Home KKN Special महिषासुर कौन था? पुराणों के असुरराज से आदिवासी पूर्वज तक

महिषासुर कौन था? पुराणों के असुरराज से आदिवासी पूर्वज तक

दुर्गा पूजा के पंडाल में एक दृश्य बार-बार दिखाई देता है। सिंह पर सवार देवी दुर्गा, हाथ में त्रिशूल और सामने पराजित महिषासुर। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य अधर्म पर धर्म, अन्याय पर न्याय और दुष्टता पर शक्ति की विजय का प्रतीक है। लेकिन इसी दृश्य को भारत के कुछ आदिवासी समुदाय दूसरी स्मृति के साथ देखते हैं। उनके लिए महिषासुर केवल पराजित असुर नहीं, बल्कि पूर्वज, नायक या शहीद भी हो सकता है। कुछ समुदाय दुर्गा पूजा के समय उत्सव के बजाय शोक की परंपरा निभाते हैं।

यहीं से सवाल उठता है—आखिर महिषासुर था कौन? क्या वह किसी प्राचीन राज्य का वास्तविक शासक था? क्या उसे नकारात्मक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के पीछे कोई ऐतिहासिक संघर्ष था या ये सभी प्रश्न धार्मिक आख्यान, लोकस्मृति और आधुनिक सामाजिक विमर्श के अलग-अलग स्तरों से जुड़े हैं?

इन सवालों के जवाब के लिए तीन प्रकार के प्रमाण देखने होंगे—प्राचीन ग्रंथ, पुरातात्त्विक साक्ष्य और जीवित समुदायों की परंपराएं। इन तीनों को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं होगा, क्योंकि इनसे अलग-अलग प्रकार की जानकारी मिलती है।

देवी माहात्म्य में महिषासुर

महिषासुर की कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण प्राचीन लिखित स्रोत देवी माहात्म्य है। यह मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है और सामान्यतः इसके 81वें से 93वें अध्यायों से संबंधित माना जाता है। यह ग्रंथ देवी की शक्ति और विभिन्न असुरों पर उनकी विजय का आख्यान प्रस्तुत करता है। इसकी रचना का समय विद्वान लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास रखते हैं, हालांकि सटीक तिथि पर विद्वानों में मतभेद है।

इस ग्रंथ के 82वें अध्याय में महिषासुर को असुरों का अधिपति बताया गया है। कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच लंबे युद्ध में देवता पराजित हो जाते हैं। महिषासुर उनका स्वर्गीय अधिकार छीनकर स्वयं इंद्र के पद पर अधिकार कर लेता है। सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु और दूसरे देवताओं के कार्यक्षेत्रों पर भी उसका प्रभुत्व स्थापित हो जाता है।

पराजित देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पास सहायता मांगने पहुंचते हैं। देवताओं की शक्तियों के संयुक्त तेज से देवी का प्राकट्य होता है। उन्हें विभिन्न देवताओं के अस्त्र-शस्त्र दिए जाते हैं और वे महिषासुर की सेना से युद्ध करती हैं। अंततः महिषासुर का वध होता है। यह विवरण स्पष्ट करता है कि धार्मिक आख्यान में महिषासुर केवल कोई साधारण राक्षस नहीं, बल्कि असुरों का शक्तिशाली अधिपति है, जिसने देवताओं की सत्ता को चुनौती दी।

लेकिन यहां एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। ग्रंथ में उसका शासक होना धार्मिक कथा के भीतर स्थापित है। इससे यह स्वतः प्रमाणित नहीं होता कि वह किसी पहचाने जा सकने वाले ऐतिहासिक राज्य का राजा था, जिसकी राजधानी, प्रशासन, अभिलेख या शासनकाल का स्वतंत्र प्रमाण मौजूद है। इसलिए प्रश्न का पहला उत्तर यह है कि पुराण में महिषासुर को असुरराज बताया गया है, लेकिन उसके ऐतिहासिक शासन की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध प्रमाणों से नहीं होती है।

महिषासुर को नकारात्मक शक्ति क्यों माना गया?

