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विश्वकर्मा पूजा: मशीन पर फूल चढ़ाने की परंपरा या इंसान के हुनर को सलाम?

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ऋग्वेद के ‘विश्वकर्मन्’ से आधुनिक कारखाने तक पहुंची परंपरा में आखिर छिपा संदेश क्या है? क्या औजारों की पूजा का कोई वैज्ञानिक अर्थ भी है, या यह केवल धार्मिक आस्था है? एक कारखाना है। मशीनें बंद हैं। औजारों पर फूल चढ़े हैं। कहीं हथौड़ा रखा है, कहीं आरी, कहीं वेल्डिंग मशीन, कहीं ट्रैक्टर और कहीं कंप्यूटर। जिस मशीन से कल तक उत्पादन हो रहा था, आज उसके सामने दीपक जल रहा है। सवाल उठता है—आखिर मशीन की पूजा क्यों? क्या लोहे, स्टील और बिजली के तारों में कोई देवत्व है? क्या विश्वकर्मा पूजा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा है या इसके पीछे हजारों साल पुराना कोई ऐसा विचार है, जिसमें इंसान अपने औजार, अपने श्रम और अपनी सृजन-शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है? अगर इसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर रखें तो क्या मशीन की पूजा करने से मशीन खराब होना बंद हो सकती है? शायद नहीं। लेकिन क्या मशीन की पूजा का एक ऐसा व्यावहारिक अर्थ हो सकता है, जो आज के आधुनिक कारखानों में भी उतना ही जरूरी है—मशीन की देखभाल, सुरक्षा, अनुशासन और उस हाथ का सम्मान, जो मशीन चलाता है?

विश्वकर्मा कौन हैं—देवताओं के इंजीनियर या ‘सृष्टि के निर्माता’?

KKN ब्यूरो। आज की लोकप्रिय कल्पना में विश्वकर्मा को देवताओं के वास्तुकार और शिल्पी के रूप में देखा जाता है। लेकिन प्राचीन वैदिक साहित्य में उनकी तस्वीर कुछ ज्यादा जटिल है। ऋग्वेद के मंडल 10 के सूक्त 81 और 82 विश्वकर्मन् को संबोधित हैं। यहां ‘विश्वकर्मन्’ का अर्थ broadly उस शक्ति से जुड़ता है जो सब कुछ रचती या बनाती है। ऋग्वैदिक विश्वकर्मन् को बाद के पुराणों में दिखाई देने वाले औजार हाथ में लिए शिल्पी के रूप में सीधे-सीधे समझ लेना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। यानी कहानी में एक महत्वपूर्ण विकास हुआ। पहले ‘विश्वकर्मन्’ एक व्यापक सृजनात्मक शक्ति का विस्तार था। बाद की परंपराओं में यही नाम देव-शिल्पी और वास्तुकार की विशिष्ट पहचान बन गया। यही फर्क विश्वकर्मा पूजा को समझने की पहली चाबी है।

ऋग्वेद में सवाल है—यह संसार बना कैसे?

ऋग्वेद के विश्वकर्मा सूक्तों की दिलचस्पी केवल किसी महल या औजार के निर्माता में नहीं है। वह एक बहुत बड़ा प्रश्न पूछते हैं— यह संसार किसने बनाया? इसकी रचना कैसे हुई? विश्वकर्मन् की कल्पना उस ‘निर्माण’ से जुड़ती है जो पूरे विश्व तक फैला हुआ है। बाद के ग्रंथों में भी विश्वकर्मन् का संबंध प्रजापति और सृष्टि की रचना से जोड़ा गया मिलता है। शतपथ के एक प्रसंग में विश्वकर्मन् को प्रजापति के साथ जोड़ा गया है और दूसरे प्रसंग में ‘विश्वकर्मण’ आहुति का संबंध किसी कार्य के पूर्ण होने से बताया गया है। यहां एक बेहद सुंदर विचार सामने आता है— निर्माण केवल शुरुआत नहीं है। निर्माण को पूरा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यानी विश्वकर्मा की वैदिक अवधारणा को केवल ‘बनाने वाले देवता’ तक सीमित करना उसके दार्शनिक अर्थ को छोटा कर देता है।

फिर हथौड़े और मशीन विश्वकर्मा से कैसे जुड़ गए?

