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शिक्षक से बड़ा कौन? भारत की उस परंपरा की पड़ताल, जहाँ गुरु को देवता कहा गया

KKN पड़ताल। किसी बच्चे के हाथ में पहली बार कलम आती है, तो वह सिर्फ अक्षर लिखना नहीं सीखता। वह धीरे-धीरे यह सीखता है कि सच क्या है, झूठ क्या है, हार के बाद उठना क्या है, दूसरे के दर्द को समझना क्या है और अपने से कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना है। यही वजह है कि भारतीय परंपरा में गुरु को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं माना गया। गुरु वह, जो मनुष्य के भीतर के मनुष्य को गढ़ता है। लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है— क्या भारत में सचमुच शिक्षक को भगवान से ऊपर रखा गया है? इसका जवाब भावनाओं से नहीं, प्रमाणों से तलाशना होगा और जब हम भारतीय ज्ञान-परंपरा के मूल ग्रंथों तक पहुंचते हैं, तो तस्वीर बेहद दिलचस्प दिखाई देती है।

उपनिषद ने कहा—आचार्य देवो भव

तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में गुरु के प्रति सम्मान की जो संकल्पना मिलती है, वह भारतीय परंपरा में शिक्षक के स्थान का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। विद्यार्थी को शिक्षा पूरी करने के बाद आचार्य की ओर से जो उपदेश दिया जाता है, उसमें कहा गया है— “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।” अर्थात माता को देवता के समान मानो, पिता को देवता के समान मानो, आचार्य को देवता के समान मानो और अतिथि को देवता के समान मानो। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। उपनिषद यह नहीं कहता कि शिक्षक जैविक या धार्मिक अर्थ में भगवान से “ऊपर” है। बल्कि वह आचार्य को देवतुल्य सम्मान देने का आदेश देता है। इसलिए “शिक्षक भगवान से ऊपर है” कहना एक लोकप्रिय सांस्कृतिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन शास्त्रीय प्रमाण के आधार पर अधिक सटीक वाक्य होगा— भारत की प्राचीन परंपरा में आचार्य को देवतुल्य माना गया और यह बात सिर्फ सम्मान तक सीमित नहीं थी। उसी उपदेश में विद्यार्थी से कहा गया— “सत्यं वद। धर्मं चर।” सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अर्थात गुरु का काम केवल ज्ञान देना नहीं था; शिक्षा का अंतिम उद्देश्य चरित्र और आचरण का निर्माण करना भी था।

गुरु क्यों देवता बना?

भारतीय चिंतन में अज्ञान को अंधकार और ज्ञान को प्रकाश माना गया है। लोकप्रिय गुरु-परंपरा में गुरु की व्याख्या इसी रूप में की गई—जो अज्ञान के अंधकार को दूर करे। इसीलिए बाद की गुरु-परंपरा में प्रसिद्ध पंक्ति आती है— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।” लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। यह श्लोक गुरु-स्तुति की प्रसिद्ध परंपरा का हिस्सा है; इसे तैत्तिरीय उपनिषद का मूल मंत्र बताना सही नहीं होगा। भारतीय सभ्यता में गुरु की प्रतिष्ठा का असली आधार यही था कि वह व्यक्ति को ज्ञान से विवेक, विवेक से आचरण और आचरण से चरित्र की ओर ले जाए। यानी शिक्षक का मूल्य उसके पढ़ाए हुए पाठ से नहीं, उसके द्वारा तैयार किए गए मनुष्य से तय होता था।

शिक्षक सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता, वह व्यवहार सिखाता है

