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तमिल की राजनीति में स्टार वार के आसार

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तमिलनाडु। सवाल यह नही है कि तमिल की राजनीति में ब्रांड कमल चलेगा या ब्रांड रजनी? सवाल यह भी है कि क्या सियासत के गलियारे में ये सितारे अस्त हो जाएंगे? जाहिर है सवाल बड़ा है और जवाब फिलहाल पता नहीं है।

बहरहाल, रजनीकांत के करिश्मे और कमल हासन के स्टारडम को तौलने का काम जारी है। फिल्म के जानकार इनका राजनीतिक कद आंक रहे हैं और राजनीति के जानकार इनका फिल्मी कद आंकने में लगें हैं। जाहिर है कि तमिलनाडु की राजनीति इस वक्त एक्शन और ड्रामा की तरह आगे बढ़ रही है। इन दोनों सुपर ब्रांड्स के स्टाइल, करिश्मे, फैन फॉलोइंग, विचारधारा और राजनीतिक समझ का चटखारेदार आकलन हो रहा है और यह सिलसिला आगे भी जारी रहने के संकेत से इनकार नही किया जा सकता है।
बतातें चलें कि रूपहले पर्दे पर गरीबों के हक हकूक की बात करने वाला रजनी सियासत में आते ही आध्यात्मिक हो गया। रजनीकांत इस वक्त भाजपा के भगवा ब्रिगेड के करीब नजर आने लगें हैं। दूसरी तरफ रूपहले पर्दे का एक नास्तिक किरदार कमल हासन को राजनीति में धर्म का घालमेल आज भी स्वीकार नहीं है। वह द्रविण विचारधारा को लेकर मैदान में जोर आजमाइस करना चाहतें हैं। जाहिर है कि उनकी राजनीति का रंग भगवा नहीं होगा। स्मरण रहे कि इससे पहले भी वह वाम नेताओं के प्रति अपनी श्रद्धा जाहिर कर चुके हैं। अब जबकि, तमिल फिल्मों के ये दोनों सुपर सितारे राजनीति के मैदान में दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। तो, मुकाबला जोरदार होना तय माना जा रहा है।
इस सुपर-डुपर मुकाबले में बाद में उतरने वाले कमल हासन ज्यादा तेजी से मोहरे चल रहे हैं। मुकाबले में वे तमिल अस्मिता को ले आए हैं। एक मैगजीन के अपने कॉलम के जरिये उन्होंने तमिल समुदाय को साधने की कोशिश की। उन्होंने कॉलम में एपीजे अब्दुल कलाम व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी जिक्र किया। साथ ही तमिल अस्मिता का मुद्दा उठाते हुए संघर्ष की बात भी की। इस कलाकार ने इशारों में बता दिया कि वे तो तमिल हैं पर रजनीकांत तमिल नहीं, मराठी हैं। इसके पहले जल्लीकट्टू आंदोलन में भी वह तमिल अभिव्यक्ति के प्रवक्ता की तरह ही नजर आए थे। कुल मिलाकर कमल हासन खुलकर खेल रहे हैं।
वहीं रजनीकांत अपने अगले कदम के लिए विधानसभा चुनाव का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन, अभी हाल में ही हुए सर्वे में रजनीकांत के बारे में कहीं बेहतर ओपिनियन उभर कर सामने आई है। सर्वे के मुताबिक अगर अभी चुनाव हों तो रजनीकांत को 234 विधानसभा सीटों में से 33 सीटो पर बढ़त मिल सकती है। सर्वे की माने तो रजनी को 16 फीसदी वोट पर जबरदस्त पकड़ है और वे किंगमेगर भी साबित हो सकते हैं। राजनीति में प्रवेश के साथ ही मामूली नजर आ रहे ये नतीजे किसी भी तरह से कम नहीं हैं। सर्वे के अनुसार 53 फीसद लोग यह भी मानते हैं कि रजनीकांत राजनीति में सफल होंगे। वहीं सर्वे में कमल हासन का कोई खास प्रभाव नहीं नजर आया है।
हालांकि, जानकार यह भी कहने लगे है कि सर्वे तो सर्वे होता हैं। राजनीतिक धारा कब बदल जाये, कहना बेहद ही मुश्किल है। सर्वें में ये राय इसलिए भी उभरी है क्योंकि रजनीकांत की फैन फॉलोइंग बहुत बड़ी है, जो उन्हें टिकाऊ आधार देती है। फिलहाल तो कमल हासन लम्बी पारी खेलने को तैयार हैं और उनकी मंशा तमिल राजनीति और समाज के लिए एजेंडा तय करने की है। रजनीकांत हमेशा राजनीतिक विवादों से भी दूर रहे और सियासी मुद्दों पर द्वंद्व में फंसे रहे। एक बार सिर्फ उन्होंने डीएमके को समर्थन दिया। लेकिन, कमल हासन की राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट है, वे योजनाबद्ध हैं और राज्य व समाज से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता दिखाते हैं। अपने बेजोड़ करिश्में के बावजूद रजनीकांत के लिए ये तथ्य परेशान करने वाला है कि वे तमिल मूल के नहीं, बाहरी व्यक्ति हैं। भले ही एमजी रामचंद्रन और जयलिता को अपनाने वाले राज्य में ये बात बहुत मायने रखती न नजर आती हो पर उनकी गैरतमिल पहचान को तूफान खड़ा किया जा रहा है। खुद कमल हासन ने भी यही तार छेड़ा है। कमल हासन की पहचान भी एक बुद्धिजीवी और प्रभावशाली वक्ता की है। वहीं रजनीकांत का स्टाइल और जादू आज भी लोगो के सिर चढ़कर बोलता है। अपने दिवानों के बूते ही रजनीकांत अकेले दम पर चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि रजनीकांत का करिश्मा भारी पड़ता है या कमल हासन की राजनीतिक समझ?

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