यहां कहानी धार्मिक ग्रंथों से निकलकर कारीगरों की दुनिया में प्रवेश करती है। भारत में लोहार, बढ़ई, तांबे का काम करने वाले, मूर्तिकार और स्वर्णकार जैसे पारंपरिक कारीगर समुदायों की अपनी विशिष्ट विश्वकर्मा परंपराएं विकसित हुईं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र यानी IGNCA ने विश्वकर्मा समुदायों पर किए अपने अध्ययन में इन कारीगर समूहों की कार्यशालाओं, औजारों, धातुकर्म, शिल्प, मौखिक परंपराओं और अनुष्ठानों को दर्ज किया है। यहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। कारीगर के लिए औजार सिर्फ लोहे का टुकड़ा नहीं है। वह उसकी रोजी-रोटी है। उसका कौशल है। उसकी पहचान है। कई परंपराओं में वह उसकी सृजन-शक्ति का विस्तार भी है। इसीलिए औजार को सम्मान देना, वास्तव में अपने काम को सम्मान देना होता है।

हथौड़ा देवता नहीं, लेकिन उसके प्रति सम्मान का अर्थ बड़ा है

दक्षिण भारत के विश्वकर्मा कारीगरों पर IGNCA के अध्ययन में औजारों को प्रतीकात्मक अर्थ दिए जाने की विस्तृत चर्चा मिलती है। कुछ लोहार परंपराओं में भट्ठी, निहाई, हथौड़ा और चिमटे जैसे औजारों को अलग-अलग दैवी प्रतीकों से जोड़ा जाता है। यहां पांच तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को कारीगरी की प्रक्रिया से भी जोड़ा गया है। सोचिए— लोहे को आकार देने के लिए पृथ्वी चाहिए। भट्ठी के लिए अग्नि चाहिए। आग को जीवित रखने के लिए हवा चाहिए। ठंडा करने के लिए पानी चाहिए। और पूरा काम करने के लिए जगह— अर्थात आकाश…। आज विज्ञान इसे पदार्थ, ताप, ऊर्जा और प्रक्रियाओं की भाषा में समझाता है। परंपरा इसे पंचतत्व की भाषा में समझाती थी। दोनों के बीच शब्दों का अंतर है। लेकिन कारीगरी के अनुभव में प्रकृति और तकनीक के बीच संबंध को पहचानने की कोशिश दिखाई देती है।

क्या विश्वकर्मा पूजा का कोई वैज्ञानिक आधार है?

सवाल है क्या विज्ञान यह प्रमाणित करता है कि विश्वकर्मा पूजा करने से मशीन खराब नहीं होगी? नहीं। ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि पूजा, मंत्र या फूल चढ़ाने से मशीन की mechanical failure, electrical fault या दुर्घटना की संभावना अपने आप समाप्त हो जाती है या कम हो सकती है। यह दावा करना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं होगा। लेकिन यहीं कहानी खत्म भी नहीं होती। क्योंकि पूजा की परंपरा में जो व्यवहार जुड़ा है, उसका व्यावहारिक महत्व हो सकता है। मशीन बंद करना। उसे साफ करना। उसकी जांच करना। उसके आसपास की जगह व्यवस्थित करना। औजारों को संभालना। काम के प्रति सावधानी बरतना और अगले कार्यचक्र से पहले उपकरणों पर ध्यान देना। आधुनिक occupational safety भी मशीनों के नियमित निरीक्षण और maintenance को बेहद महत्वपूर्ण मानती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO के अनुसार मशीन और उपकरणों का उचित रखरखाव दुर्घटनाओं और खराबी के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण है; क्षतिग्रस्त उपकरणों की रिपोर्टिंग और नियमित maintenance जरूरी है। तो विज्ञान यह नहीं कहता कि— “पूजा करो, मशीन नहीं टूटेगी।” विज्ञान कहता है— “मशीन की देखभाल करो, जोखिम पहचानो और सुरक्षित तरीके से काम करो।” अगर विश्वकर्मा पूजा का दिन इसी बहाने मशीन की वास्तविक जांच का दिन बन जाए, तो परंपरा का एक बेहद व्यावहारिक अर्थ सामने आ सकता है।