क्या शिक्षक व्यक्तित्व का निर्माता होता है? आधुनिक शोध इस बात को काफी हद तक पुष्ट करता है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के शोध के अनुसार शिक्षक विद्यार्थियों के संज्ञानात्मक और सामाजिक-भावनात्मक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों का संबंध विद्यार्थियों के व्यवहार, सीखने की रुचि, विद्यालय से जुड़ाव और सामाजिक-भावनात्मक विकास से पाया गया है। 2023 के अंतरराष्ट्रीय सामाजिक-भावनात्मक कौशल अध्ययन के विश्लेषण में भी पाया गया कि जिन विद्यार्थियों के शिक्षक के साथ बेहतर संबंध थे, उनमें उपलब्धि की प्रेरणा, जिज्ञासा, धैर्य और आशावाद जैसे गुणों का स्तर अधिक था। यानी आधुनिक शोध उस पुरानी भारतीय धारणा के एक महत्वपूर्ण हिस्से को दूसरे शब्दों में सामने रखता है— शिक्षक बच्चे के दिमाग को ही नहीं, उसके सामाजिक और भावनात्मक व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता है। एक बच्चा शिक्षक से गणित सीखता है। लेकिन वह शिक्षक से यह भी सीख सकता है कि गलती होने पर क्या करना है। वह इतिहास पढ़ता है, लेकिन शिक्षक के व्यवहार से न्याय और अन्याय को समझ सकता है। वह भाषा पढ़ता है, लेकिन शिक्षक की भाषा से सम्मान और अपमान का अंतर सीख सकता है। सबसे महत्वपूर्ण— वह शिक्षक की कही हुई बात से कम और शिक्षक के किए हुए काम से ज्यादा सीखता है।

शिक्षक का सम्मान घटा है— क्या नैतिक पतन उसी से शुरू हुआ?

यह कहना कि “शिक्षक का सम्मान घटा और उसी क्षण से समाज का नैतिक पतन शुरू हो गया”, एक सीधा कारण-परिणाम संबंध है, जिसे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हमारे पास नहीं हैं। समाज का नैतिक चरित्र अनेक चीजों से बनता है—परिवार, विद्यालय, आर्थिक परिस्थितियां, सामाजिक संस्थाएं, कानून, मीडिया, मित्र समूह, राजनीतिक-सामाजिक वातावरण और व्यक्तिगत अनुभव। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि शिक्षक की भूमिका इसमें नगण्य है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वयं कहती है कि शिक्षक बच्चों और राष्ट्र के भविष्य को आकार देते हैं। नीति यह भी स्वीकार करती है कि शिक्षक के पेशे की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति को मजबूत किया जाना चाहिए। भारत सरकार के शिक्षा संबंधी दस्तावेजों में शिक्षक को शिक्षा-व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण घटक और समाज के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाने वाला बताया गया है। इसलिए अधिक प्रमाणित निष्कर्ष यह है— कि शिक्षक का सम्मान और उसकी पेशेवर गुणवत्ता किसी समाज के शैक्षिक तथा सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण घटकों में से एक हैं। नैतिक पतन का पूरा दोष केवल शिक्षक के सम्मान में कमी पर डालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

शिक्षक से भी सवाल पूछना होगा

अगर समाज शिक्षक को सम्मान दे, तो क्या शिक्षक उस सम्मान के योग्य आचरण भी करे? बिल्कुल। क्योंकि सम्मान केवल अधिकार नहीं है। सम्मान एक नैतिक जिम्मेदारी भी है। तैत्तिरीय उपनिषद का संदेश सिर्फ विद्यार्थी के लिए नहीं है। उसी परंपरा में सत्य, धर्म, स्वाध्याय और सदाचार पर जोर भी है। इसलिए शिक्षक यदि विद्यार्थियों से ईमानदारी की अपेक्षा करता है, तो उसकी अपनी ईमानदारी दिखाई देनी चाहिए। वह अनुशासन की बात करता है, तो उसका अपना व्यवहार अनुशासित होना चाहिए। वह सम्मान की शिक्षा देता है, तो उसे विद्यार्थी की गरिमा का सम्मान करना चाहिए। वह नैतिकता पढ़ाता है, तो उसे निजी जीवन में भी उसके निकट रहने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि बच्चे की आंखें शिक्षक की सबसे कठोर परीक्षा लेती हैं। बच्चा सुनता कम है, देखता ज्यादा है।