देवी माहात्म्य की कथा में देवता और असुर केवल दो राजनीतिक दलों की तरह प्रस्तुत नहीं होते। उनके बीच संघर्ष ब्रह्मांडीय व्यवस्था, अधिकार और शक्ति से जुड़ा हुआ है। महिषासुर देवताओं को पराजित करता है, उनके अधिकारों पर कब्जा करता है और उन्हें उनके स्थान से हटा देता है। कथा की दृष्टि से यह सत्ता का ऐसा विस्तार है जो देवताओं की व्यवस्था को संकट में डाल देता है। देवी का प्राकट्य इस संकट के समाधान और देवताओं की पुनर्स्थापना से जुड़ा है।

पारंपरिक धार्मिक व्याख्या में महिषासुर पराजित होने वाली नकारात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। दुर्गा की विजय को दैवी शक्ति, न्याय और व्यवस्था की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जाता है। फिर भी एक बात ध्यान देने योग्य है। महिषासुर को केवल अहंकार या अनियंत्रित इच्छा का प्रतीक कहना उसकी पूरी धार्मिक कथा का विकल्प नहीं है। ये आधुनिक आध्यात्मिक व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन मूल ग्रंथ में वह एक विशिष्ट पात्र है, जिसकी अपनी कथा, सेना और देवताओं से लड़ाई है।

कनाडा में धार्मिक अध्ययन से जुड़े विद्वान राज बालकरन ने 2019 में प्रकाशित अपने शोधपत्र में देवी माहात्म्य की कथा-संरचना और देवी के स्वरूप का विश्लेषण किया है। उनका अध्ययन दिखाता है कि देवी का चरित्र केवल क्रोध या विनाश तक सीमित नहीं है। वह एक ओर संकट का संहार करती हैं, तो दूसरी ओर जीवन और कल्याण की रक्षक भी हैं। महिषासुर-वध इसी व्यापक धार्मिक आख्यान का केंद्रीय प्रसंग है।

क्या महिषासुर वास्तव में किसी आदिवासी समुदाय का पूर्वज था?

झारखंड के कुछ असुर समुदायों और पश्चिम बंगाल के कुछ आदिवासी समूहों में महिषासुर की पहचान मुख्यधारा की धार्मिक कथा से अलग मिलती है। कुछ लोग उन्हें अपना पूर्वज, समुदाय का पुरखा, राजा या शहीद मानते हैं। कुछ स्थानों पर दुर्गा पूजा के समय महिषासुर की स्मृति में शोक या श्रद्धांजलि की परंपरा भी दिखाई देती है।

वर्ष 2019 की एक रिपोर्ट में झारखंड के असुर समुदाय के कुछ सदस्यों की ऐसी परंपराओं का विवरण प्रकाशित हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, समुदाय के कुछ लोग स्वयं को महिषासुर का वंशज मानते हैं और दुर्गा पूजा के समय उनकी मृत्यु को शोक के रूप में याद करते हैं। रिपोर्ट ने यह भी बताया कि सभी समुदायों और सभी बस्तियों की परंपराएं एक जैसी नहीं हैं।

यह परंपरा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि भारत में धार्मिक कथाओं की स्मृति एकरूप नहीं है। एक समुदाय जिस पात्र को दैवी व्यवस्था का विरोधी मानता है, दूसरा समुदाय उसी पात्र को अपने पूर्वज या प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में देख सकता है। लेकिन यहां भी प्रमाण की सीमा समझना आवश्यक है। किसी समुदाय की मौखिक परंपरा उसकी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत है। परंतु किसी पात्र का वास्तविक ऐतिहासिक अस्तित्व सिद्ध करने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक साक्ष्य भी चाहिए—जैसे समकालीन अभिलेख, शिलालेख, पुरातात्त्विक अवशेष या अन्य स्वतंत्र स्रोत।

इसलिए यह कहना कि कुछ असुर समुदाय महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं, एक दर्ज सांस्कृतिक तथ्य है। लेकिन यह कहना कि महिषासुर निश्चित रूप से कोई ऐतिहासिक आदिवासी राजा था, उपलब्ध प्रमाणों से सिद्ध निष्कर्ष नहीं है।

आधुनिक शोध में महिषासुर की नई पहचान कैसे उभरी?

