए, तो वह वर्षों तक सड़क को सुरक्षित रख सकती है। लेकिन वही दरार यदि मानसून तक खुली रह जाए, तो पानी पूरी संरचना को कमजोर कर देता है। यही कारण है कि विकसित देशों में सड़क का रखरखाव, निर्माण जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
CAG की रिपोर्ट क्या कहती है?
यदि केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए, तो रिपोर्ट अधूरी होगी। इसलिए KKN Live ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों का अध्ययन किया। CAG की बिहार संबंधी विभिन्न ऑडिट रिपोर्टों में ग्रामीण सड़क परियोजनाओं और अवसंरचना कार्यों के संदर्भ में योजना निर्माण, भूमि उपलब्धता, परियोजना प्रबंधन, निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़ी कमियों की ओर संकेत किया गया है। एक मामले में पर्याप्त पूर्व तैयारी और भूमि उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना उच्च स्तरीय पुल का निर्माण शुरू होने से ₹3.33 करोड़ का व्यय निष्प्रभावी (Idle Expenditure) हो गया। यह उदाहरण बताता है कि केवल निर्माण की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि परियोजना की योजना और क्रियान्वयन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि CAG हर सड़क को घटिया नहीं बताता। उसका काम यह देखना होता है कि जहां सार्वजनिक धन खर्च हुआ, वहां नियमों, प्रक्रियाओं और योजना का पालन हुआ या नहीं। इसलिए उसकी टिप्पणियां व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को समझने का महत्वपूर्ण आधार बनती हैं।
सड़क समय से पहले क्यों टूटती है?
सिविल इंजीनियरों के अनुसार सड़क की सबसे बड़ी दुश्मन केवल बारिश नहीं, बल्कि पानी और भार (Water + Load) का संयुक्त प्रभाव है। यदि सड़क के नीचे की परतों तक पानी पहुंच जाए और उसी समय उस पर क्षमता से अधिक भार वाले ट्रक गुजरें, तो सड़क की संरचना तेजी से कमजोर होने लगती है। बिहार जैसे राज्यों में यह समस्या इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि— कई स्थानों पर जल निकासी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होती। मानसून लंबा और तीव्र होता है। कई मार्गों पर ओवरलोडेड ट्रकों की आवाजाही होती है। समय पर गड्ढों की मरम्मत नहीं हो पाती। यानी सड़क केवल ऊपर से नहीं टूटती; उसका क्षरण नीचे की परतों से शुरू होता है।
क्या ओवरलोडिंग भी एक बड़ी वजह है?
इंजीनियरिंग डिज़ाइन किसी अनुमानित भार के आधार पर तैयार किया जाता है। यदि सड़क को 20 टन भार के लिए डिज़ाइन किया गया हो और उस पर लगातार उससे कहीं अधिक वजन वाले वाहन चलें, तो उसकी आयु स्वाभाविक रूप से घट जाएगी। देश के विभिन्न हिस्सों में CAG और अन्य ऑडिट संस्थाओं ने समय-समय पर यह भी रेखांकित किया है कि सड़क डिज़ाइन के लिए यातायात और एक्सल लोड (Axle Load) का नियमित अध्ययन आवश्यक है। ऐसे अध्ययन न होने पर सड़क की संरचना वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं बन पाती।
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