नदियों को बांधकर इंसान ने पानी, बिजली और खेती पर नियंत्रण हासिल किया। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन, बूढ़े होते बांध, बदलती बारिश, भूकंपीय जोखिम, गाद और नीचे बढ़ती आबादी एक नया सवाल खड़ा कर रहे हैं—क्या 20वीं सदी में बनाई गई बांध व्यवस्था 21वीं सदी के बदलते मौसम को झेल पाएगी? भारत में 6,628 निर्दिष्ट बांध हैं और करीब 80% पुराने बड़े बांध 25 साल से अधिक उम्र के हैं। खतरा बांध बनाने में नहीं, बिना बदले हुए जोखिमों के बीच पुराने बांधों को उसी तरह चलाने में है।
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एक दीवार, जिसके पीछे लाखों जिंदगियों का पानी कैद है
KKN ब्यूरो। कल्पना कीजिए— आपके शहर से कुछ किलोमीटर ऊपर पहाड़ों के बीच कंक्रीट की एक विशाल दीवार खड़ी है। उस दीवार के पीछे अरबों घन मीटर पानी जमा है। वही पानी खेतों को सींचता है। वही पानी शहरों तक पहुंचता है। वही पानी बिजली बनाता है। सूखे के दिनों में वही पानी जीवन बचाता है। लेकिन अगर एक दिन उस दीवार ने साथ छोड़ दिया तो? तब वही पानी जीवन का आधार नहीं रहेगा। वह विनाश की रफ्तार बन जाएगा। यही बांधों की सबसे बड़ी विडंबना है। मनुष्य ने नदी को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाया। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या मनुष्य ने पानी को नियंत्रित करते-करते एक ऐसी शक्ति को कैद कर दिया है, जिसे नियंत्रित रखना लगातार कठिन होता जा रहा है? इस सवाल का जवाब डराने वाला हो सकता है। लेकिन उससे पहले एक जरूरी बात। बांध मानव सभ्यता के दुश्मन नहीं हैं। दुनिया की खाद्य सुरक्षा, जलापूर्ति, बाढ़ नियंत्रण और ऊर्जा व्यवस्था में उनका योगदान असंदिग्ध है। भारत में 6,000 से अधिक बांध सिंचाई, बिजली, बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्या बांध नहीं है। समस्या है—बदलती दुनिया में पुराने बांधों को पुराने जोखिमों के हिसाब से चलाना।
बांध क्यों बनाए गए थे—और उन्होंने मानव सभ्यता को क्या दिया?
कृषि सभ्यता के आरंभ से मनुष्य ने पानी को रोकने और जमा करने की कोशिश की। बारिश का पानी कुछ महीनों के लिए आता था। लेकिन खेती पूरे वर्ष करनी थी। यहीं से जल-संग्रह की तकनीक विकसित हुई। आधुनिक युग में विशाल बांध इस विचार का सबसे बड़ा रूप बने। बांधों ने तीन बड़े काम किए— पानी को समय के पार ले गए। बारिश के मौसम का पानी सूखे के मौसम के लिए बचा लिया। नदी के प्रवाह को नियंत्रित किया। बाढ़ और सूखे दोनों से निपटने में मदद मिली। पानी को ऊर्जा में बदल दिया। जलविद्युत ने बड़ी मात्रा में अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली उपलब्ध कराई। भारत में आज बांधों का इस्तेमाल सिंचाई, पेयजल, उद्योग, बाढ़ नियंत्रण और बिजली के लिए होता है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में 6,000 से अधिक बांध इन उद्देश्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह कहना कि— “बांध मानव सभ्यता की गलती थे।” तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। लेकिन दूसरा अतिवाद भी उतना ही खतरनाक है— “बांध जितने बड़े होंगे, विकास उतना ही सुरक्षित होगा।” यह सोच अब सवालों के घेरे में है।
असली खतरा: बांध बूढ़े हो रहे हैं
भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े बांध पोर्टफोलियो में से एक है। 2025 के राष्ट्रीय निर्दिष्ट बांध रजिस्टर के अनुसार भारत में 6,628 निर्दिष्ट बांध हैं, जिनमें 83 निर्माणाधीन बताए गए थे। लेकिन इन आंकड़ों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उम्र। केंद्रीय जल आयोग के एक दस्तावेज के अनुसार भारत के बड़े बांधों में लगभग 80% की उम्र 25 साल से अधिक है और करीब 227 बांध 100 साल से अधिक पुराने बताए गए थे। अब सवाल उठता है— क्या 50 साल पहले बनाए गए बांध की सुरक्षा गणना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है? जब— बारिश का पैटर्न बदल रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। नदियों में बाढ़ की प्रकृति बदल रही है। शहर और आबादी बांधों के नीचे तेजी से फैल रहे हैं और जलवायु परिवर्तन पुराने जलविज्ञान को चुनौती दे रहा है। उत्तर है—हर बांध के लिए नहीं। यही सबसे बड़ा जोखिम है।