शायद असली पूजा मशीन की नहीं, ‘मेंटेनेंस’ की होनी चाहिए

कल्पना कीजिए किसी फैक्ट्री में विश्वकर्मा पूजा हो। मशीन पर फूल चढ़े। दीपक जला। प्रसाद बंटा। लेकिन मशीन का bearing खराब है। electrical wiring ढीली है। safety guard टूटा है। emergency switch काम नहीं करता और अगले दिन उसी मशीन को फिर चला दिया जाता है। तो क्या पूजा पूरी हुई? परंपरा की आत्मा को आधुनिक भाषा में पढ़ें तो शायद जवाब होगा—नहीं। अगर औजार का सम्मान करना है तो उसे सुरक्षित रखना भी होगा। अगर मशीन को विश्वकर्मा का प्रतीक मानना है तो उसकी खराबी को नजरअंदाज करना उस प्रतीक का अपमान ही होगा। यहीं विश्वकर्मा पूजा आधुनिक औद्योगिक सुरक्षा से जुड़ सकती है। पूजा + निरीक्षण + रखरखाव + सुरक्षा प्रशिक्षण। यही शायद 21वीं सदी की विश्वकर्मा पूजा का सबसे उपयोगी रूप हो सकता है।

विश्वकर्मा पूजा ने तकनीक को ‘अपवित्र’ नहीं माना

भारतीय परंपरा के बारे में एक सामान्य धारणा यह रही है कि धर्म और तकनीक दो अलग दुनिया हैं। लेकिन विश्वकर्मा पूजा इस धारणा को चुनौती देती है। एक मशीन। एक औजार। एक भट्ठी। एक निहाई। एक आरी। एक वाहन। एक निर्माण स्थल। इन सबको धार्मिक सम्मान मिलता है। यानी तकनीक को केवल उपयोग की वस्तु नहीं माना गया; उसे सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ भी दिया गया। आधुनिक मानवशास्त्रीय शोध भी इसी पहलू को रेखांकित करता है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में विश्वकर्मा पूजा को औजार, मशीन, कारीगरी और ‘बनाने’ की प्रक्रिया के साथ जोड़ा गया है। 2022 में Journal of Asian Studies में प्रकाशित शोध ने विश्वकर्मा पूजा को औद्योगिकीकरण के दौर में भी महत्वपूर्ण बताया और यह तर्क रखा कि इससे कारीगर, तकनीशियन, मैकेनिक और इंजीनियर अपनी तकनीकी गतिविधियों को व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक अर्थों से जोड़ते हैं। यानी विश्वकर्मा पूजा केवल अतीत में बनी परंपरा नहीं है। इसने आधुनिक मशीन को भी अपने भीतर जगह दी है।

एक और बड़ा संदेश—‘बनाने वाले हाथ’ का सम्मान

हम अक्सर तैयार चीज देखते हैं। घर देखते हैं। पुल देखते हैं। मशीन देखते हैं। कार देखते हैं। मूर्ति देखते हैं। लेकिन उसे बनाने वाले हाथ को भूल जाते हैं। एक बढ़ई ने लकड़ी को आकार दिया। एक लोहार ने लोहे को रूप दिया। एक कारीगर ने धातु को ढाला। एक राजमिस्त्री ने ईंट और पत्थर को भवन बनाया। एक इंजीनियर ने डिजाइन बनाया। एक तकनीशियन ने मशीन को चलाया। विश्वकर्मा की कल्पना इन सभी ‘निर्माताओं’ को एक सांस्कृतिक सम्मान देती है। IGNCA के अध्ययन भी इस बात पर जोर देते हैं कि विश्वकर्मा कारीगरों की दुनिया को समझने के लिए उनके औजार, कार्यशाला, तकनीकी ज्ञान और सामाजिक जीवन को एक साथ देखना जरूरी है। यानी विश्वकर्मा पूजा को सिर्फ देवता की पूजा समझना शायद कहानी का आधा हिस्सा देखना है। दूसरा आधा हिस्सा है— श्रम की गरिमा।

लेकिन क्या यह परंपरा हमेशा से ऐसी ही थी?

