होमHealthवर्ल्ड लंग डे 2025: स्मोकिंग करने वालों से ज्यादा बीमार हो रहे...

वर्ल्ड लंग डे 2025: स्मोकिंग करने वालों से ज्यादा बीमार हो रहे हैं महिलाएं और बच्चे

Published on

25 सितंबर को हर साल वर्ल्ड लंग डे मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य लोगों में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूकता फैलाना है। समय के साथ अब यह देखा जा रहा है कि महिलाएं, बच्चे और युवा वयस्क भी फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पहले केवल स्मोकर्स और बुजुर्ग लोग ही लंग डैमेज के शिकार होते थे, लेकिन अब इनसे कहीं ज्यादा महिलाएं और बच्चे इस खतरे का सामना कर रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें सेकेंड हैंड स्मोकिंग, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय कारक शामिल हैं।

महिलाओं और बच्चों में फेफड़ों की समस्या

फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का सामना अब स्मोकिंग करने वालों से ज्यादा महिलाएं और बच्चे कर रहे हैं। प्रदूषित शहरों में रहने वाले बच्चे और युवा वयस्क जीवनभर के लिए लंग डैमेज का शिकार हो रहे हैं। हालांकि, स्मोकिंग मुख्य कारण था, लेकिन अब प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोकिंग और किचन के धुएं जैसी समस्याओं के कारण महिलाएं और बच्चे भी इस गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। वर्ल्ड लंग डे का मुख्य उद्देश्य इन्हीं समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करना है ताकि लोग फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से लें।

प्रदूषण का बढ़ता खतरा

दिल्ली और एनसीआर जैसे बड़े शहरों में युवा वयस्कों के फेफड़े 12 से 17 प्रतिशत तक कम काम कर रहे हैं। यह प्रदूषण के कारण हो रहा है, जो इन क्षेत्रों में हर दिन बढ़ता जा रहा है। जो युवा वयस्क कभी स्मोक नहीं करते, वे भी प्रदूषण के कारण क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (COPD) जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। प्रदूषण के कारण शहरी इलाकों में बच्चों के लिए भी लंग डिसीज का खतरा ज्यादा हो गया है। बच्चों का श्वसन दर वयस्कों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है, जिससे वे जल्दी से प्रदूषित हवा और स्मोक को अपने फेफड़ों में भरते हैं, और इस कारण उनकी लंग डैमेज का खतरा बढ़ जाता है।

किचन का धुआं और ग्रामीण महिलाओं का खतरा

गांवों में रहने वाली महिलाओं के लिए फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं अक्सर कोयला, लकड़ी या उपले की आंच पर खाना पकाती हैं। इस तरह की पारंपरिक कुकिंग के दौरान उत्पन्न होने वाला धुआं कई सिगरेट पीने के बराबर होता है। महिलाओं को इस धुएं का लगातार सेवन करना पड़ता है, जिससे उनके फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। इस तरह के किचन धुएं में प्रदूषित गैसों और कार्बन मोनोऑक्साइड की उच्च मात्रा होती है, जो फेफड़ों के लिए अत्यधिक हानिकारक होती है।

पैसिव स्मोकिंग और ट्रैफिक पॉल्यूशन

शहरों में रहने वाली महिलाओं के लिए पैसिव स्मोकिंग भी फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने का एक बड़ा कारण है। जब महिलाएं घरों या कार्यस्थलों पर ट्रैफिक पॉल्यूशन और स्मोकिंग के धुएं का शिकार होती हैं, तो उनके फेफड़ों पर इसका सीधा असर पड़ता है। ये महिलाएं खुद स्मोक न करने के बावजूद सेकेंड हैंड स्मोक से प्रभावित होती हैं। इसके कारण खांसी, अस्थमा और अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जो धीरे-धीरे फेफड़ों की सेहत को नुकसान पहुंचाती हैं।

महिलाओं की लापरवाही और देर से इलाज

महिलाएं अक्सर फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं को लंबे समय तक नजरअंदाज करती हैं। वे खांसी, सांस लेने में दिक्कत या थकान जैसी समस्याओं को उम्र या कमजोरी से जोड़ देती हैं और इन्हें हलके में लेती हैं। जबकि यह संकेत कई बार लंग डिसीज की ओर इशारा करते हैं। जब महिलाएं देर से इलाज करवाती हैं, तो इससे लंग डैमेज और भी बढ़ जाता है। समय पर इलाज करने से लंग डैमेज को कम किया जा सकता है, लेकिन लापरवाही से स्थिति और जटिल हो सकती है।

केमिकल क्लीनर्स का प्रभाव

घर के अंदर काम करने वाली महिलाओं को कई बार केमिकल क्लीनर्स के धुएं से भी फेफड़ों की समस्याएं हो सकती हैं। इन क्लीनर्स में मौजूद रासायनिक पदार्थों से सांस लेने में परेशानी, जलन, खांसी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। अगर इसे नजरअंदाज किया जाए, तो यह लंग डैमेज का कारण बन सकता है। घरों में सफाई करते वक्त इन केमिकल्स से बचने के लिए एहतियात बरतना जरूरी है।

समाधान और जागरूकता की आवश्यकता

वर्ल्ड लंग डे 2025 के अवसर पर, यह महत्वपूर्ण है कि हम फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाएं। प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोकिंग, किचन धुएं और केमिकल्स के कारण महिलाओं और बच्चों में फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। इस पर ध्यान देने और इन खतरों से बचने के उपायों को समझने की आवश्यकता है। यह जरूरी है कि हम शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों पर ध्यान दें और घरों में सुरक्षित कुकिंग और सफाई के तरीके अपनाएं।