जिस बारिश के लिए बांध बनाया गया था, वह बारिश अब वैसी नहीं रही
किसी बांध का डिजाइन बनाते समय इंजीनियर यह अनुमान लगाते हैं कि उसके जलग्रहण क्षेत्र में कितनी अधिक बारिश हो सकती है। उसके आधार पर बांध की ऊंचाई, जलाशय की क्षमता और अतिरिक्त पानी निकालने के लिए स्पिलवे की क्षमता तय की जाती है। लेकिन यह गणना पुराने मौसम संबंधी आंकड़ों पर आधारित हो सकती है। अब जलवायु बदल रही है। कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं कई क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम बढ़ा सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बांध विशेषज्ञ संगठन आइकोल्ड ने 2025 में बांध सुरक्षा पर अपनी चर्चाओं में साफ तौर पर अत्यधिक बाढ़, सूखा और हिमनदीय झील विस्फोट जैसी घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में फिर से आंकने की जरूरत पर जोर दिया। यानी जो बात कभी इंजीनियरिंग की किताब का अनुमान थी, वह अब जलवायु विज्ञान की बदलती चुनौती बन चुकी है। कल की बारिश के आंकड़े से आज के बांध की सुरक्षा तय नहीं की जा सकती। यही वह जगह है जहां पुराने बांधों की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।
बांध टूटता कैसे है?
बांध का टूटना कोई एक घटना नहीं है। इसके कई कारण हो सकते हैं। भारत में केंद्रीय जल आयोग के बांध सुरक्षा संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दर्ज 36 बांध विफलताओं में 30 मिट्टी के बांध थे। सबसे सामान्य कारणों में ब्रीचिंग लगभग 44% और ओवरटॉपिंग करीब 25% मामलों में दर्ज की गई। ओवरटॉपिंग का मतलब है कि पानी बांध के निर्धारित स्तर से ऊपर निकलने लगे। अगर बांध की संरचना उस अतिरिक्त पानी को सहन नहीं कर पाती तो गंभीर क्षति हो सकती है। लेकिन समस्या सिर्फ पानी की मात्रा नहीं है। बांध की उम्र बढ़ने के साथ— कंक्रीट में दरारें, सीपेज, नींव की कमजोरी, गेटों की खराबी, जल निकासी तंत्र की समस्या, गाद और रखरखाव की कमी जोखिम बढ़ा सकती है। इसलिए बांध सुरक्षा कोई ऐसा काम नहीं जिसे निर्माण पूरा होने के बाद खत्म मान लिया जाए। बांध का असली जीवन निर्माण के बाद शुरू होता है।
गाद वह धीमा दुश्मन जिसे कैमरे में नहीं दिखाया जाता
बांध के सामने जमा पानी दिखाई देता है। लेकिन पानी के साथ आने वाली मिट्टी दिखाई नहीं देती। नदी अपने साथ लगातार तलछट लेकर आती है। यह तलछट जलाशय में जमा होती जाती है। इसे सिल्टेशन कहा जाता है। समय के साथ जलाशय की उपयोगी क्षमता घट सकती है। यानी जिस जलाशय को कभी एक निश्चित मात्रा के पानी के लिए डिजाइन किया गया था, उसकी वास्तविक क्षमता दशकों बाद कम हो सकती है। इसका अर्थ है— कम पानी का भंडारण। बाढ़ नियंत्रण की क्षमता में कमी। जलविद्युत उत्पादन पर असर और जलाशय के संचालन पर बढ़ता दबाव। विश्व बैंक ने भी बांधों की दीर्घकालिक सुरक्षा और प्रदर्शन में रखरखाव तथा बदलती परिस्थितियों को महत्वपूर्ण चुनौती माना है। गाद कोई अचानक आने वाला तूफान नहीं है। यह धीमे-धीमे जमा होने वाला संकट है और धीमे संकट अक्सर सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं। क्योंकि उनकी तरफ ध्यान देर से जाता है।
बांध के नीचे रहने वाले लोग बढ़ गए हैं
मान लीजिए 50 साल पहले किसी बांध के नीचे 10,000 लोग रहते थे। आज वहां शहर बस चुका है। सड़कें हैं। बाजार हैं। स्कूल हैं। अस्पताल हैं। उद्योग हैं। लाखों लोग हैं। बांध की संरचना वही है। लेकिन उसके विफल होने की स्थिति में नुकसान कई गुना बढ़ गया है। विश्व बैंक ने वैश्विक स्तर पर बांध जोखिम के संदर्भ में इसी बदलती स्थिति की ओर ध्यान दिलाया है—जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बांधों के नीचे आबादी और बस्तियों का विस्तार भी संभावित नुकसान बढ़ाता है। यानी जोखिम सिर्फ यह नहीं कि— “बांध टूट सकता है या नहीं?” अब सवाल है— अगर बांध टूट गया तो नीचे कितने लोग हैं? यही आधुनिक बांध सुरक्षा का केंद्रीय प्रश्न होना चाहिए।
भारत ने खतरा पहचाना है—लेकिन क्या गति पर्याप्त है?