आज जिस रूप में विश्वकर्मा पूजा कारखानों, मशीनों, मोटरों, वाहनों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में दिखाई देती है, उसे सीधे हजारों साल पुराने किसी एक ‘विश्वकर्मा पूजा दिवस’ से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। प्राचीन वैदिक विश्वकर्मन्, बाद के देव-शिल्पी विश्वकर्मा और आधुनिक औद्योगिक विश्वकर्मा पूजा—इन तीनों के बीच एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा है। प्राचीन ग्रंथों में विश्वकर्मन् का स्वरूप सृष्टि और निर्माण से जुड़ा है। बाद के महाकाव्य और पुराणिक परंपराओं में वे देवताओं के वास्तुकार और शिल्पी के रूप में अधिक स्पष्ट होते हैं। आधुनिक समय में उनकी पूजा कारीगरों से आगे बढ़कर कारखानों और औद्योगिक तकनीक से भी जुड़ गई। यही विकास इस पर्व को रोचक बनाता है।

विश्वकर्मा पूजा का औचित्य क्या है?

अगर इसे केवल आस्था की दृष्टि से देखें तो यह विश्वकर्मा देव के प्रति श्रद्धा है। अगर इसे सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो यह कारीगर और उसके कौशल का उत्सव है। अगर इसे सामाजिक दृष्टि से देखें तो यह श्रम की गरिमा का संदेश है। अगर इसे तकनीकी दृष्टि से देखें तो यह औजार और मशीन के महत्व की स्वीकारोक्ति है और अगर इसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से समझें तो इसका सबसे उपयोगी रूप हो सकता है— मशीन की जांच, रखरखाव, सुरक्षा और जिम्मेदार उपयोग का वार्षिक संकल्प। लेकिन एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए— यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है कि पूजा स्वयं मशीन की खराबी या दुर्घटना रोकती है। विज्ञान इसके लिए maintenance, engineering controls, training और safety protocols की मांग करता है।

विश्वकर्मा पूजा का असली संदेश

हर मशीन के पीछे एक इंसान है। हर औजार के पीछे एक कौशल है। हर इमारत के पीछे किसी का श्रम है। हर आविष्कार के पीछे किसी का विचार है और हर निर्माण के पीछे एक अदृश्य दुनिया है—मेहनत, माप, गणना, अनुभव और धैर्य की दुनिया। इसलिए विश्वकर्मा पूजा को सिर्फ अगरबत्ती और फूल तक सीमित कर देना शायद इसके सबसे बड़े संदेश को छोटा कर देना है। उस दिन मशीन पर फूल चढ़ाइए, लेकिन मशीन की जांच भी कीजिए। हथौड़े की पूजा कीजिए, लेकिन हथौड़ा चलाने वाले हाथ का सम्मान भी कीजिए। कारखाने में दीप जलाइए, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था की रोशनी भी जलाइए। और सबसे जरूरी— जिस समाज में निर्माण करने वाले हाथों का सम्मान होता है, वही समाज भविष्य का निर्माण कर सकता है। शायद इसी अर्थ में विश्वकर्मा पूजा सिर्फ पूजा नहीं है। यह ‘बनाने’ की संस्कृति को प्रणाम है। शायद यही वजह है कि हजारों साल पुराने ‘विश्वकर्मन्’ से लेकर आज के इंजीनियर, मैकेनिक और तकनीशियन तक—इस नाम की यात्रा अब भी जारी है। क्योंकि दुनिया हमेशा उन्हीं लोगों से आगे बढ़ती है, जो सिर्फ सपने नहीं देखते—उन्हें आकार देना भी जानते हैं।

शोध आधार: ऋग्वेद 10.81–10.82, शतपथ ब्राह्मण, IGNCA के विश्वकर्मा कारीगरों पर अध्ययन, Journal of Asian Studies का शोध और ILO की मशीन-सुरक्षा एवं maintenance guidelines।

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