महिषासुर को पूर्वज या शहीद के रूप में देखने की परंपरा केवल धार्मिक विश्वास का विषय नहीं रही। हाल के दशकों में यह सामाजिक पहचान, आदिवासी स्वायत्तता और जातिगत भेदभाव पर बहस से भी जुड़ी है।

समाजशास्त्री मौमिता सेन ने जर्नल ऑफ मटेरियल कल्चर में 2023 में प्रकाशित अपने शोधपत्र में महिषासुर की नई प्रतिमा-परंपरा का अध्ययन किया। यह शोध पश्चिम बंगाल के गांवों में प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों और आयोजनकर्ताओं के साक्षात्कारों पर आधारित था।

शोध में बताया गया कि कुछ आदिवासी और दलित-बहुजन समूह महिषासुर को पारंपरिक असुर-रूप के बजाय एक सम्मानित नायक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में प्रतिमा की बनावट, चेहरे के भाव, शारीरिक मुद्रा और दृश्य-प्रतीकों में बदलाव किए गए। इस तरह महिषासुर की प्रतिमा सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति बन गई।

यह अध्ययन महिषासुर के ऐतिहासिक अस्तित्व का पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं है। यह इस बात का अकादमिक प्रमाण है कि आधुनिक भारत में महिषासुर की छवि को लेकर नए सामाजिक अर्थ निर्मित किए जा रहे हैं। यही अंतर सार्वजनिक बहस में अक्सर धुंधला हो जाता है। किसी समुदाय का अपने इतिहास को नए सिरे से पढ़ना एक सामाजिक प्रक्रिया है। उस व्याख्या के ऐतिहासिक दावों की पुष्टि करना अलग काम है।

क्या पुरातत्त्व महिषासुर के ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि करता है?

पुरातत्त्व के क्षेत्र में देवी दुर्गा और महिषासुर के संघर्ष को दर्शाने वाली प्राचीन मूर्तियां उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय राष्ट्रीय स्मारक एवं पुरावशेष मिशन के अभिलेख में कर्नाटक के बादामी स्थित पुरातात्त्विक संग्रहालय की एक प्रतिमा दर्ज है। इसे लगभग 9वीं–10वीं शताब्दी ईस्वी का माना गया है। प्रतिमा में देवी महिषासुर का वध करती दिखाई गई हैं।

ऐसी मूर्तियां यह प्रमाणित करती हैं कि मध्यकालीन भारत में महिषासुर-वध का धार्मिक आख्यान स्थापित था और देवी की इस छवि की पूजा तथा कलात्मक प्रस्तुति होती थी। लेकिन किसी पौराणिक पात्र की मूर्ति मिलना उस पात्र के ऐतिहासिक व्यक्ति होने का प्रमाण नहीं है। पुरातात्त्विक प्रतिमा किसी कथा, देवता, प्रतीक या धार्मिक विश्वास की उपस्थिति का प्रमाण हो सकती है। किसी ऐतिहासिक राजा की पुष्टि के लिए उस व्यक्ति से संबंधित स्वतंत्र साक्ष्य चाहिए।

इसलिए उपलब्ध पुरातात्त्विक सामग्री से यह कहना उचित है कि महिषासुर-वध की परंपरा प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय धार्मिक कला में मौजूद थी। लेकिन इससे महिषासुर के किसी वास्तविक राज्य, राजधानी या शासनकाल की पुष्टि नहीं होती।

क्या महिषासुर को लेकर फैली भ्रांतियों का कोई प्रमाणित जवाब है?

महिषासुर के बारे में सार्वजनिक बहस में कुछ दावे बार-बार सामने आते हैं। उन्हें अलग-अलग परखना चाहिए।

