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शारदीय नवरात्रि शुभ शुरुआत कल से, जानिए कलश स्थापना मुहूर्त और पूजा विधि

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Sharadiya Navratri 2025 का शुभारंभ इस वर्ष 22 सितंबर से हो रहा है। यह पावन पर्व दस दिनों तक मनाया जाएगा। नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना होगी और दसवें दिन विजयादशमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा।

इस बार नवरात्र का विशेष संयोग भी बन रहा है। चतुर्थी तिथि दो दिन की होगी और माता दुर्गा का आगमन हाथी और डोली, दोनों रूपों में माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि यह स्थिति अत्यंत शुभ फल देने वाली होती है।

कलश स्थापना का महत्व

नवरात्रि के पहले दिन Kalash Sthapana यानी घटस्थापना सबसे प्रमुख अनुष्ठान है। इसे शुभ मुहूर्त में करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।

कलश स्थापना से घर और मंदिर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भक्त मानते हैं कि सही विधि से की गई स्थापना सुख, शांति और समृद्धि लेकर आती है।

कलश स्थापना मुहूर्त

Kalash Sthapana Muhurat इस वर्ष 22 सितंबर को सुबह 6:27 बजे से 8:16 बजे तक रहेगा। यह अवधि 1 घंटा 48 मिनट की है।

इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त भी उपलब्ध रहेगा। यह समय दोपहर 12:07 बजे से 12:55 बजे तक का है। यदि कोई भक्त सुबह का समय न ले पाए तो वह अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना कर सकता है।

कलश स्थापना की विधि

कलश स्थापना की विधि शुद्धता और आस्था के साथ पूरी की जाती है। सबसे पहले पूजा स्थल को साफ किया जाता है।

फिर तांबे, पीतल, स्टील या मिट्टी के कलश में शुद्ध जल भरा जाता है। इस जल में चावल, हल्दी, फूल, बेल पत्र और दूर्वा डाली जाती है।

इसके बाद नारियल रखकर कलश को लाल या पीले कपड़े से सजाया जाता है। स्थापना के समय माता दुर्गा और भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करना शुभ होता है।

भक्त “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र का उच्चारण करते हैं। कलश के चारों ओर दीपक जलाकर हल्दी और अक्षत की आहुति दी जाती है। इसे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचारक माना जाता है।

आवश्यक सामग्री

कलश स्थापना के लिए कुछ सामग्री अनिवार्य होती है:

  • कलश (तांबा, पीतल, स्टील या मिट्टी का)

  • शुद्ध जल या गंगाजल

  • नारियल

  • ताजे फूल

  • चावल और हल्दी

  • दूर्वा और बेल पत्र

  • पान के पत्ते

  • लाल या पीला कपड़ा

  • सिंदूर / कुमकुम

  • दीपक (मिट्टी या तेल का)

  • प्रसाद (फल, लड्डू या मिठाई)

  • चौकी या थाल (कलश रखने के लिए)

उपवास और नियम

नवरात्रि में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास को मानसिक शुद्धि और आत्मिक उत्थान का माध्यम माना गया है।

उपवास के दौरान भक्त फल, दूध, साबूदाना, मखाने और कुट्टू का सेवन करते हैं। मांसाहार, शराब और अशुद्ध वस्तुओं का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है।

भक्तों का मानना है कि उपवास से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं और साधना अधिक प्रभावी बनती है।

नौ रूपों की पूजा

नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। पहले दिन शैलपुत्री से शुरुआत होती है और नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

हर दिन एक अलग देवी की आराधना से विशेष फल प्राप्त होता है। भक्त घर और मंदिरों में सुबह-शाम आरती करते हैं और माता को प्रसाद अर्पित करते हैं।

दसवें दिन विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है, जब बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक रावण दहन होता है।

क्षेत्रीय उत्सव

भारत के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्रि अलग अंदाज़ में मनाई जाती है। उत्तर भारत में रामलीला का मंचन होता है और दशहरा भव्य रूप से मनाया जाता है।

गुजरात में गरबा और डांडिया रात्रि भर चलते हैं। पश्चिम बंगाल में यह Durga Puja के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ पंडालों में भव्य प्रतिमाएँ स्थापित होती हैं।

दक्षिण भारत में घरों में Golu सजाया जाता है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं और सांस्कृतिक विषयों की झलक मिलती है।

हाथी और डोली पर माता का आगमन

इस वर्ष माता दुर्गा का आगमन हाथी और डोली पर माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार हाथी पर आगमन समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है।

वहीं, डोली पर आगमन को शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। दोनों का संयोजन भक्तों के लिए इस बार का नवरात्र और भी खास बना रहा है।

आध्यात्मिक महत्व

नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं है, बल्कि यह साधना और आत्म चिंतन का भी अवसर है।

माता दुर्गा के नौ रूप साहस, शुद्धता, ज्ञान और संपन्नता के प्रतीक हैं। उनकी आराधना से भक्तों को इन गुणों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है।

उपवास और पूजा के माध्यम से भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध कर दिव्य ऊर्जा के करीब पहुँचते हैं।

आधुनिक युग में नवरात्रि

आज के समय में नवरात्रि का उत्सव डिजिटल रूप से भी मनाया जा रहा है। कई मंदिर ऑनलाइन पूजा और आरती का प्रसारण करते हैं।

सोशल मीडिया पर भक्त नवरात्रि की शुभकामनाएँ, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम साझा करते हैं। इससे देश-विदेश में बसे लोग भी इस पर्व से जुड़े रहते हैं।

Sharadiya Navratri 2025 22 सितंबर से शुरू हो रहा है और दस दिनों तक चलेगा। इस दौरान नौ देवी रूपों की पूजा, उपवास और सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।

पहले दिन की Kalash Sthapana पूरे पर्व की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सही मुहूर्त में कलश स्थापना से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा आती है।

माता दुर्गा का इस वर्ष हाथी और डोली पर आगमन विशेष शुभ संकेत दे रहा है। यह पर्व आस्था, संस्कृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है, जो समाज को एकता और शक्ति का संदेश देता है।

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