साथ ही, सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को महिलाओं और बच्चों के लिए फेफड़ों की सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। यह जरूरी है कि लोग सांस लेने में किसी भी प्रकार की समस्या को हल्के में न लें और समय रहते इलाज करवाएं।

वर्ल्ड लंग डे 2025 हमें याद दिलाता है कि फेफड़ों की सुरक्षा और स्वास्थ्य केवल स्मोकर्स के लिए ही नहीं, बल्कि सभी के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोकिंग और अन्य पर्यावरणीय कारकों के कारण महिलाओं और बच्चों का लंग डैमेज होने का खतरा बढ़ गया है। इन मुद्दों को समझकर और उनके खिलाफ जागरूकता बढ़ाकर हम फेफड़ों की सेहत को बेहतर बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों को लंग डैमेज से बचा सकते हैं।

Read this article in

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

KKN Public Correspondent Initiative


Discover more from

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Latest articles

ग्रामीण सड़कों के ‘जानलेवा’ स्पीड ब्रेकर: सुरक्षा के नाम पर जनता की जेब और सेहत पर हमला?

KKN ब्यूरो। ग्रामीण भारत में पक्की सड़कों का जाल तेजी से बिछा है। प्रधानमंत्री...

बिहार के किसान और बेरोजगार: आखिर क्या है असली समाधान?

बिहार की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी नहीं, आय की कमी है KKN ब्यूरो। बिहार की...

योग दिवस विशेष | देवनारायण राय से जानिए योग का विज्ञान, लाभ और स्वस्थ जीवन का रहस्य

क्या योग केवल व्यायाम है, या फिर यह स्वस्थ और संतुलित जीवन का विज्ञान...

भरत तिवारी एनकाउंटर: कानून का सवाल, जाति की बहस और सच की तलाश

KKN ब्यूरो। भोजपुर के बिलौटी गांव का एक युवक...। फेसबुक लाइव...। पुलिस पर पिस्टल...

More like this

ग्रामीण सड़कों के ‘जानलेवा’ स्पीड ब्रेकर: सुरक्षा के नाम पर जनता की जेब और सेहत पर हमला?

KKN ब्यूरो। ग्रामीण भारत में पक्की सड़कों का जाल तेजी से बिछा है। प्रधानमंत्री...

बिहार में शराबबंदी: सामाजिक सुधार या भ्रष्टाचार की नई अर्थव्यवस्था?

क्या शराबबंदी सफल हुई या उसने भ्रष्टाचार को नया ईंधन दिया? KKN ब्यूरो। एक  अप्रैल...

क्या दुनिया बायोलॉजिकल वेपन के मुहाने पर खड़ी है?

सुपर पावरों की गुप्त प्रयोगशालाएं, अमेरिकी फंडिंग और मानव अस्तित्व पर मंडराता नया खतरा KKN...

ईरान के सामने अमेरिका कितना सफल रहा?

क्या दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति सीमित हो चुकी है? KKN ब्यूरो। जब भारत...

क्या अमेरिका भारत का भरोसेमंद साझेदार है?

दोस्त, साझेदार या सिर्फ अपने हितों का प्रहरी? KKN ब्यूरो। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थायी...

श्रेष्ठता का भ्रम: जब गाली, दोषारोपण और अपमान बन जाते हैं सामाजिक फैशन

क्या दूसरों को नीचा दिखाकर कोई वास्तव में बड़ा बन सकता है? KKN ब्यूरो। आज...

हिन्दी पत्रकारिता: मिशन से बाज़ार तक का सफर

क्या हिन्दी पत्रकारिता आज भी जनता की आवाज़ है? हिन्दी पत्रकारिता दिवस विशेष KKN ब्यूरो। क्या...

भारत–बांग्लादेश सीमा पर तेज हुई फेंसिंग, लेकिन क्यों बढ़ रहा है तनाव?

KKN ब्यूरो। भारत ने बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह सुरक्षित बनाने की दिशा में...

“हाँ इश्क है” के लोकार्पण समारोह में जुटे कवि और साहित्य प्रेमी, पटना में दिखा साहित्य का रंग

पटना में रविवार को साहित्य, कविता और रचनात्मक अभिव्यक्ति का एक यादगार आयोजन देखने...

क्या पेट्रोलियम संकट की तरफ बढ़ रहा है भारत?

मिडिल ईस्ट की आग, अमेरिका की शांति वार्ता और भारत पर मंडराता खतरा KKN ब्यूरो।...

क्या ट्रंप हार गए ईरान से? स्ट्रेट ऑफ हार्मुज पर संकट, चीन की एंट्री और भारत के लिए बड़ा खेल

KKN ब्यूरो। क्या सच में Donald Trump ईरान के सामने झुक गए? क्या अमेरिका...

क्या ईरान सिर्फ एक देश है या एक ऐसी रणनीति, जिसे हराना नामुमकिन है?

KKN ब्यूरो। क्या आपने कभी सोचा है… कि दशकों से प्रतिबंध झेल रहा एक...

ट्रंप की दादागिरी का असली चेहरा अब दुनिया के सामने है

KKN ब्यूरो। क्या अमेरिका मिडिल ईस्ट में फंस चुका है? क्या ट्रंप की ‘दादागिरी’...

अफगानिस्तान का नूर खान एयरबेस पर हमला: पाकिस्तान को दिया गया एक रणनीतिक संदेश

KKN ब्यूरो। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो केवल...

क्या दुनिया एक और हिरोशिमा मोमेंट की ओर बढ़ रही है?

KKN ब्यूरो। क्या दुनिया को पता भी है कि मिडिल ईस्ट में चल रही...