  • दावा: महिषासुर केवल काल्पनिक दानव था, उसकी कोई दूसरी सांस्कृतिक स्मृति नहीं है। यह दावा अधूरा है। पुराण में वह असुरराज है, जबकि कुछ आदिवासी समुदायों में उससे जुड़ी अलग मौखिक परंपराएं दर्ज हैं।
  • दावा: महिषासुर निश्चित रूप से ऐतिहासिक आदिवासी राजा था, जिसे बाद में दानव बना दिया गया। यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं है। इस व्याख्या पर अकादमिक और सामाजिक विमर्श मौजूद है, लेकिन महिषासुर के शासन की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला निर्णायक अभिलेखीय या पुरातात्त्विक प्रमाण सामने नहीं है।
  • दावा: सभी असुर या संथाल समुदाय महिषासुर को एक ही तरह से पूजते हैं। यह भी सही नहीं है। प्रकाशित रिपोर्टों और मानवशास्त्रीय अध्ययनों में परंपराओं के भीतर विविधता दर्ज की गई है। किसी समुदाय के कुछ सदस्यों की मान्यता को पूरे समुदाय पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
  • दावा: महिषासुर की अलग व्याख्या करना अपने-आप में प्राचीन इतिहास का प्रमाण है। ऐसा नहीं है। कोई परंपरा सांस्कृतिक रूप से वास्तविक और समुदाय के लिए अर्थपूर्ण हो सकती है, लेकिन उसके ऐतिहासिक दावों की पुष्टि के लिए अलग साक्ष्य चाहिए।
  • दावा: पुराण की कथा और आदिवासी मौखिक परंपरा में से एक को बिना जांच के ऐतिहासिक तथ्य मान लेना चाहिए। दोनों को उनके अपने संदर्भ में समझना आवश्यक है। पुराण धार्मिक आख्यान का स्रोत है; मौखिक परंपरा समुदाय की स्मृति और पहचान का स्रोत है। इतिहासकार दोनों का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन उन्हें एक-दूसरे का स्वतः प्रमाण नहीं मान सकते।

इन बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि महिषासुर पर विवाद का बड़ा हिस्सा अलग-अलग प्रकार के प्रमाणों को एक ही अर्थ में इस्तेमाल करने से पैदा होता है।

महिषासुर की कथा केवल एक पात्र की कहानी नहीं, स्मृति और पहचान की भी कहानी है

महिषासुर को लेकर उपलब्ध प्रमाण हमें तीन स्पष्ट निष्कर्ष देते हैं। पहला, देवी माहात्म्य में महिषासुर को असुरों का शक्तिशाली अधिपति और देवताओं की व्यवस्था को चुनौती देने वाला पात्र बताया गया है। पारंपरिक दुर्गा पूजा में उसका वध दैवी शक्ति की विजय का प्रतीक है। दूसरा, कुछ आदिवासी समुदायों में महिषासुर को पूर्वज, राजा या शहीद के रूप में याद करने की परंपरा दर्ज है। आधुनिक अकादमिक शोध ने इस सांस्कृतिक स्मृति और उसकी बदलती प्रतिमा-परंपरा का अध्ययन किया है। तीसरा, अभी उपलब्ध साक्ष्यों से महिषासुर को किसी निश्चित ऐतिहासिक राज्य का प्रमाणित राजा घोषित नहीं किया जा सकता। उसी तरह, उसके वैकल्पिक सांस्कृतिक स्मरण को बिना अध्ययन के खारिज करना भी उचित नहीं होगा।

इतिहास का काम किसी धार्मिक आस्था को अपमानित करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि कौन-सा दावा किस प्रकार के प्रमाण पर खड़ा है। आस्था अपनी जगह है, समुदाय की स्मृति अपनी जगह और ऐतिहासिक सत्यापन अपनी जगह।

महिषासुर की कहानी हमें यही सावधानी सिखाती है कि किसी पात्र को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि एक परंपरा उसे क्या कहती है। यह भी देखना होगा कि दूसरी परंपराएं उसे कैसे याद करती हैं, इतिहासकार उन स्मृतियों का अध्ययन कैसे करते हैं और उपलब्ध प्रमाण वास्तव में कहां तक पहुंचते हैं।

 

स्रोत:- मार्कण्डेय पुराण, देवी माहात्म्य — महिषासुर के धार्मिक आख्यान और देवताओं से संघर्ष के लिए प्राथमिक ग्रंथ। मौमिता सेन का 2023 का शोधपत्र — महिषासुर की नई प्रतिमा-परंपरा, आदिवासी पहचान और सामाजिक-राजनीतिक अर्थों के अध्ययन के लिए। राष्ट्रीय स्मारक एवं पुरावशेष मिशन — देवी महिषासुरमर्दिनी की ऐतिहासिक प्रतिमा के अभिलेख के लिए। महिषासुर को पूर्वज मानने वाले समुदायों पर प्रकाशित रिपोर्ट — स्थानीय परंपराओं और समुदायों के भीतर विविधता के संदर्भ के लिए।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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