भारत ने इस चुनौती को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है। 2021 में संसद ने बांध सुरक्षा अधिनियम पारित किया। इस कानून का उद्देश्य बांधों की निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाना और बांध विफलता से जुड़ी आपदाओं की रोकथाम करना है। राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण और राज्य स्तरीय संस्थाओं की व्यवस्था भी बनाई गई है। इसके अलावा भारत ने बांधों के पुनर्वास के लिए दुनिया के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक शुरू किया है। विश्व बैंक के अनुसार 500 से अधिक बड़े बांधों के आधुनिकीकरण और पुनर्वास पर काम हो रहा है। 2012 से विश्व बैंक के सहयोग से 200 बड़े बांधों को उन्नत किया जा चुका था। हर बांध के लिए आपातकालीन कार्ययोजना विकसित करने पर भी जोर दिया गया है। यह महत्वपूर्ण प्रगति है। लेकिन सवाल यह है— क्या 6,628 बांधों वाले देश में जोखिम आधारित निगरानी की गति सभी संवेदनशील बांधों तक पहुंच पा रही है?
जलवायु परिवर्तन बांध का दुश्मन नहीं है
जलवायु परिवर्तन का एक अजीब विरोधाभास है। बांध जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकते हैं। जलविद्युत बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर सकती है। जलाशय सूखे के समय पानी उपलब्ध करा सकते हैं। बाढ़ के समय जल प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन वही जलवायु परिवर्तन बांधों की सुरक्षा के लिए नया जोखिम भी पैदा कर सकता है। अत्यधिक बारिश। अत्यधिक बाढ़। लंबे सूखे। तापमान में बदलाव। हिमनद पिघलना। भूस्खलन। हिमनदीय झील विस्फोट। ये सभी जलाशय और बांध संचालन को प्रभावित कर सकते हैं। आइकोल्ड की 2025 की विशेषज्ञ चर्चाओं में इसी कारण बांधों की भविष्य की क्षमता को 2050 और उससे आगे के जलवायु परिदृश्यों में परखने की जरूरत पर जोर दिया गया। यानी अब बांध की सुरक्षा का सवाल यह नहीं है कि वह आज सुरक्षित है या नहीं। सवाल यह है— क्या वह 2050 की बारिश में भी सुरक्षित रहेगा?
हिमालयी बांध सबसे कठिन परीक्षा यहीं है
अब इस कहानी को नेपाल और हिमालय से जोड़िए। हाल में नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई भयावह बाढ़ ने दिखाया कि हिमालय में बर्फ, चट्टान और पानी किस तरह अचानक एक विनाशकारी शक्ति में बदल सकते हैं। वैज्ञानिकों ने बढ़ते तापमान और हिमालयी भूभाग की अस्थिरता को लेकर चिंता जताई है। अब कल्पना कीजिए कि ऐसी कोई अत्यधिक घटना किसी बड़े बांध या जलविद्युत परियोजना के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में हो। अचानक भारी मात्रा में— पानी, बर्फ, चट्टान, मलबा नदी में आ जाए। बांध को सिर्फ पानी नहीं संभालना होगा। उसे एक पूरी पहाड़ी को संभालना पड़ सकता है। यही कारण है कि 2025 में आइकोल्ड के विशेषज्ञों ने बांध सुरक्षा के संदर्भ में हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ को भी अत्यधिक घटनाओं की सूची में शामिल किया। यह भविष्य का कोई काल्पनिक खतरा नहीं। यह नया जोखिम विज्ञान की मेज पर आ चुका है।
बांध सिर्फ पानी नहीं रोकता—नदी का चरित्र भी बदल देता है
नदी सिर्फ पानी नहीं है। नदी अपने साथ गाद ले जाती है। मछलियां ले जाती है। पोषक तत्व ले जाती है। नदी के किनारे की पारिस्थितिकी को बनाए रखती है। बांध नदी के प्रवाह को बदल देता है। मछलियों के आवागमन पर असर पड़ सकता है। नीचे की ओर तलछट का प्रवाह घट सकता है। डेल्टा और नदी तटों की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसी नदी पर बांध बनाने का असर केवल जलाशय की सीमा तक सीमित नहीं होता। वह नदी के पूरे पारिस्थितिक तंत्र तक जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय बांध आयोग भी पर्यावरणीय बदलावों के संदर्भ में बांधों की भूमिका को दोतरफा मानता है—बांध जलवायु अनुकूलन में मदद कर सकते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन स्वयं बांध सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभावों को प्रभावित करता है।
क्या छोटे बांध ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं?