शिक्षक को भगवान बनाने से पहले उसे मनुष्य रहने दीजिए

शिक्षक को देवतुल्य मानने की परंपरा का अर्थ यह नहीं कि शिक्षक से प्रश्न नहीं पूछा जा सकता। न ही इसका अर्थ यह है कि शिक्षक गलत हो तो विद्यार्थी चुप रहे। वास्तव में श्रेष्ठ गुरु वह है जो प्रश्न से डरता नहीं। भारतीय ज्ञान-परंपरा में संवाद, प्रश्न और जिज्ञासा का अपना महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसलिए शिक्षक का सम्मान अंधभक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान और चरित्र के प्रति सम्मान होना चाहिए। शिक्षक का अधिकार भी निरंकुश नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व से बंधा होना चाहिए। यही आधुनिक शिक्षा का भी मूल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानती। उसमें नैतिक, तर्कसंगत, करुणाशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने को भी शिक्षा का उद्देश्य माना गया है।

संकट शिक्षक का नहीं, शिक्षक और समाज के रिश्ते का है

कभी गांव में शिक्षक केवल विद्यालय का कर्मचारी नहीं होता था। वह सलाहकार भी होता था। बच्चों का मार्गदर्शक होता था। कई बार गांव के सामाजिक विवादों में उसकी बात सुनी जाती थी। उसके घर का दरवाजा केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए खुला होता था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। शिक्षा अधिक संस्थागत हुई है। प्रतियोगिता बढ़ी है। परीक्षा का दबाव बढ़ा है। तकनीक ने ज्ञान तक पहुंच आसान कर दी है। लेकिन एक चीज तकनीक नहीं कर सकती— वह बच्चे के भीतर मनुष्य को देखकर उसके साथ मनुष्य की तरह व्यवहार करने का विकल्प पूरी तरह नहीं बन सकती। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर दे सकती है। किताब ज्ञान दे सकती है। इंटरनेट सूचना दे सकता है। लेकिन बच्चे को यह सिखाने के लिए कि ज्ञान का इस्तेमाल किसलिए करना है, किसी जीवित आदर्श की जरूरत बनी रहती है। वहां शिक्षक की भूमिका फिर सामने आती है।

समाज को शिक्षक की जरूरत है—और शिक्षक को भी अपने आदर्श की

समाज शिक्षक से आदर्श चाहता है। लेकिन क्या समाज शिक्षक को वह सम्मान, सुरक्षा, स्वतंत्रता और पेशेवर विकास देता है, जिसकी उसे जरूरत है? दूसरी तरफ— क्या हर शिक्षक खुद से यह पूछता है कि जिस सम्मान की वह अपेक्षा कर रहा है, क्या उसका आचरण उस सम्मान को उचित ठहराता है? शायद दोनों प्रश्नों का जवाब एक साथ तलाशना होगा। समाज को शिक्षक की गरिमा लौटानी होगी और शिक्षक को अपने आचरण से उस गरिमा की रक्षा करनी होगी। क्योंकि विद्यालय की चारदीवारी में केवल पाठ्यक्रम नहीं बनता। वहीं अगली पीढ़ी का स्वभाव बनता है। वहीं यह तय होता है कि भविष्य का नागरिक कमजोर को कुचलेगा या उसका हाथ पकड़ेगा। वहीं यह तय होता है कि वह सुविधा के लिए झूठ बोलेगा या कठिन परिस्थिति में भी सच के साथ खड़ा रहेगा। शायद इसी अर्थ में भारत की पुरानी पुकार आज भी प्रासंगिक है— “आचार्य देवो भव।” लेकिन इस वाक्य को आज दो तरफ से पढ़ने की जरूरत है। विद्यार्थी के लिए इसका अर्थ है— अपने शिक्षक में ज्ञान और चरित्र का सम्मान करो और शिक्षक के लिए इसका अर्थ है— ऐसा आचरण करो कि विद्यार्थी तुम्हें देखकर चरित्र सीख सके। क्योंकि अंततः समाज को सिर्फ पढ़े-लिखे लोग नहीं चाहिए। उसे अच्छे मनुष्य भी चाहिए। अगर शिक्षक सचमुच व्यक्तित्व का निर्माता है, तो किसी समाज की नैतिकता की पहली प्रयोगशाला आज भी वही है— एक शिक्षक, एक विद्यार्थी और उनके बीच खड़ा विश्वास।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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