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कोरोना जांच, गांव में उजागर हुई लापरवाही

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होम क्वरंटाइन में सुधि लेनेवाला कोई नहीं

KKN न्यूज ब्यूरो। बिहार के मुजफ्फरपुर में कोरोना जांच में की जा रही लापरवाही, अब सामने आने लगी है। जांच रिपोर्ट पर नाम किसी का होता है और मोबाइल नम्बर किसी और का होता है। ऐसे में समझ पाना मुश्किल हो रहा है कि जो रिपोर्ट आई है, वह किसका है? सिवाईपट्टी थाना के  नकनेमा गांव के एक समाजिक कार्यकर्ता ने जो आपबीती सुनाई, वह चौकाने वाली है। फिलहाल, वह होम क्वारंटाइन में है और पिछले एक सप्ताह से उसकी सुधि लेने कोई नहीं आया है। राहत की बात ये, कि रिपोर्ट  निगेटिव आई है और तबियत में सुधार जारी है।

 

समाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि 15 जुलाई को उसे अचानक बुखार हो गया और सर्दी के साथ खांसी होने लगा। मीनापुर अस्पताल पहुंच कर उसने अपना इलाज कराया। किंतु, तबियत में सुधार नहीं हुआ। बल्कि, स्थिति और बिगड़ने लगी। अब सर्दी, खांसी और बुखार के साथ शीरर में तेज दर्द और थकान महसूस होने लगा था। मीनापुर के डॉक्टर ने कोरोना जांच के लिए उसे 17 जुलाई को सदर अस्पताल रेफर कर दिया। कोरोना की बात आते ही उसके साथ जाने को कोई तैयार नहीं था। वह खुद से अपना कार ड्राइव करते हुए सदर अस्पताल पहुंच जाता है। सदर अस्पताल में सात अन्य लोग पहले से जांच कराने की प्रतीक्षा में बैठे थे। करीब तीन घंटे की लम्बी इंतजार के बाद लोगो ने हंगामा शुरू कर दिया। स्वास्थ्य कर्मचारी जांच करने से इनकार कर रहे थे। किंतु, बात को बिगड़ते देख बारी-बारी से सभी की जांच की गई।

इस बीच समाजिक कार्यकर्ता की तबियत और बिगड़ने लगा। थकान के साथ गंध और स्वाद की पहचान मुश्किल होने लगा था। सांस  लेने में तकलिफ होने लगा। तीन रोज बाद 20 जुलाई को रिपोर्ट निगेटिव आ गया। खेल देखिए, जांच रिपोर्ट पर नाम तो सही था किंतु, मोबाइल नम्बर किसी दुसरे का लिखा मिला। यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि इस रिपोर्ट पर भरोसा करें या नहीं? खैर, उहापोह में दो रोज और बीत गया। राहत की बात ये रही कि 22 जुलाई को तबियत में सुधार होने लगा था। हालांकि, इस बीच स्वास्थ्य विभाग का कोई कर्मचारी उनकी सुधि लेना मुनासिब नहीं समझा। पीड़ित समाजिक कार्यकर्ता ने खुद की सूझबूझ और दोस्तो की मदद से कई दवाओ का सेवन किया। पर, वह कितना सही था, इसको प्रमाणित करना फिलहाल मुश्किल है।

अब सरकारी अस्पताल की बानगी देखिए। मीनापुर अस्पताल के स्वास्थ्य प्रबंधक ने 13 जुलाई को अपना कोरोना जांच कराया। किंतु, क्वारंटाइन नहीं हुए और डिउटी करते रहे। दो रोज बाद 15 जुलाई को रिपोर्ट पॉजिटिव आ गया। इस बीच 18 जुलाई को मीनापुर अस्पताल के एक और डॉक्टर पॉजिटिव पाए गये। अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी समेत कुल 90 स्वास्थ्य कर्मी इनके संपर्क में थे। इसके बाद 16 जुलाई को सभी ने जांच कराने की इच्छा जाहिर कर दी। प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी ने सिविल सर्जन को पत्र लिख कर इसकी सूचना दी। छह रोज तक इनमें से किसी का जांच नहीं हो सका। हालांकि, 22 जुलाई को इनमें से 8 लोगो का मीनापुर अस्पताल में रैपिड एंटिजन जांच हुआ। राहत की बात ये कि सभी निगेटिव पाए गये है। इस बीच मीनापुर अस्पताल का ओपीडी चलता रहा। सैकड़ो लोग अस्पताल आए और इलाज के बाद अपने घर लौट गये। गौरकरने वाली बात ये कि स्वास्थ्य प्रबंधक का रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद मीनापुर अस्पताल को सैनेटाइज्ड करने में 48 घंटा से अधिक का वक्त लग गया। दरअसल, यह सरकारी अस्पताल है और जब इसका ये हाल है, तो आम लोगो की बात करना भी बेमानी होगा। यह तो चंद बानगी है। हालात बिगड़ा तो गांव को सम्भाल पाना मुश्किल हो जायेगा। फिर भी गांव के लोग आज भी कोरोना को गंभीरता से नहीं लेते है। गांव में कोरोना को राजनीति के चश्मे से देखने की खतरनाक परंपरा चल पड़ी है। सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ाई जा रही है। मास्क पुलिस को दिखाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। यानी खतरा चिंतनीय अवस्था में पहुंच चुकी है।

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