KKN गुरुग्राम डेस्क | 4 अप्रैल, बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत का दिन है। यह वह तारीख है जब दो महान स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ अपने प्राणों की आहुति दी थी। बख्तर साय और मुंडल सिंह की वीरता और साहस की गाथाएं आज भी झारखंड के गुमला जिले की वादियों में सुनाई देती हैं। इन दोनों वीरों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जमकर संघर्ष किया और उनका दिलेरी से विरोध किया। इनकी शहादत का दिन गुमला के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।
बख्तर साय और मुंडल सिंह की वीरता
बख्तर साय और मुंडल सिंह गुमला जिले के रायडीह प्रखंड के रहने वाले थे, जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंग लड़ी। इन दोनों ने अंग्रेजों को अपनी भूमि से निकालने के लिए न केवल अपनी जान की बाजी लगाई, बल्कि इलाके के लोगों को भी प्रेरित किया। इनके संघर्ष की कहानियां आज भी इलाके में सुनी जाती हैं और लोग इनके साहस पर गर्व करते हैं।
बख्तर साय की वीरता और संघर्ष
बख्तर साय नवागढ़ परगना के जागीरदार थे और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुली चुनौती दी थी। 1800 के दशक की शुरुआत में, अंग्रेजों ने भारतीय क्षेत्रों से कर वसूलने के लिए कठोर नीति अपनाई थी, जिससे स्थानीय लोग परेशान हो गए थे। बख्तर साय ने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर युद्ध छेड़ दिया। इस संघर्ष में, बख्तर साय ने अंग्रेजों के कर वसूली एजेंट हीरा राम को मारकर यह संकेत दिया कि वे ब्रिटिश शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। इस घटना के बाद, अंग्रेजों ने बख्तर साय के खिलाफ सेना भेजी, लेकिन बख्तर साय ने अपनी सूझ-बूझ और संघर्षशीलता से उनका मुकाबला किया।
मुंडल सिंह का योगदान
मुंडल सिंह भी बख्तर साय के सहयोगी थे और उनके साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध में भाग लिया। जब अंग्रेजों ने नवागढ़ को घेर लिया, तो मुंडल सिंह बख्तर साय के पास पहुंचे और मिलकर उन्होंने अंग्रेजों को कड़ा मुकाबला दिया। मुंडल सिंह की वीरता ने बख्तर साय को मजबूत किया और दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ कई सफल आक्रमण किए। उनका साहस और नेतृत्व आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।
अंग्रेजों का घेराव और बख्तर साय-मुंडल सिंह की शहादत
1812 में, अंग्रेजों ने बख्तर साय और मुंडल सिंह को पकड़ने के लिए अपने सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी भेजी। लेफ्टिनेंट एचओ डोनेल के नेतृत्व में अंग्रेजों ने नवागढ़ को चारों ओर से घेर लिया। बख्तर साय और मुंडल सिंह ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर कई दिनों तक अंग्रेजों का विरोध किया। हालांकि, अंग्रेजों ने एक सड़ी-गली रणनीति अपनाते हुए उनकी पानी की सप्लाई को नष्ट कर दिया, जिससे बख्तर साय और मुंडल सिंह अपने सैनिकों के साथ पानी के बिना जूझने लगे।
अंग्रेजों की इस धोखाधड़ी से परेशान होकर, बख्तर साय और मुंडल सिंह ने छत्तीसगढ़ के जशपुर के राजा रंजीत सिंह से सहायता ली। हालांकि, उन्हें वहां भी पकड़ लिया गया और 23 मार्च 1812 को गिरफ्तार किया गया। अंत में, 4 अप्रैल 1812 को कोलकाता के फोर्ट विलियम में इन दोनों को फांसी दे दी गई। यह दोनों वीर शहीद हो गए, लेकिन उनका बलिदान और संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
रक्त तालाब और शिवलिंग: ऐतिहासिक स्थल
बख्तर साय और मुंडल सिंह के संघर्ष की याद दिलाने वाले कई ऐतिहासिक स्थल आज भी गुमला में मौजूद हैं। नवागढ़ के पास स्थित रक्त तालाब (Blood Pond) एक महत्वपूर्ण स्थल है। कहा जाता है कि जब युद्ध हुआ, तो इस तालाब का पानी खून से भर गया, जिससे इसे रक्त तालाब कहा जाने लगा। यह स्थल आज भी उन वीरों की शहादत की गवाही देता है।
इसके अलावा, नवागढ़ में वह शिवलिंग भी है, जहां बख्तर साय और मुंडल सिंह पूजा करते थे। यह शिवलिंग उनकी श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। इन स्थलों पर जाकर हम उन वीरों की वीरता और संघर्ष की भावना को महसूस कर सकते हैं। इन स्थलों पर हर साल स्थानीय लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्र होते हैं।
बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत की महत्ता
बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत ने गुमला और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक जागरूकता का संचार किया। उनके संघर्षों ने अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया और उन्हें यह संदेश दिया कि अगर देश की स्वतंत्रता की कीमत अपने प्राणों से चुकानी पड़े, तो यह एक महान कर्तव्य है। इन वीरों ने यह साबित किया कि स्वतंत्रता की कीमत बहुत अधिक होती है, लेकिन यह संकल्प और साहस से प्राप्त की जा सकती है।
आज, बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत दिवस हमें उनके साहस, बलिदान और देशभक्ति की याद दिलाती है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि अपने देश की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।
4 अप्रैल को बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत को याद करने का दिन है। यह दोनों वीर न केवल गुमला, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनका संघर्ष और बलिदान कभी नहीं भुलाया जा सकता। इनकी वीरता की गाथाएं हर पीढ़ी को संघर्ष और स्वतंत्रता के महत्व को समझाने में मदद करती हैं। बख्तर साय और मुंडल सिंह की शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों के रूप में हमेशा जीवित रहेगी।
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