बड़ी परियोजनाओं पर आम तौर पर ज्यादा निगरानी होती है। लेकिन दुनिया में बड़े बांधों के अलावा लाखों छोटे जलाशय और बांध भी हैं। विश्व बैंक के एक हालिया दस्तावेज के मुताबिक दुनिया में ICOLD के रजिस्टर में 58,000 से अधिक बड़े बांध हैं और इनके अलावा कई मिलियन छोटे बांध होने का अनुमान है। हर छोटे बांध पर वही निगरानी और विशेषज्ञता उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं। किसी छोटे बांध की विफलता भले ही बड़े बांध जितनी दूर तक तबाही न ले जाए, लेकिन स्थानीय स्तर पर वह जानलेवा हो सकती है। इसलिए भविष्य की बांध नीति का अर्थ केवल विशाल परियोजनाओं की सुरक्षा नहीं होना चाहिए। पूरे बांध तंत्र की सुरक्षा करनी होगी।
क्या भविष्य में बांध मानवता के लिए खतरा बन जाएंगे?
बांध अपने आप खतरा नहीं बनेंगे। लेकिन कुछ परिस्थितियों में बूढ़ा, खराब रखरखाव वाला, गलत जलवायु अनुमान पर आधारित और नीचे घनी आबादी वाले इलाके में स्थित बांध गंभीर जोखिम बन सकता है और यह जोखिम स्थिर नहीं है। विश्व बैंक स्पष्ट रूप से कहता है कि बांध का जोखिम समय के साथ बदलता है और जोखिम प्रबंधन बांध के पूरे जीवन चक्र में किया जाना चाहिए। यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। बांध की उम्र बढ़ती है। मौसम बदलता है। नदी बदलती है। आबादी बदलती है। तो सुरक्षा गणना भी बदलनी चाहिए।
बांध तोड़ना नहीं, बांध को फिर से परिभाषित करना होगा
इस पूरी बहस को “बांध बनाम पर्यावरण” में बदल देना आसान है। लेकिन समाधान वहां नहीं है। भविष्य की नीति को 7 स्तरों पर काम करना होगा। पहला—हर पुराने बांध का नया जोखिम मूल्यांकन करना होगा। 25 या 50 साल पुराने डिजाइन को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। दूसरा—जलवायु परिवर्तन को डिजाइन में शामिल करना होगा। 2050 और 2100 के संभावित वर्षा और बाढ़ परिदृश्यों के आधार पर सुरक्षा जांच होना चाहिए। तीसरा—गाद का वैज्ञानिक प्रबंधन करना होगा। जलाशय की वास्तविक क्षमता लगातार मापी जानी चाहिए। चौथा—रियल टाइम निगरानी बढ़ानी होगी। जलस्तर, सीपेज, संरचनात्मक कंपन और गेटों की स्थिति की डिजिटल निगरानी अब जरूरी हो गया है। पांचवां—नीचे रहने वाले लोगों को अधिकार देना होगा। आपातकालीन चेतावनी सिर्फ अधिकारियों के पास नहीं होनी चाहिए। लोगों को पता होना चाहिए कि बांध टूटने की स्थिति में उन्हें कहां जाना है। छठा—आपातकालीन अभ्यास कराना होगा। आपदा योजना कागज पर नहीं, जमीन पर परखी जाए। सातवां—जहां जोखिम लाभ से अधिक हो, वहां पुनर्विचार जरूरी है। हर बांध को हर कीमत पर बचाए रखना जरूरी नहीं होना चाहिए। कुछ मामलों में पुनर्वास, क्षमता घटाना, संचालन बदलना या अंततः बांध हटाना भी विकल्प हो सकता है।
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